दो देशों में जंग छिड़ जाए तो क्या खतरा होता है दूतावास पर?

दो देशों में जंग छिड़ जाए तो क्या खतरा होता है दूतावास पर?
कोरोना वायरस के कारण परेशान अमेरिका चीन को हर मोर्चे पर घेर रहा है (file photo)

अमेरिका और चीन (America and China) एक-दूसरे के दूतावास बंद करने पर तुले हुए हैं. ऐसे ही अगर दो देशों के बीच भिड़ंत की नौबत आ जाए तो इसका पहला असर एंबेसी पर पड़ता है.

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अमेरिका और चीन के बीच तनाव कम होने का नाम ही नहीं ले रहा. कोरोना वायरस के कारण परेशान अमेरिका चीन को हर मोर्चे पर घेर रहा है. अब तनाव बयानबाजियों से ऊपर डिप्लोमेटिक स्तर पर आ चुका है. अमेरिका ने ह्यूस्टन में चीनी दूतावास को बंद करने का आदेश दिया तो भड़के हुए चीन ने भी अपने यहां चेंगडू में अमेरिकी दूतावास बंद करा दिया. कूटनीतिक स्तर पर दोनों ताकतवर देशों का ये कदम काफी बड़ा माना जा रहा है. जानिए, क्या होती है एंबेसी और अगर दो देशों के बीच युद्ध छिड़ जाए तो यहां क्या होता है.

क्या है दूतावास और क्या करता है?
एंबेसी या दूतावास किसी देश में किसी दूसरे देश का वो इमारत या जगह है, जो उस बाहरी देश के प्रतिनिधि का काम करती है. ये एक तरह से दो देशों के बीच बातचीत का आसान जरिया है. एंबेसी में कई अधिकारी तैनात होते हैं, जो अपने देश के प्रतिनिधि का काम करते हैं. इन्हें राजदूत या एंबेसडर कहते हैं. इनके बयानों का काफी महत्व होता है. ये कई तरह के काम करते हैं, जैसे जिस देश में वे रह रहे हों, उनके साथ अपने देश के किसी नेता की मीटिंग करवाना. किसी संधि के दौरान भी ये लोग बड़ा रोल निभाते हैं. साथी ही ये उस देश में बसे अपने नागरिकों की भी मदद करते हैं. जैसे अमेरिका में बसे भारतीयों के लिए उस स्टेट की इंडियन एंबेसी जिम्मेदार होगी. वीजा जैसे मामलों में भी ये काफी मदद करते हैं. आसान शब्दों में समझा जाए तो ये दो देशों के बीच पुल की तरह काम करते हैं.

दोनों देशों के बीच टकराव की नौबत आ जाए तो भी दूतावास और वहां के लोग सुरक्षित रहते हैं (Photo-moneycontrol)

क्या हो अगर दो देशों के बीच तनाव बढ़ जाए?


ऐसे में दूतावास का माहौल क्या होता है? अगर दोनों देशों के बीच टकराव की नौबत आ जाए तो भी दूतावास और वहां के लोग सुरक्षित रहते हैं. आमतौर पर ये माना जाता है कि उन्हें डिप्लोमेटिक इम्युनिटी मिली हुई है. ये इम्युनिटी एक तरह का रक्षा कवच होता है जो एंबेसी में काम करने वालों को सुरक्षा देता है. साल 1961 में हुए विएना कंवेंशन ऑन डिप्लोमेटिक रिलेशन्स में ये तय हुआ था कि डिप्लोमेट को खास अधिकार मिलेंगे ताकि वे जिस देश में रह रहे हों, वहां सेफ रह सकें. देशों के बीच तनाव बढ़ने पर इन्हें सबसे पहले सुरक्षित निकाला जाता है.

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कब होता है खतरा?
हालांकि कई हालातों में ये इम्युनिटी खत्म भी हो जाती है. जैसे अगर दूतावास में रह रहे लोग जासूसी के आरोप में पकड़े गए तो होस्ट कंट्री उनपर मुकदमा भी कर सकती है. या फिर दूतावास बंद करवा सकती है. अमेरिका के ह्यूस्टन में यही हुआ. अमेरिकी सरकार का आरोप है कि चीन के दूतावास के लोग जासूसी कर रहे थे. साथ ही बौद्धिक संपदा यानी अमोरिकी रिसर्च की चोरी में इनवॉल्व थे. इसी पर भड़के हुए अमेरिका ने चीन का दूतावास खाली करवा दिया और इमारत अपने कब्जे में ले ली.

भड़के हुए अमेरिका ने चीन का दूतावास खाली करवा दिया और इमारत अपने कब्जे में ले ली


जापान और अमेरिका के बीच ठनी
इसी तरह से अगर दो देशों के बीच खुला युद्ध ही छिड़ जाए तो एंबेसी में कई तरह की चीजें घट सकती हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण जापान और अमेरिका को माना जाता है. ये दूसरे विश्व युद्ध के समय की बात है. तब जापान के दो राजनयिकों को अमेरिका में काफी प्रभावशाली माना जाता था. सबुरो कुरुसु और किचिसाबुरो नोमुरा नाम के दोनों ही डिप्लोटमेट्स को ये काम मिला था कि वे जापान और अमेरिका के बीच लड़ाई को रोकें. वे इस काम के लिए अमेरिकी सरकार से मुलाकात करने गए हुए थे. उसी मीटिंग के बीच पता चला कि जापान ने अमेरिका पर हमला कर दिया है. ये हमला पर्ल हार्बर अटैक के नाम से जाना जाता है.

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दिसंबर 1941 में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी जमीन पर ये पहला हमला था. इस हमले में लगभग 2,400 से अधिक अमेरिकी सैनिक मारे गए थे और 1000 से ज्यादा घायल हो गए थे. इस हमले के बाद अमेरिका सीधे युद्ध में कूद पड़ा. हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु हमला जापान से अमेरिका का इसी बात पर बदला माना जाता है.

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क्या हुआ था राजदूतों के साथ?
अब वापस लौटते हैं उन दो जापानी राजदूतों पर, जो अमेरिका से सुलह की बात करने पहुंचे थे. एक तरफ वे सुलह की बात कर रहे थे और उसी वक्त जापान ने ये हमला किया था. लिहाजा दोनों को नजरबंद कर लिया गया और दूसरे जापानी लोगों के साथ कैद में भेज दिया. विडंबना ये है कि तीन महीने पहले ही टाइम मैगजीन के कवर पर राजदूत नोमुरा की तस्वीर और उनके प्रभाव का गुणगान छपा था. ये पता नहीं चल सका कि बाद में वे दोनों राजदूत कब रिहा हुए. माना जाता है कि उन्हें पहले से ही जापान के हमले की जानकारी रही होगी और वे अमेरिका का ध्यान बंटाए रखने के लिए संधि की बात कर रहे थे.

पर्ल हार्बर अटैक के बाद अमेरिका ने जापानी राजदूतों को नजरबंद कर लिया था (Photo-navylive)


एंबेसी का बंद किया जाना पहली बार नहीं
कई बार दो देशों के बीच तनाव के दौरान इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं. ये एक तरह का संकेत है कि दो देशों के बीच तनाव इतना है कि अब वे किसी तरह का कूटनीतिक संबंध नहीं चाहते हैं. कई बार दो देशों का तनाव वहां के नागरिकों पर भी हावी हो जाता है. ऐसे में वे एंबेसी पर हमला भी कर देते हैं. कई बार ऐसी घटनाएं होती आई हैं. इन हालातों में जिस देश में एंबेसी है यानी होस्ट कंट्री की ये ड्यूटी होती है कि वे एंबेसी और उसके स्टाफ को किसी भी नुकसान से बचाएं. इसके लिए वे पुलिस और सेना की मदद भी ले सकते हैं. अगर वे ऐसी नहीं कर सके तो दो देशों के बीच तनाव काफी बढ़ सकता है.

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क्यों है अमेरिका भड़का
अब अगर वर्तमान हालातों की बात करें तो अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और भी चीनी दूतावासों को बंद कर सकता है. इकनॉमिक टाइम्स के मुताबिक ट्रंप ने वाइट हाउस में डेली ब्रीफिंग के दौरान ये बात कही है. चीनी दूतावास को बंद करने की पहल जस्टिस डिपार्टमेंट के इस आरोप के बाद आई, जब उसने चीनी दूतावास के लोगों पर अमेरिकी बौद्धिक संपदा की चोरी और जासूसी का आरोप लगाया.
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