जब बीरबल की मौत हुई तो बादशाह अकबर ने क्या किया था

वे इतने करीबी दोस्त थे कि उनकी मौत के बाद अकबर के जीवन में बड़ा बदलाव दिखा.

वे इतने करीबी दोस्त थे कि उनकी मौत के बाद अकबर के जीवन में बड़ा बदलाव दिखा.

मुगल बादशाह (Mughal Emperor) अकबर के दरबार के नौ रत्नों में बीरबल (Birbal) का ओहदा अलग ही था. बेहद हाजिरजवाब और हंसोड़ बीरबल न केवल वजीर-ए-आजम थे, बल्कि मुगल बादशाह (mughal emperor) के जिगरी दोस्त भी थे. कहा जाता है कि बीरबल की मौत ने अकबर को भीतर से तोड़ दिया था. यहां तक कि दरबार के काम में भी उनकी रुचि खत्म हो गई.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 29, 2020, 4:09 PM IST
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अकबर-बीरबल (Akbar-Birbal)के ढेरों किस्से हैं, जिनमें मुश्किल से मुश्किल हालात को बीरबल का तेज दिमाग झट से संभाल लेता था. बीरबल की शख्सियत के और भी पहलू दिखते हैं जिनसे ये समझ आ सके कि अकबर के दरबार में उन्हें इसकी अहमियत क्यों मिली थी. वैसे दरबार ही नहीं, बीरबल ने अपने खूबियों से बादशाह अकबर के दिल में भी खास जगह बना रखी थी. दोनों इतने करीबी दोस्त थे कि बीरबल की मौत के बाद अकबर के जीवन में बड़ा बदलाव दिखा. खाना-पीना छोड़कर वे झरोखे से देखा करते और दरबारी काम से विरक्त होते गए. लगभग सालभर तक ये चलता रहा.



हंसोड़ चेहरे वाले बीरबल का दरबार में आना

माना जाता है कि बीरबल बादशाह अकबर के दरबार में साल 1556 के दौरान शामिल हुए थे. तब लगभग 28 साल के बीरबल के हंसोड़ चेहरे पर चमकीली मूंछें थीं जो अकबर से मिलती-जुलती थीं. जल्दी ही राजसी मामलों में अपनी काबिलियत की वजह से बीरबल बादशाह के चहेते बन गए. उन्हें राजा के ओहदे से नवाजा गया. ऐसा कहा जाता है कि तब उनके पास 2000 सैनिक भी थे. तेज दिमाग और मुश्किल हालातों में भी संतुलन न खोने की क्षमता के साथ बीरबल की एक और खूबी थी. वे बृज भाषा के जानकार और अच्छे कवि भी थे. कला से बेहद प्रेम करने वाले अकबर इन्हीं खूबियों से प्रभावित होते गए और जल्दी ही दोनों की दोस्ती गहराने लगी. द प्रिंट में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार इनके रिश्ते का जिक्र इरा मुखोती की किताब The Great Mughal में काफी विस्तार से मिलता है.



माना जाता है कि बीरबल बादशाह अकबर के दरबार में साल 1556 के दौरान शामिल हुए थे

कभी नहीं मिली फटकार



जब फतेहपुर सीकरी का निर्माण हो रहा था, तब अकबर ने बीरबल के लिए भी एक किला बनवाने को कहा था ताकि उनकी मुलाकातें रोज हो सकें. ये भी माना जाता है कि 30 सालों से ज्यादा वक्त तक अकबर के खास वजीर के तौर पर काम करते हुए एक बार भी बीरबल को दरबार न आने की सजा नहीं मिली. पुर्तगाली पादरी Antonio Monserrate जो मुगलकाल के दौरान भारत आए थे, अकबर-बीरबल की दोस्ती के बारे में बताते हैं कि तब गलती करने पर लगभग सारे ही दरबारियों को बादशाह के गुस्से का सामना करना पड़ता था. ये गुस्सा अक्सर सांकेतिक सजा जैसे दरबार आने की मनाही जैसी बातों में दिखता था. यहां तक कि अकबर के करीबी दरबारियों को भी सजा मिली, जैसे मान सिंह जब महाराजा राणा प्रताप का पीछा नहीं कर सके तो उन्हें भी अकबर के गुस्से का सामना करना पड़ा था. लेकिन बीरबल के साथ ऐसा कभी नहीं हुआ. वैसे उनके अलावा कवि फैजी और तानसेन भी अकबर के गुस्से से बचे रहे.



मुगल साम्राज्य के इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायुनी ने भी अकबर-बीरबल की दोस्ती से कुछ ईर्ष्या सी जताते हुए लिखा था कि अपने अनोखे स्वभाव की वजह से बीरबल दिनोंदिन बादशाह का चहेता होता गया और उनका सबसे ज्यादा विश्वसनीय हो गया.



फतेहपुर सीकरी का निर्माण हो रहा था, तब अकबर ने बीरबल के लिए भी किला बनवाने को कहा था




जान बचाने को दौड़े आए बादशाह

आमतौर पर बाहशाह अपने दरबारियों और प्रजा से काफी दूरी रखने के लिए जाने जाते हैं. उनके जीवन के वही हिस्से सामने आए, जिनका उन्हीं के कहने पर दस्तावेजीकरण हुआ. रोज मुलाकात के बाद भी दरबारियों और सम्राटों के बीच दूरी होती थी. हालांकि अकबर और बीरबल के रिश्ते में ये दूरी नहीं दिखती है. एक वाकया ऐसा भी हुआ, जिसने सारे दरबार और प्रजा के सामने ये भेद खोल दिया कि बादशाह के लिए बीरबल के क्या मायने हैं. साल 1583 की बात है, तब फतेहपुर सीकरी में हाथियों की लड़ाई का आयोजन था. बादशाह संग सभी दरबारी हाथियों की कुश्ती का आनंद ले रहे थे कि तभी एक सबसे खतरनाक हाथी बीरबल के पास पहुंच गया और देखते ही देखते उन्हें अपनी सूंड में उठा लिया. इससे पहले कि सेनापति या सैनिक कोई कार्रवाई करें, घोड़े पर सवार अकबर तेजी से आगे बढ़े और हाथी को उकसाने लगे. अब हाथी बीरबल को छोड़कर अकबर की ओर बढ़ा तभी अचानक लड़खड़ाकर गिर पड़ा और बीरबल की जान बच गई.



यहां से शुरू हुआ बदलाव

साल 1585 में बाहशाह अकबर पंजाब प्रांत की उथल-पुथल को संभालने निकले लेकिन तब किसी को अंदाजा भी नहीं था वे वापस फतेहपुर सीकरी कभी नहीं लौटना चाहेंगे. असल में पंजाब की यात्रा के दौरान अकबर को दो बेहद निजी तकलीफों से गुजरना पड़ा. पहली थी उनके सौतेले भाई मिर्जा हकीम की मौत. मिर्जा हकीम सौतेले होने के बाद भी बादशाह को बेहद अजीज थे. वे शराब पीने के भारी शौकीन थे और आखिरकार इसी वजह से उनकी जान चली गई. लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि अकबर को इससे ज्यादा धक्का बीरबल की मौत से लगा था.



हरदम अनुशासन में रहने वाले अकबर ने बीरबल की मौत के अगले कई दिनों तक दरबार का काम देखने से इनकार कर दिया




लाश तक बरामद नहीं हुई

साल 1586 में बीरबल और ज़ैन खान कोका को स्वात और बाजौर क्षेत्रों में पश्तून युसुफ़ज़ाई के खिलाफ एक अभियान पर भेजा गया था. वहां दोनों नेताओं के बीच असहमति के कारण बीरबल के खिलाफ एक जाल बुना गया और धोखे से काबुल की धूसर पहाड़ियों से नीचे दिया गया. यहां तक कि बीरबल की लाश तक नहीं मिल सकी. अकबर के शासनकाल में ये मुगलों की सबसे बड़ी हार थी, जिसमें 8000 से ज्यादा मुगल सैनिकों की जान गई. इनमें एक बीरबल भी थे. खबर मिलने पर बादशाह की हालत किसी बच्चे सी हो गई. उन्होंने दो दिन तक न कुछ खाया और न पिया. हरदम सख्त अनुशासन में रहने वाले अकबर ने इस दौरान दरबार का कोई भी काम देखने से इनकार कर दिया. तब तुरान का राजदूत भी राजसी चर्चा के लिए अकबर के पास आया हुआ था लेकिन उन्होंने उससे मिलने से भी मना कर दिया. अपने सबसे विश्वस्त और करीबी शख्स को खोने का दुख इतना ज्यादा था कि वे दिन-दिनभर झरोखे से बाहर देखते रहते.



बीरबल की मौत के बाद अकबर के दुख में पूरा मुगल परिवार शामिल था. सारा राजकाज कुछ दिनों के लिए रुक सा गया था. तब बादशाह की हालत देख नौ-रत्नों में से एक अबुल फज्ल ने अकबरनामा में लिखा था कि वजीर की मौत ने उन्हें इतना दुख दिया कि उनका दिल हर बात से उठ गया था.



बीरबल की लाश न मिलने की वजह से बाद के लगभग सालभर तक बादशाह अकबर काफी अस्थिर रहे




खोजने के लिए जाना चाहते थे काबुल

बीरबल से ईर्ष्या करने वाले बदायुनी भी लिखते हैं कि बादशाह को किसी की मौत पर इतने सदमे में नहीं दिखा गया, जितना उन्हें इस दोस्त की मौत से हुआ. पूरे मुल्क को संभाल रहे बादशाह इस बात की कल्पना करते सिहर जाते थे कि उनके चहेते वजीर की कटी-फटी, खून से सनी लाश पहाड़ियों में कहीं पड़ी होगी. सदमे से उबरने के बाद भी अकबर बीरबल की लाश खोजने के लिए काबुल जाने की जिद पर अड़े हुए थे. वे चाहते थे कि शव का सही ढंग से अंतिम संस्कार हो सके. हालांकि बाद में दरबारियों के ये कहने पर कि बीरबल का शव सूरज की किरणों से ही पवित्र हो गया होगा, अकबर ने काबुल जाने का इरादा छोड़ दिया.



बीरबल की लाश न मिलने की वजह से बाद के लगभग सालभर बादशाह काफी अस्थिर रहे. कई बार अफवाहें उड़तीं कि बीरबल जिंदा हैं और फलां जगह देखे गए हैं. कोई कहता है कि वे संन्यासी होकर फलां जगह रह रहे हैं. जैसे ही ये बातें अकबर के कानों तक पहुंचती, वे तुरंत अपनी सेना को उस जगह भेज देते ताकि बीरबल का कुछ पता लग सके. सालभर तक ये सिलसिला चलता रहा.



कभी नहीं लौटे फतेहपुर सीकरी

इसके बाद वैसे तो अकबर दरबारी काम-काज सामान्य तरीके से करते दिखने लगे लेकिन उनके भीतर कुछ टूट गया था. वे उस फतेहपुर सीकरी में लौटने की हिम्मत नहीं जुटा सके, जहां उनके विश्वसनीय वजीर और करीबी दोस्त बीरबल की यादें थीं. वे आगे और आगे उत्तर की ओर चलते हुए काबुल गए और फिर कश्मीर. एक बार खुद अबुल फज्ल के सामने अकबर ने बीरबल को खोने की तकलीफ बांटी थी, जिसका जिक्र अकबरनामा में भी मिलता है.



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