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महात्मा गांधी की हत्या के बाद कैसा बीता उनके चारों बेटों का जीवन

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: January 30, 2020, 11:54 PM IST
महात्मा गांधी की हत्या के बाद कैसा बीता उनके चारों बेटों का जीवन
महात्मा गांधी के चार बेटे थे. मुखाग्नि देने केा अधिकार उन्होंने तीसरे नंबर के बेटे रामदास को दिया था

महात्मा गांधी की हत्या के बाद उनके चारों बेटों का जीवन भी अलग अलग रास्तों पर चल पड़ा था. सबसे बड़े बेटे की मृत्यु एक साल के भीतर ही हो गई जबकि एक अन्य बेटे ने साउथ अफ्रीका में रहना पसंद किया.

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  • Last Updated: January 30, 2020, 11:54 PM IST
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नईदिल्ली. गांधीजी (Mahatma Gandhi) के चार बेटे थे. इन चारों में एक सबसे बड़े हरिलाल (Harilal Gandhi) ने तो पिता से इस कदर विद्रोह किया कि जीवनभर वो सब करते रहे, जिससे पिता को कष्ट पहुंचे. बाकी बचे तीन बेटों में एक को गांधीजी बहुत पसंद करते थे, क्योंकि वो उनका आज्ञापालक था लेकिन उनका एक बेटा ऐसा भी था, जो उनकी परछाई से निकलकर अपनी खुद की जगह बना सका. अगर पेशेवर तौर पर सफलता को पैमाना मानें तो वो उनका सबसे काबिल बेटा कहा जाएगा.

गांधीजी के चार बेटों (Gandhi's son) में दो भारत में पैदा हुए थे जबकि छोटे दोनों बेटे दक्षिण अफ्रीका (South Africa) में पैदा हुए. दोनों बड़े बेटे यानि हरिलाल और मणिलाल (Manilal) हमेशा इस बात पर क्षुब्ध रहते थे कि गांधीजी ने उन्हें स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई नहीं करने दी. अगर उन्हें पिता ने पढ़ाई कराई होती तो उनका अपना एक करियर होता. वो पिता की बरगद सरीखी छाया से निकलकर अपनी कोई पहचान बना सकते थे.

हरिलाल पहले ही पिता से विद्रोह करके 1911 में उनसे संबंध तोड़कर दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट आए थे. पिता के प्रति नाराजगी और अलग जिंदगी जीने की इच्छा नंबर दो बेटे मणिलाल में भी उठती रहती थी.  हालांकि वो कभी उसे लेकर मुखऱ नहीं हुए.

मणिलाल तब पिता के साथ 1915 में भारत भी आए, जब गांधीजी पूरी तरह से दक्षिण अफ्रीका छोड़कर भारत आ गए थे. लेकिन डेढ़-दो साल ही यहां पिता के साथ रहने के बाद उन्हें हालात कुछ लगे कि वो साथ में रह नहीं पाएंगे. उन्हें अपनी स्वतंत्रता चाहिए थी. वो दो साल बाद ही वापस दक्षिण अफ्रीका चले गए.

मणिलाल ने पिता से दूर रहने का फैसला किया
उन्होंने डरबन  (Durban) में गांधीजी के फिनिक्स आश्रम को संभालने के साथ वहां के प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक समाचार पत्र इंडियन ओपिनियन (Indian opinion) का संपादन शुरू किया. 1956 में अपने निधन तक वो यही करते रहे. उन्होंने पिता से दूर दक्षिण अफ्रीका में ही बसने का फैसला कर लिया.

मणिलाल ने पिता के साथ रहना पसंद नहीं किया, इसलिए वो हमेशा के लिए दक्षिण अफ्रीका चले गए
मणि के बारे में कहा जाता है कि वो एक मुस्लिम लड़की से प्यार करते थे, उससे शादी करना चाहते थे लेकिन इसके लिए ना तो गांधीजी की अनुमति मिली और ना ही कस्तूरबा. बाद में उन्होंने गांधीजी की पसंद की एक लड़की से शादी की. इस पूरे वाकये पर दक्षिण अफ्रीका की यूनिवर्सिटी ऑफ केप की सीनियर हिस्ट्री फैकल्टी उमा धूपेलिया मिस्त्री (गांधीजी की पड़पोती) ने विस्तार से लिखा है.

रामदास थे सबसे प्रिय बेटे
गांधी के सबसे प्रिय बेटे नंबर तीन रामदास (Ramdas Gandhi) थे. जिन्हें गांधीजी ने अपने निधन पर मुखाग्नि का अधिकार दिया. रामदास आमतौर पर चुप रहने वाले खुशमिजाज बेटे थे. पिता के आज्ञापालक. कई बार जेल गए. भारत के स्वाधीनता संग्राम में भी कूदे. बाद में वो परिवार के साथ पुणे में बस गए. उनके तीन बच्चे थे. गांधीजी के चार बेटों में सबसे लंबी उम्र उन्होंने ही पाई थी.
दिल्ली में 30 जनवरी 1948 को जब गांधीजी की हत्या हुई तो पिता को मुखाग्नि उन्होंने ही दी थी. हालांकि पिता की कठोर जीवनशैली और सादगी का पालन वो उतनी कठोरता के साथ नहीं करते थे.

रामदास गांधी चार बेटों में सबसे खुशमिजाज थे. पिता ने अपनी मुखाग्नि का अधिकार उन्हीं को दिया था


सबसे ज्यादा काबिल थे देवदास
चौथे नंबर के देवदास (Devdas Gandhi) सही मायनों में सबसे पैने और बुद्धिमान बेटे थे. उन्होंने गांधीजी का विरोध कभी नहीं किया लेकिन उन्होंने इतनी शिक्षा जरूर हासिल की कि अपनी समझबूझ को आगे तक ले जा सकें. वो अच्छा लिखते-पढ़ते थे. गांधीजी भी अपने अन्य बेटों की तुलना में उन्हें ज्यादा रियायत देते थे. वो पिता से अपनी बात मनवा लेते थे.

लिखने पढ़ने में देवदास का उनका कोई जवाब नहीं था. उन्हें जानने वाले लोग उन्हें उम्दा पत्रकार मानते थे. वो हिंदुस्तान टाइम्स (Hindustan Times) में लंबे समय तक संपादक रहे. गांधीजी हमेशा अपने बेटों को शादी के लिए हतोत्साहित करते थे लेकिन देवदास ऐसे अकेले बेटे थे, जिनके विवाह पर गांधीजी ने कोई बखेडा़ खड़ा नहीं किया बल्कि वो खुशी खुशी मान गए.

किस तरह मिला मैनेजिंग एडीटर का पद
कृष्ण कांत बिरला (Krishna Kumar Birla) ने "ब्रशेज विद हिस्ट्री" (Brushes with History) नाम से एक बुक लिखी, जिसमें उन्होंने लिखा, " उन दिनों हिंदुस्तान टाइम्स में परेशनाथ मैनेजिंग एडीटर थे. लेकिन वो हाई ब्लड प्रेसर के मरीज थे. उन दिनों के लिहाज से ये बड़ी बीमारी थी. पिता नहीं चाहते थे कि उन पर ज्यादा दबाव डाला जाए. ये सोचकर पिता (घनश्याम दास बिरला) ने उनका बोझ कम करने का सोचा."

"परेशनाथ जी को सलाहकार बना दिया गया. उनकी जगह देवदास गांधी को मैनेजिंग एडीटर की जिम्मेदारी दी गई. गांधीजी अपने बेटों के जीवन को लेकर ज्यादा सोचते नहीं थे. लेकिन देवदास के मामले में वो कुछ अलग थे. हालांकि गांधीजी ने पिता से शायद ही कभी देवदास के लिए एक शब्द भी बोला हो लेकिन पिता को लगा कि देवदास के लिए उपयुक्त काम तलाशना चाहिए."

20 साल तक रहे हिंदुस्तान टाइम्स के मैनेजिंग एडीटर
देवदास 1937 में हिंदुस्तान टाइम्स के मैनेजिंग एडीटर बने और 1957 में अपने निधन तक वो ये काम निभाते रहे. उन्होंने ये काम बखूबी निभाया. वो आफिस में संपादकीय नियमित करते थे. अक्सर खुद संपादकीय लिखा करते थे. उनके सहयोगी रहे दुर्गादास ने अपनी किताब "कर्जन टू नेहरू" में याद किया कि किस तरह वो लगातार मेहनत करते थे और बढ़िया संपादक थे.

देवदास 1937 में हिंदुस्तान टाइम्स के मैनेजिंग एडीटर बने और बीस साल तक इस पद रहे. अखबार के मालिक कृष्ण कुमार बिरला ने माना, उस दौरान अखबार ने काफी तरक्की की थी. वो कई और न्यूज पेपर्स से जुड़ी संस्थाओं से जुड़े रहे.


अखबार को लोकप्रिय बनाया 
कृष्ण कुमार बिरला ने अपनी किताब में लिखा, "जब देवदास को मैनेजिंग एडीटर बनाया गया तब हिंदुस्तान टाइम्स का सर्कुलेशन कम था लेकिन ये लगातार बढ़ता चला गया. जब देवदास का निधन हुआ, तब तक अखबार का सर्कुलेशन 60,322 तक पहुंच चुका था (जो उस समय के लिहाज से बड़ी संख्या थी). वहीं बिजनेस में भी अखबार लगातार बेहतर कर रहा था. तब उसका टर्नओवर 80.61 लाख रुपए और लाभ 3.97 लाख हो चुका था."

रॉयटर्स के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में भी शामिल रहे
देवदास केवल अखबार तक ही सीमित नहीं रहते थे बल्कि कई बार तत्कालीन प्रधानमंत्री एक पत्रकार और संपादक के नाते उनसे सलाह लेते थे. उन्होंने तमाम विदेश दौरे किए. वो सभाओं को भी संबोधित करते थे. वो सरकार की अखबारों से जुड़ी कमेटी से जुड़े रहे. साथ ही उन्हें जानी मानी अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी रॉयटर्स (Reuters) ने अपने बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में भी शामिल किया.

देवदास ने की थी लवमैरिज
देवदास 28 साल के थे. वो सी. राजगोपालाचारी (c rajagopalachari) की बेटी लक्ष्मी से प्यार करते थे. लेकिन लक्ष्मी केवल 15 साल की थीं. जब उन्होंने पिता से अपनी पसंद का जिक्र किया तो पिता ने केवल इतनी शर्त लगाई कि अगर ये शादी तुम पांच साल बाद करो तो मेरी सहमति रहेगी. उन्होंने ऐसा ही किया. बाद में देवदास के तीनों बेटे राजमोहन, गोपालकृष्ण और रामचंद्र ने अपनी अलग और खास पहचान बनाई. बेटी तारा गांधी ने भी पिता का नाम किया.

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First published: January 30, 2020, 7:07 PM IST
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