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Explained: रूस का ओपन स्काई ट्रीटी तोड़ना कितना खतरनाक हो सकता है?

रूस भी खुद को मुक्त आकाश संधि (Open Skies Treaty) से अलग कर चुका- सांकेतिक फोटो
रूस भी खुद को मुक्त आकाश संधि (Open Skies Treaty) से अलग कर चुका- सांकेतिक फोटो

अमेरिका और रूस (America and Russia) एक के बाद संधियों से अलग हो रहे हैं. अकटलें लग रही हैं कि अगली बारी परमाणु संधि (nuclear arms control agreement) की हो सकती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 18, 2021, 12:53 PM IST
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अमेरिका के बाद अब रूस भी खुद को मुक्त आकाश संधि (Open Skies Treaty) से अलग कर चुका. रूस ने अमेरिका का हवाला देते हुए ये फैसला लिया. OST के तहत संधि में शामिल देश अपने आसमान पर दूसरे देशों के हथियाररहित विमानों को उड़ने की अनुमति देते रहे हैं. इस संधि में 34 देश शामिल हैं. अब अमेरिका और रूस का इससे अलग होना बड़ी आफत ला सकता है.

क्या हुआ है फिलहाल
शुक्रवार को रूस ने संधि से अलग होने के औपचारिक घोषणा कर दी. वो पहले से इस बात के लिए कसमसा रहा था और लगातार अमेरिका के अलग होने का हवाला दे रहा था. रूस के विदेश मंत्रालय ने कहा, अमेरिका 2020 में इस समझौते से अलग हो गया था इसलिए संतुलन कायम करने के लिए रूस का यह निर्णय लेना जरूरी हो गया था.

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अमेरिका क्यों हुआ अलग


इधर अमेरिका ने मई 2020 में संधि तोड़ते हुए रूस पर ही आरोप लगाया था कि वो संधि के बहाने से टोह लेने की कोशिश कर रहा था. दरअसल साल 2017 में ट्रंप इस बात पर नाराज हो गए थे कि एक रूसी विमान ने गोल्फ कोर्स पर उड़ान भरी थी. इसी बात का हवाला देते हुए उन्होंने खुद को संधि से बाहर कर लिया. अब दो बेहद मजबूत देशों के संधि से बाहर होने पर खतरे या शीत युद्ध की अटकलें तक लगाई जा रही हैं.

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रूस ने अमेरिका का हवाला देते हुए OST से अलग होने का फैसला लिया


कब बात हुई थी संधि के लिए
करीब 18 साल पहले पहले यह व्यवस्था सदस्‍य देशों के बीच विश्वास बढ़ाने और संघर्ष को टालने के लिए शुरू की गई. अमेरिकी राष्ट्रपति डी. आइजनहावर (Dwight Eisenhower) ने पहली बार जुलाई, 1955 में मुक्‍त आकाश संधि को लेकर प्रस्ताव पेश किया था.

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रूस और अमेरिका के बीच यकीन लाना था बड़ा मकसद
प्रस्‍ताव में कहा गया था कि अमेरिका (America) और तत्कालीन सोवियत संघ (Soviet Union) एक दूसरे के क्षेत्र में टोही उड़ानों की अनुमति दें. उस समय संधि को लेकर कुछ खास नहीं हो पाया. इसके बाद मई 1989 में जब राष्ट्रपति जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश ने फिर प्रस्ताव पेश किया. फिर नाटो देशों के बीच बातचीत शुरू हुई. इसके बाद फरवरी 1990 में वारशॉ पैक्‍ट लागू हुआ.

संधि का मकसद सैन्य गतिविधि पारदर्शिता को बढ़ावा देना
कुछ देशों ने 24 मार्च 1992 को संधि पर हस्‍ताक्षर कर दिए, लेकिन मास्को ने प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया. हालांकि, 1 जनवरी 2002 में रूस (Russia) ने भी मुक्‍त आकाश संधि पर हस्‍ताक्षर कर दिए और ये लागू हो गई. इस संधि पर अब तक 34 देश हस्ताक्षर कर चुके हैं. किर्गिस्तान संधि पर हस्ताक्षर करने वाला 35वां देश है, लेकिन उसने अभी तक इसकी पुष्टि नहीं की है. मुक्‍त आकाश संधि के तहत 1,500 से अधिक उड़ानों का संचालन किया गया है.

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यह व्यवस्था सदस्‍य देशों के बीच विश्वास बढ़ाने और संघर्ष को टालने के लिए शुरू की गई थी- सांकेतिक फोटो (pixabay)


आर्म्‍स कंट्रोल एसोसिएशन की रिपोर्ट के मुताबिक, इन उड़ानों का मकसद सैन्य गतिविधि के बारे में पारदर्शिता को बढ़ावा देना है. साथ ही संधि के तहत हथियारों के नियंत्रण और अन्य समझौतों की निगरानी करना है. संधि में सभी देश अपने सभी क्षेत्रों को निगरानी उड़ानों के लिए उपलब्ध कराने पर सहमत हैं. हालांकि, रूस ने अभी भी कुछ क्षेत्रों में उड़ानों पर प्रतिबंध लगा रखा है.

टोही विमान का सेंसर से लैस होना अनिवार्य
संधि की शर्तों के मुताबिक, निगरानी विमान सेंसर से लैस होने चाहिए जो आर्टिलरी, लड़ाकू विमान और बख्तरबंद लड़ाकू वाहनों जैसे महत्वपूर्ण सैन्य उपकरणों की पहचान करने की निगरानी दल को क्षमता मुहैया करा सकते हों. हालांकि, सेटेलाइट्स के जरिये इससे कहीं ज्‍यादा और विस्‍तृत जानकारी आसानी से जुटाई जा सकती है. बावजूद इसके ये संधि की गई, क्‍योंकि इसके सभी सदस्‍य देशों के पास सेटेलाइट्स से निगरानी करने की क्षमता उपलब्‍ध नहीं है.

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इन उड़ानों का मकसद सैन्य गतिविधि के बारे में पारदर्शिता को बढ़ावा देना रहा- सांकेतिक फोटो (pxhere)


संधि लागू होने से पहले ही 26 देशों ने हस्‍ताक्षर करने की पुष्टि कर दी थी. संधि लागू होने के बाद बोस्निया, क्रोएशिया, एस्‍टोनिया, फिनलैंड, स्‍वीडन समेत 8 देशों ने भी हस्‍ताक्षर करने की पुष्टि कर दी. संधि के तहत सभी देश एकदूसरे के आकाश से अपने विमान गुजार सकते हैं.

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संधि से अमेरिका-रूस का निकलना क्या बदलेगा
ओपन स्काई ट्रीटी से दोनों सबसे मजबूत देशों के बाहर आने से ये साफ है कि उनके बीच तनाव दोबारा बढ़ सकता है. साल 2019 में भी दोनों ही देश एक और संधि तोड़ चुके हैं. Intermediate-Range Nuclear Forces (INF) Treaty नाम की ये संधि साल 1987 में दोनों के बीच हुआ अहम करार मानी जाती थी. इसके तहत दोनों ने ही मध्यम दूरी के घातक हथियारों को नष्ट करने का करार किया था ताकि परमाणु हथियारों की दौड़ रोकी जा सके.

क्या हो सकता है असर
अब विशेषज्ञों को डर है कि इसका असर एक और लेकिन बेहद अहम संधि पर हो सकता है. ‘New START’ नाम की ये संधि परमाणु नियंत्रण संधि है, जो फरवरी 2021 में एक्सपायर होने जा रही है. अगर ऐसे में तनाव बना रहा तो संधि आगे बढ़ने की बजाए खत्म हो जाएगी, जिससे दुनिया में परमाणु हथियारों की रेस तेजी से चल पड़ेगी.
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