जानें, इस बार क्यों लंबी होती जा रही है सर्दी?

भारत में मानसून और पश्चिमी विक्षोभ ठंड से सीधा जुड़ाव रखते हैं. इससे मौसम पर बहुत असर पड़ता है.

News18Hindi
Updated: March 14, 2019, 2:16 PM IST
जानें, इस बार क्यों लंबी होती जा रही है सर्दी?
प्रतीकात्मक तस्वीर
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Updated: March 14, 2019, 2:16 PM IST
उत्तर भारत में अमूमन फरवरी के आखिरी तक सर्दियां खत्म होने लगती हैं लेकिन इस बार आधा मार्च गुजर चुका है और अभी भी ठंड बाकी है. रह-रहकर बारिश भी हो रही है. जहां बारिश नहीं भी हो रही, वहां भी लगातार बादल छाए हुए हैं. हल्की ठंड बनी हुई है और ज्यादातर लोगों ने अभी भी थोड़े-बहुत मोटे कपड़े पहने हुए हैं. वैसे भी इस बार अमेरिका सहित दुनिया भर में कड़ाके की ठंड पड़ी है. आइये हम जरा इस बात की जांच कर लेते हैं कि इस बार क्यों हुआ है ऐसा? लेकिन इसका पता करने से पहले हमें जानना होगा कि आखिर भारत में ठंड पड़ती क्यों है? तो इसके चार प्रमुख कारण हैं -

सूरज का पृथ्वी से दूर हो जाना


हम सभी जानते हैं कि धरती सूरज के चारों ओर चक्कर लगाती है. लेकिन जिस कक्षा में धरती सूरज का चक्कर लगाती है उसमें हर समय पृथ्वी की सूरज से दूरी बराबर नहीं होती. कुछ-कुछ अंडाकार (पूरी तरह से परवलयाकार) कक्षा में चक्कर लगाते हुए एक वक्त ऐसा आता है जब पृथ्वी की दूरी सूरज से बहुत ज्यादा हो जाती है. इसी समय सबसे ज्यादा ठंड पड़ती है. भारत के मामले में भी ऐसा ही है. कड़ाके की ठंड के वक्त धरती तो सूरज से दूर तो होती ही है, इसके अलावा भारत के क्षेत्रों पर सूरज की किरणें भी सीधी नहीं पड़ रही होती हैं.

मानसून का लौटना

मानसून आता है क्योंकि भारत में एक कम दबाव का क्षेत्र बना होता है. ऐसे में जब मानसून लौटता है तो कम दबाव का क्षेत्र खत्म हो जाता है तो वहां पर ठंडी होकर हवाएं भारी बनी रहती हैं यह ठंड का एक प्रमुख कारण होता है.

इंटर ट्रॉपिकल कंवर्जेंश ज़ोन का शिफ्ट होना
आपने ग्लोब जरूर देखा होगा. वो हमारी पृथ्वी का ही मॉडल होता है. लेकिन उसपर बहुत सी लकीरें खिंची रहती हैं. ग्लोब में जो क्षैतिज रेखाएं होती हैं, उनमें सबसे बीच वाली रेखा ग्लोब को सीधा दो भागों में बांटती है. इस रेखा को भूमध्यरेखा या 'इक्वेटर' कहते हैं. यह भूमध्यरेखा दक्षिणी भारत के बिल्कुल पास से होकर गुजरती है.
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धरती के घूमने और हवा के दबाव के कारण इस रेखा के पास उत्तर और दक्षिण से दो व्यापारिक हवाएं चलती हैं. आप सोच रहे होंगे ये व्यापारिक हवाएं क्या होती हैं? तो बहुत सिंपल है कि जो हवाएं व्यापार करने में मदद करती हैं, व्यापारिक हवाएं होती हैं. माने आप जानते ही हैं कि पहले (और आज भी) ज्यादातर वैश्विक व्यापार समुद्र के माध्यम से ही होता रहा है. ऐसे में ये व्यापारिक हवाएं वे हवाएं हैं जो पानी के जहाजों को अपने स्थान तक पहुंचने में मदद करती हैं. ऐसी हवाएं दो तरह की होती हैं. एक इक्वेटर के पास ही उत्तर से दक्षिण की ओर चलती है और दूसरी दक्षिण से उत्तर की ओर चलती है.

इन हवाओं के कारण ही भारत में हिमालय की तराई के प्रदेशों में कम दबाव का क्षेत्र गर्मी भर बना रहता है. जिसके चलते इसे भरने के लिए मानसूनी हवाएं आती हैं और बारिश होती है. लेकिन धीरे-धीरे इन व्यापारिक हवाओं के चलते बनने वाला कम दबाव का क्षेत्र बदलता भी रहता है. ऐसे में जब यह कम दबाव का क्षेत्र हिमालय को पार कर तिब्बत चला जाता है. तब मानसून इस क्षेत्र को छोड़ देता है.

लेकिन अभी लिस्ट पूरी कहां हुई है. कड़कड़ाती ठंड का असली उभार तो तब होता है जब ठंडी पड़ रही हो और उसी में बारिश हो जाए या फिर ओले/ बर्फ पड़ जाये. और ऐसा जिस फैक्टर के चलते होता है, उसे हम पश्चिमी विक्षोभ या वेस्टर्न डिस्टर्बेंस के नाम से जानते हैं.

पश्चिमी विक्षोभ
सीधे कहें तो ये तूफान होते हैं, जो अपने साथ भूमध्यसागर और अटलांटिक महासागर से नमी लेकर आते हैं. भारत तक आते-आते इनकी हवाएं बहुत ठंडी हो चुकी होती हैं. और जब वे हिमालय से टकराती हैं तो उत्तर भारत में ठंड में बारिश होती है, कई जगह ओले और बर्फ भी पड़ती है. इसे उत्तर भारत की रबी की फसल के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. जिसमें गेहूं प्रमुख है.

भारत में पिछला मानसून अपेक्षित तारीख से पहले पीछे हट गया था. ऐसे में जहां कम दबाव का क्षेत्र हिमालय की तराई के भागों से खत्म हुआ, तुरंत उत्तर भारत में ठंड का मौसम शुरू हो गया. इससे तय हो गया कि इस बार नॉर्मल सालों से ज्यादा ठंड पड़ृेगी. ऐसे में देखा गया है कि लगातार पिछले कुछ सालों में ग्लोबल वार्मिंग के चलते ठंड बढ़ती जा रही है इसका असर भी इस साल की ठंड पर है.

लेकिन असली खिलाड़ी इस ठंड के पीछे है 'पोलर वोर्टेक्स'. जिसके चलते अमेरिका में इस साल रिकॉर्डतोड़ ठंड पड़ी है. वैज्ञानिकों के मुताबिक ध्रुवीय क्षेत्रों से आने वाली ठंड यूरोप के दक्षिणी छोर तक आई और फिर यह पश्चिमी विक्षोभ के जरिये उत्तर भारत में पहुंची. मौसम विभाग के मुताबिक इसके चलते उत्तर भारत में सात पश्चिमी विक्षोभ आ चुके हैं जबकि आमतौर पर इनकी संख्या चार से छह रहती है.

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