US में क्या हैं सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स, कैसे काम करते हैं ये?

कोरोना महामारी के बीच ही अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव हुए- सांकेतिक फोटो (Pixabay)
कोरोना महामारी के बीच ही अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव हुए- सांकेतिक फोटो (Pixabay)

अमेरिकी सदन में शक्ति संतुलन के लिए दो हिस्से बनाए गए. ये सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (United States Senate and House of Representatives) के तौर पर काम करते हैं. हालांकि सीनेट ज्यादा ताकतवर है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 6, 2020, 3:43 PM IST
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कोरोना महामारी के बीच ही अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव हुए. अब नतीजों के साथ दुनियाभर के देशों में बड़े कूटनीतिक बदलाव हो सकते हैं. अमेरिका में सर्वोच्च पद के लिए चुनाव का गणित अलग ढंग से काम करता है. साथ ही अमेरिका में सदन का ढांचा भी हमारी संसद से अलग है. इसमें सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव शब्द बार-बार आते हैं. जानिए, क्या हैं ये और कैसे काम करते हैं.

अमेरिकी कांग्रेस दो हिस्सों में बंटी हुई है, जिनमें से हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव को निचला सदन कहते हैं और सीनेट ऊपरी सदन होता है. ये दोनों सदन एक तरह से शक्ति संतुलन का काम करते हैं, यानी अगर सदन का एक पक्ष किसी बात पर अड़ जाए तो दूसरा ढांचा संतुलन बिठाता है.

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वैसे शक्ति के तौर पर देखा जाए तो सीनेट के पास फैसले लेने की ताकत काफी ज्यादा होती है. इस समय अमेरिका में 50 स्टेट हैं. हर स्टेट से, चाहे उसकी आबादी कितनी ही कम या ज्यादा क्यों न हो, दो प्रतिनिधि चुनकर सदन आते हैं. यानी सीनेट में कुल मिलाकर 100 सदस्य होते हैं. ये राज्यों के प्रतिनिधि होते हैं.
देश का उप-राष्ट्रपति सीनेट का सभापति होता है- सांकेतिक फोटो


पहले सीनेट का चुनाव अप्रत्यक्ष तौर पर किया जाता था लेकिन इसमें कई तरह की गड़बड़ियां हुईं. इसके बाद संविधान में संशोधन करते हुए सीनेटरों के चुनाव के लिए सीधी पद्धति अपनाई गई. इससे हुआ ये कि जनता ही सीनेट सदस्यों को भी चुनती है.

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सीनेट को कभी भंग नहीं होना चाहिए. ये तय करने के लिए अमेरिका में एक अलग ही तरीका अपनाया गया. वैसे तो सीनेटरों के रहने की अवधि 6 साल है लेकिन इसका लगभग एक तिहाई हिस्सा एक दो साल के बाद रिटायर हो जाता है और उनकी जगह नए सीनेटर ले लेते हैं.

देश का उप-राष्ट्रपति सीनेट का सभापति होता है. वो सदन की अध्यक्षता करता है लेकिन किसी बहस का हिस्सा नहीं होता. उप-राष्ट्रपति को केवल तभी अपना वोट देने की अनुमति है जब किसी मामले में सीनेट में वोट बराबर हो जाएं. ऐसे में वो जिस ओर जाता है, वही फैसला अंतिम माना जाता है.

जनता ही सीनेट सदस्यों को भी चुनती है


सदन का ये हिस्सा इतना ताकतवर है कि राष्ट्रपति के फैसलों को इससे होकर गुजरना होता है. अगर राष्ट्रपति कोई ऐसा फैसला करें जो सीनेट को मंजूर नहीं तो फैसला रुक जाता है. किसी भी संधि की मंजूरी के लिए सीनेट के दो-तिहाई सदस्यों की मंजूरी जरूरी है. यहां तक कि सीनेट राष्ट्रपति या उप-राष्ट्रपति को अपने पद से हटा सकता है. इसे महाभियोग कहते हैं, जो तब चलाया जाता है जब राष्ट्रपति पर देशद्रोह, भारी भ्रष्टाचार या दुष्कर्म का आरोप हो.

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हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव अमेरिकी कांग्रेस का निचला सदन है. इसमें 435 प्लस 3 सदस्य होते हैं. विशेष प्रावधान के तहत वॉशिंगटन डीसी के 3 सदस्य को रखा जाता है. इस हाउस के सदस्यों का कार्यकाल 2 साल होता है. इसके बाद तुरंत सदन के नए सदस्य चुने जाते हैं.

पहले इसी हाउस में कोई फैसला लिया जाता है, जिसे बिल कहते हैं. यहां से वो सीनेट जाता है और वहां से सहमति मिलने पर राष्ट्रपति के पास पहुंचता है. ये तो हुईं कुछ बुनियादी ताकतें. इसके अलावा हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव के पास कई विशेष ताकतें हैं. जैसे यहां के सदस्य चाहें तो राजस्व से जुड़े सभी विधेयकों पर अपने-आप फैसला ले सकते हैं.

ट्रंप का कहना है कि वे मामले को सुप्रीम कोर्ट में ही खत्म करेंगे


इसके अलावा एक काफी अहम शक्ति सीधे राष्ट्रपति चुनने को लेकर भी है. मिसाल के तौर पर अगर इलेक्टोरल कॉलेज में किसी को भी बहुमत न मिले तब ये हाउस राष्ट्रपति चुन सकता है. इसके सदस्यों के पास इतनी छूट है कि वे सरकार के कामों पर नजर रखें और उन पर अपनी सहमति या असहमति दे सकें. सरकार की कड़ी आलोचना करने पर भी इन पर कार्रवाई नहीं की जा सकती है.

चुनावी सर्वे में जो बाइडन को ट्रंप से ज्यादा लोकप्रिय बताया जा रहा था. यहां तक कि वोटों की गिनती में भी बाइडन ही आगे दिखे लेकिन इस बीच काफी धांधली का आरोप भी लगाया जा रहा है. ट्रंप का कहना है कि वे मामले को सुप्रीम कोर्ट में ही खत्म करेंगे. फिलहाल ये मामला जहां भी जाकर रुके, ट्रंप का खेमा काफी मजबूत दिखने लगा है. सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी की पकड़ कमजोर होती दिख रही है. अमेरिका के कई राज्यों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार विपक्षी पार्टी से हारते लग रहे हैं. यहां ये समझना जरूरी है कि कांग्रेस पर अपनी बढ़त मजबूत करने के लिए डेमोक्रेट्स सीनेट पर भी पकड़ बनाना चाहते हैं ताकि अगर वे चुने जाएं तो राष्ट्रपति के सामने आगे भी कोई रुकावट न हो.
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