खून से लाल बंगाल : 30 साल पहले भी हुआ था ममता बनर्जी पर जानलेवा हमला

युवा नेता ममता बनर्जी.

युवा नेता ममता बनर्जी.

कम्युनिस्ट चीन के नेता माओ (Mao Zedong) का नारा था 'सत्ता बंदूक के ज़ोर पर ही पाई जाती है'. पश्चिम बंगाल हर बार इस चरित्र की मिसाल बनता रहा. बंगाल की राजनीतिक हिंसा के इतिहास के बीच ममता बनर्जी के रूप में एक महिला कैसे उभरीं?

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 25, 2021, 8:31 PM IST
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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री पर नंदीग्राम (Attack on Mamata Banerjee in Nandigram) में हुए हमले को लेकर खबरें आईं तो उस जानलेवा हमले की याद ताज़ा हुई, जब 1990 में हाज़रा में वो मौत के दरवाज़े तक पहुंच गई थीं. CPI-M के कथित गुंडे लालू आज़म (Lalu Azam) ने यह हमला किया था, जिसमें ममता बुरी तरह ज़ख़्मी (Mamata Banerjee was Attacked) हुई थीं. लेकिन लेफ्ट (Left Parties) को तब यह हमला बहुत भारी पड़ा था क्योंकि उसके बाद ममता बंगाल की नेता बनकर उभरीं और उनकी सियासी आंधी में लेफ्ट की सत्ता कागज़ के किले की तरह ढह गई थी.

ममता ने बंगाल में हिंसा कम होने के दावे किए, हालिया हमले का ठीकरा बीजेपी के सिर फोड़ा, लेकिन सच यह भी है कि बंगाल हमेशा ही राजनीतिक हिंसा के लिए कुख्यात रहा. ममता पर हुए उस ऐतिहासिक हमले के केस के बारे में जानते हुए यह समझना अहम हो जाता है कि बंगाल में सियासी खून खराबे के बीच एक महिला सत्ता की खिलाड़ी बनकर उभरी.

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नंदीग्राम में ममता बनर्जी पर हमले की खबरों के बाद राजनीतिक बयानबाज़ी का दौर जारी है.

क्यों हुआ था 1990 में ममता पर हमला?

उस समय ममता कांग्रेस की युवा नेता थीं. खाद्य तेल में मिलावट के चलते मौतें होने के विरोध में कांग्रेस ने विरोध प्रदर्शन किए. ममता ने कई जगह रैलियां कीं. इसी सिलसिले में हाज़रा में जब ममता रैली के लिए जा रही थीं, तभी करीब 11 बजे सुबह कम्युनिस्ट पार्टी के कथित गुंडे आज़म ने धारदार हथियार से ममता का सिर फोड़ दिया था.

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हमला इतना खतरनाक था कि ममता की जान पर बात बन गई थी. अदालत ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए हत्या की कोशिश और दंगे के आरोप में केस शुरू किया था. आलम दो महीने के बाद जेल से बेल पर रिहा हुआ था. सवाल यह भी उठना चाहिए कि आलम आखिर कौन था?

पहले कांग्रेस का ही कार्यकर्ता रहा लालू आज़म 1980 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में जुड़ गया था. अपने भाई और जिला स्तर के कम्युनिस्ट नेता बादशाह के रसूख के चलते आज़म की हिमाकत बढ़ने लगी थी. ममता पर हमले की खासी आलोचना के बाद दोनों भाइयों को पार्टी ने बाहर कर दिया था. ममता के खिलाफ हमले का यह केस 1992 में शुरू हुआ था, जो लेफ्ट की सियासत के चलते सालों तक लटका रहा.

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1990 में हुए हमले में ममता को बेहद गंभीर चोटें आई थीं.


घिसट घिसट कर 29 साल तक केस चलने के बाद 2019 में लालू आज़म को कोर्ट ने यह कहकर रिहा कर दिया कि उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं मिले. ममता बनर्जी ने इस फैसले पर काफी नाराज़गी भी जताई थी. लेकिन राजनीतिक हिंसा की कहानी बंगाल में इससे कहीं ज़्यादा डरावनी और खूंखार रही है.

खून में सनी बंगाल की राजनीति

ममता या उनकी पार्टी पर हमला नई बात नहीं है और न ही यह बात नई है कि ममता की पार्टी ने हमले किए हों. पिछले दो सालों में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस एक दूसरे पर कार्यकर्ताओं की हत्याओं के आरोप लगाते रहे हैं. लेकिन यह खून खराबा बंगाल की सियासत का संस्कार रहा है.

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1970 का दशक बंगाल में बेइंतहा खून खराबे के लिए दुखद याद की तरह रहा. 1964 तक तो कांग्रेस ही बंगाल में काबिज़ रही, लेकिन इसके बाद नक्सलबाड़ी आंदोलन और कम्युनिस्टों के उभरने का सिलसिला एक साथ चलता रहा. जल्द ही पूरा बंगाल इस आपसी राजनीतिक हिंसा की चपेट में दिखा और एक अहम इतिहास तब बना जब 1971 में फॉरवर्ड ब्लॉक नेता हेमंत बसु की हत्या की गई.

CPI (M) के खिलाफ चुनाव लड़ रहे बसु की हत्या के लिए यह कभी तय नहीं किया जा सका कि हत्या किसने करवाई. 1970 के दशक का एक और सनसनीखेज़ कत्ल बसु की जगह लेने वाले अजीत कुमार बिस्वास का था. हिंसा के दम पर लेफ्ट ने सत्ता में आने की कोशिश की थी, लेकिन उसे भारी झटका लगा था.

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ममता बनर्जी ने कांग्रेस के साथ राजनीतिक सफर शुरू किया था.


राजनीतिक हिंसा के ​इतिहास में बिस्वास की हत्या सहित 70 का पूरा दशक बहुत डरावने ढंग से दर्ज है. इसके बाद 80 के दशक में ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा शुरू हुई, जो 1990 के हमले के बाद बहुत तेज़ी से आगे बढ़ी. उस वक्त CPI (M) के पास हमले का बचाव करने के लिए भी मुश्किल खड़ी हो गई थी.

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ममता स्टार बन गई थीं और कांग्रेस को बंगाल में वापसी का रास्ता दिखने लगा था. तभी 1996 को बंगाल की सियासी​ हिंसा में बेहद खतरनाक माना गया जब पुलिस के साथ उलझे प्रदर्शनकारियों के साथ हुई हिंसा में कुछ ही मिनटों में 13 लोग मारे गए थे. ऐसा ही एक बार फिर सिंगूर में हुआ, जब ममता की पार्टी ने विरोध प्रदर्शन किए थे और पुलिस ने फायरिंग. 2006 और 2008 के बीच सिंगूर व नंदीग्राम के आंदोलनों ने बंगाल के खून सने इतिहास के पन्ने फिर खोले थे.

दिल दहलाने वाले आंकड़े

देश के क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो ने बताया था कि 1999 से 2016 के बीच पश्चिम बंगाल में हर साल औसतन कम से कम 20 पॉलिटिकल मर्डर हुए. इसमें भी 2009 में सबसे ज़्यादा 50 हत्याएं हुई थीं. साल 2000, 2010 और 2011 में भी हत्याओं का ग्राफ काफी चढ़ा हुआ रहा. ऐसे ही आंकड़े 20 साल पहले भी सामने आए थे.

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बंगाल विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र ममता बनर्जी को बंगाल की बेटी के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है.


1989 में तत्कालीन कम्युनिस्ट नेता व सीएम ज्योति बसु ने विधानसभा में आंकड़े बताए थे कि 1988-89 में कम से कम 86 राजनीतिक कार्यकर्ताओं का मौत के घाट उतारा गया. तब प्रधानमंत्री राजीव गांधी को कहना पड़ा था 'कम्युनिस्टों के बंगाल में जीना बेहद खतरनाक हो गया है.'
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