पश्चिम बंगाल में बीजेपी के सपनों पर कैसे पानी फेर सकता है सरना कोड?

 गृह मंत्री अमित शाह के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फाइल फोटो

गृह मंत्री अमित शाह के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फाइल फोटो

झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्र में अपना जनाधार फिर से हासिल करना भारतीय जनता पार्टी के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 8, 2020, 2:13 PM IST
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अशोक मिश्रा

भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरना कोड (Sarana Code) पर झारखंड राज्य विधानसभा (Jharkhan Assembly) में प्रस्ताव पारित करने को लेकर दुविधा की स्थिति में है. यह प्रस्ताव विभिन्न जनजातियों के सदस्यों को एक अलग धार्मिक इकाई के साथ पहचान करने की अनुमति देता है. बिहार जीतने के बाद भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) को हराने की महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है. BJP पश्चिम बंगाल (West Bengal Elections 2020) में अपना विस्तार करने की ओर बढ़ रही हैं, जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं.

भाजपा ने पश्चिम बंगाल में पहले ही आक्रामक अभियान शुरू किया हुआ है. राज्य में झारखंड और ओडिशा सीमा से सटे इलाकों में जनजातियों की पर्याप्त आबादी है. हालांकि, हेमंत सोरेन सरकार द्वारा सरना कोड पर प्रस्ताव पारित करने के कदम ने भाजपा को संकट में डाल दिया है क्योंकि इस मुद्दे को झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने उससे छीन लिया है. यह झारखंड की सीमा से लगे क्षेत्रों में पश्चिम बंगाल की जनजातीय आबादी को सीधे प्रभावित कर सकता है.

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झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव को 12 नवंबर को राज्य विधानसभा में ध्वनि मत से पारित किया गया. यदि केंद्र में एनडीए सरकार द्वारा इसे मंजूरी मिल जाती है, तो साल 2021 की जनगणना (Census 2021) में एक अलग धर्म के रूप में सरना के लिए एक अलग कॉलम होगा.

फिलहाल सरना धर्मों की सूची में शामिल नहीं

बीते साल झारखंड विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने वादा किया था कि वह नई जनगणना शुरू होने पर 2021 में एक अलग सरना कोड की मांग को लागू करेगी. लेकिन भाजपा और सहयोगी दल इस धारणा के कारण हार गए कि एक गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री रघुवर दास ( तत्कालीन), गैर-आदिवासी आबादी के इशारों पर काम करेंगे जिससे आदिवासियों को काफी नुकसान हो सकता है.



फिलहाल सरना धर्मों की सूची में शामिल नहीं है. इसके बावजूद, 2011 की जनगणना (Census 2011) में झारखंड की 40 लाख से अधिक आदिवासी आबादी और देश भर के लगभग 6 करोड़ लोगों ने खुद को 'सरना' धर्म का बताया था. हालांकि इसका जिक्र जनगणना के कॉलम में नहीं किया गया था.

झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में बसे विभिन्न जनजातियों के सदस्य पिछले कई दशकों से सरना संहिता को लागू करने की मांग कर रहे हैं. ऐन्थ्रपालॉजी (मानवविज्ञान) और जनसांख्यिकीय रिकॉर्ड बताते हैं कि साल 1872 और साल 1951 के बीच 'आदिवासी धर्म' के लिए एक कॉलम हुआ करता था. लेकिन बाद में इसे बदल दिया गया और जनजातियों के सदस्यों के पास हिंदू, ईसाई या अन्य धर्मों के तौर पर पहचाने जाने का विकल्प था.

स्वतंत्र धर्म चुनने का अधिकार की मांग

सरना कोड प्रस्ताव के पीछे तर्क उस उद्देश्य को पूरा करना है जिसके लिए साल 2000 में झारखंड बनाया गया था. सरना कोड मुद्दे की अगुआई करने वालों को लगता है कि इससे झारखंड और अन्य राज्यों के आदिवासी जनजातियों के सामाजिक-सांस्कृतिक एकीकरण पर लंबे समय तक प्रभाव रहेगा.

पिछले साल झारखंड के 32 आदिवासी समूहों ने 2021 में सरना कॉलम नहीं रखे जाने पर जनगणना के बहिष्कार करने का आह्वान किया था. 19 राज्यों से आये आदिवासी नेताओं ने भी नई दिल्ली में विरोध प्रदर्शन किया था ताकि उन्हें अपना स्वतंत्र धर्म चुनने का अधिकार मिल सके.

एक अलग धार्मिक पहचान चुनने पर सभी एकमत है लेकिन एक सामान्य धर्म के रूप में 'सरना ’पर कुछ को संदेह है क्योंकि विभिन्न जनजातियों में प्रकृति पूजा के लिए अलग-अलग परिभाषाए हैं. प्रकृतिवादी धर्म के पीछे मूल दर्शन 'जल, जंगल और जमीन ’की पूजा करना है - जिसे अक्सर मानवविज्ञानी द्वारा जीववाद के संदर्भ में बताया जाता है.

धर्म में बदलने के लिए कई ईसाई और हिंदू संगठन काम कर रहे

इसके पीछे आदिवासी पहचान और धर्म की रक्षा करना सिद्धांत हो सकता है, लेकिन वोट बटोरने के लिए सांप्रदायिक आधार पर राजनीति करना सरना कोड को आगे बढ़ाने का मुख्य एजेंडा है. झामुमो के लिए यह धार्मिक पहचान के तहत जनजातीय आबादी का एक ठोस वोट बैंक बनाने जरिया है. यह न केवल सनातन धर्म (हिंदू) और ईसाई धर्म से जनजातियों को मुक्त करेगा, बल्कि राज्य की सीमाओं के पार आदिवासी क्षेत्रों के घने जंगलों में धर्मांतरण को भी रोक देगा. आदिवासी आबादी को अपनी धर्म में बदलने के लिए दूरदराज के इलाकों में कई ईसाई और हिंदू संगठन काम कर रहे हैं.

आदिवासी क्षेत्र में सरस्वती शिशु विद्यालयों वाली भाजपा का मानना है कि आदिवासी समुदाय सनातन धर्म का हिस्सा हैं. दूसरी ओर ईसाइयों ने उन्हें शिक्षा, नौकरी और सम्मानजनक जीवन के नाम पर लुभाने की कोशिश की है.

दरअसल ईसाई प्रभुत्व इतना ज्यादा है कि झारखंड राज्य में चर्च की सबसे अधिक सीट हैं और लगभग 4 प्रतिशत आबादी जिनमें ज्यादातर आदिवासी समुदाय हैं वे ईसाई हैं. वे ईसाई अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जनजातियों के तौर पर सरकारी सुविधाओं का का फायदा लेते हैं.

झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्र में अपना गढ़ फिर से हासिल करना भाजपा के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है. भाजपा झारखंड क्षेत्र में अधिकतम विधानसभा और संसद सीटें जीतती थी, जो 2000 से पहले बिहार का हिस्सा हुआ करती थीं. राज्य बनने के बाद झामुमो के नेतृत्व वाले गठबंधन द्वारा आदिवासी बनाम गैर-आदिवासी नीतियों के कारण भाजपा के चुनावी प्रदर्शन में कमी आने लगी.

बंगाल के इन क्षेत्रों पर असर!

पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जनजातियों का कुल आबादी में लगभग 6 प्रतिशत हिस्सा है. उनमें से संथाल कुल एसटी आबादी का 51.8 प्रतिशत हिस्सा हैं, इसके बाद ओराओं, मुंडा, भूमि, कोड़ा आते हैं. पश्चिम बंगाल की कुल जनजातीय आबादी का आधा से अधिक हिस्सा जलपाईगुड़ी, उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर, बर्धमान, पुरुलिया, मालदा, बांकुरा, मेदिनीपुर और झारग्राम क्षेत्रों में केंद्रित है, जिसे बिहार और झारखंड के करीब जंगल महल के रूप में जाना जाता है.

बिहार और झारखंड से सटे ज्यादातर इलाकों में आदिवासी आबादी और बड़े लोग नक्सलियों के प्रभाव में रहते थे. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने माओवादियों के साथ कथित संबंध के लिए उनके खिलाफ मामलों को वापस लेने का वादा करके इन आदिवासी समुदायों को प्रभावित करने की कोशिश की थी.

BJP को क्या करना चाहिए?

2014 के लोकसभा चुनावों में TMC ने पुरुलिया, बांकुरा, बिष्णुपुर, मेदिनीनगर और झाड़ग्राम सहित जंगल महल की सभी पांच सीटें हासिल की थीं. हालांकि, 2018 के पंचायत चुनाव में, तृणमूल ने झारग्राम और पुरुलिया में लगभग 46 प्रतिशत सीटें हासिल कीं, जबकि आदिवासी क्षेत्रों में बीजेपी का प्रभाव संघ परिवार की गतिविधियों पर लगातार काम करने के कारण बढ़ा.

झारखंड चुनाव परिणाम से सबक लेते हुए, भाजपा को आदिवासी आबादी के बीच ममता बनर्जी पर बढ़त हासिल करनी होगी. पश्चिम बंगाल में राजनीतिक सफलता काफी हद तक अनुसूचित जनजाति के मतदाताओं के समर्थन पर टिकी है. BJP को आदिवासी और गैर-आदिवासी वोटों के बीच संतुलन बनाते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि आदिवासी क्षेत्र का सामाजिक-राजनीतिक की आदर्श स्थिति से कोई छेड़छाड़ ना हो ताकि विभिन्न जनजातियों की भाषा, संस्कृति और इतिहास की भी रक्षा हो सके.

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