#MissionPaani: जानिए भारत को चीन से कैसे सीखना चाहिए पानी का इस्तेमाल

चीन कम भूमि और कम पानी में हमसे कहीं ज्यादा कृषि उत्पादन करता है. उसने पानी के लिए खास नीति बहुत पहले बना रखी है, लिहाजा वो जल संकट से दूर चला गया है, जो हम पर आज मंडरा रहा है.

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आरएन भास्कर
चीन ज्यादा बड़ा देश है लिहाजा उसके पास भारत से ज्यादा जमीन भी है. लेकिन वास्तविकता ये है कि भारत के पास उसकी तुलना में चार गुना ज्यादा जलीय भूमि है (अगर ये देखा जाए कि कितनी भूमि पर पानी है). भारत के पास दुनिया में ताजे पानी के सबसे बड़े जलाशय भी हैं. इसके बाद भी अगर हम पानी को ज्यादा बर्बाद करते रहे हैं तो चीन ने कम पानी का असरदार इस्तेमाल सीख लिया है.

पानी के कमी की बात पर अगर हमारे यहां अब चिंता हो रही है तो चीन ने इस बारे में करीब 20 साल पहले ही सोचना शुरू कर दिया था. उसने 20 सालों पहले ही ऐसी कई बातें करनी शुरू कर दी थीं, जिन पर अब भी हमारा ध्यान नहीं है. उसने लंबे समय पहले ही ब्रह्मपुत्र में बहते पानी पर नजर दौड़ा दी. बेशक इस नदी का दो तिहाई तिहाई हिस्सा चीन में है बाकी एक तिहाई भाग भारत और बांग्लादेश होकर बहता है. ब्रह्मपुत्र एशिया की सबसे बड़ी नदी है.

चीन में इस नदी को यारलंग कहा जाता है. जब ये चीन में बहती है तो वहां केवल इसमें 20 फीसदी पानी ही होता है. इसका 60 फीसदी पानी अरुणाचल प्रदेश से आता है. जबकि बाकी बचा 20 फीसदी पानी भारत और बांग्लादेश से. यही एक बड़ी वजह भी है कि चीन लगातार अरुणाचल पर दावा जताता रहता है, जिसका भारत पूरी ताकत से खंडन करता है.




चीन ने ये पहले ही जान लिया था 
उसने 2010 में ये भी जान लिया था कि उसकी बढ़ती इंडस्ट्री और व्यापार के लिए पानी की बहुत जरूरत बढ़ने वाली है. इसमें भी कोई शक नहीं कि चीन की पानी की जरूरत रोज-ब-रोज बढ़ती जा रही है. उसको अपनी इंडस्ट्री के लिए ज्यादा पानी चाहिए लिहाजा उसने इस पहलू पर काम करके तय कर लिया कि उसका कृषि सेक्टर कम पानी का इस्तेमाल करे और ज्यादा उत्पादन हो.

दुनिया के देशों के पास कुल भूमि और पानी की स्थिति


रूस से आएगी दुनिया की सबसे लंबी पानी की नहर 
चीन ज्यादा पानी की तलाश में रूस की ओर भी देख रहा है. बिल्कुल उसी तरह जैसे की उसने रूस से लेकर चीन के बीच तेल और गैस पाइपलाइन बिछाई है. रूस ताजे पानी का दुनिया का सबसे स्रोत (इसमें पिघलते ग्लेशियर शामिल नहीं) है. चीन ने 2015 में रूस से दुनिया की सबसे बड़ी नहर के निर्माण के समझौते पर साइन किया. ये नहर रूस से मध्य चीन तक आएगी और 2000 किलोमीटर लंबी होगी. इसके बाद चीन इस साइबेरिया की बाइकल झील से आने वाले इस पानी को छोटी नहरों और पाइप के जरिए चीन के दूसरे हिस्सों में पहुंचाएगा.

ये पानी मध्य चीन की इंडस्ट्रीज और सिंचाई के काम में मददगार होगा, लेकिन इसके बगैर भी चीन दूसरे जिन तरीकों से पानी को बचाकर उनका उपयोग कर रहा है, वो वाकई समझने लायक है.

रूस और चीन के बीच 2000 किलोमीटर लंबी पानी की नहर बन रही है, जो दुनिया में सबसे लंबी नहर होगी


कम पानी में ज्यादा कृषि उत्पादन
पिछले 20 सालों से चीन इसी रास्ते पर चलकर ये सुनिश्चित कर रहा है कि किस तरह कम पानी से ज्यादा कृषि उत्पादन करे. भारत को ये सीखना चाहिए. हमारी ये खुशकिस्मती है कि हमारे पास इतना पानी था कि हमने कभी अपने किसानों को ये नहीं सिखाया कि किस तरह उसका सावधानी से इस्तेमाल करें. हमने कभी नदियों और तालाबों को प्रदूषित करने वाली इंडस्ट्रीज और बिजनेस को दंडित भी नहीं किया. उसी तरह जमीन से पानी निकालने वालों से कड़ाई नहीं की.

हम इस चार्ट के जरिए समझ सकते हैं कि किस तरह चीन के किसान कम भूमि और कम पानी में कई गुना ज्यादा उत्पादन कर रहे हैं. वाकई कहा जा सकता है कि कृषि के मोर्चे पर चीन कमाल कर रहा है.

चार्ट जो बताता है कि चीन में प्रति किसान कृषि योग्य जमीन कम है और पानी का इस्तेमाल भी कम लेकिन उत्पादन कई गुना ज्यादा


चार बातें जो चीन कर रहा है
पहला - चीन ने समझ लिया है कि किस तरह कम पानी में ज्यादा पैदावार पाओ. उसने इसका पूरा एक सिस्टम बना रखा है. जो इसे तोड़ता है, उस पर ज्यादा पानी के इस्तेमाल के एवज में आर्थिक दंड के साथ दूसरे चार्ज भुगतने होते हैं.

दूसरा- उसने ऐसे आइटम्स की सूची बना रखी है, जो ज्यादा पानी लेते हैं. फिर उसी के लिहाज से उनका एक ऐसा मानक तैयार किया गया है कि उन चीजों का इस्तेमाल अगर घर में हो तो किस तरह उन पर कम पानी का खर्च हो.

तीसरा- वो पानी को रिसाइकिल करता है और कहा जा सकता है कि इस काम में वो दुनिया में सबसे बढिया काम कर रहा है.

पानी का रिसाइकल करने के मामले में चीन दुनिया में सबसे आगे निकल चुका है


चौथा- चीन ने पानी को लेकर लड़ाई से बचने की नीतियां भी बना रखी हैं. इसीलिए भारत और चीन में पानी को लेकर लड़ाई की आशंका सबसे कम है. लेकिन भारत में राज्यों के बीच ही पानी को लेकर ज्यादा संघर्ष चलता रहता है. भारत ने देश के अंदर ही पानी के इस्तेमाल को लेकर कोई नार्म नहीं बना रखा है.

और सबसे आखिरी बात
चीन पानी को प्रदूषित या ज्यादा पानी का इस्तेमाल करने वाली इंडस्ट्री को दंडित करता है. शहरों में इस तरह प्लानिंग की गई है कि वो फ्लशिंग और वाशिंग में रिसाइकल पानी का ही इस्तेमाल करें. नीतियां तो ये भी बनाई गई हैं कि उसकी जनता और कृषि कार्यों में इस्तेमाल किये जा चुके पानी का फिर से कैसे प्रयोग किया जाए.

यूं तो चीन से भारत कई बातें सीख सकता है लेकिन पानी के संबंध में बातों पर तुरंत जानना और अमल में लाया जाना चाहिए. एक तरफ तो क्लाइमेट चेंज का संकट गहरा रहा है तो दूसरी ओर भूजल भी का पानी कम हो रहा है. भारत में नीतिनिर्धारकों पर इस पर कुछ करने की जरूरत है.
(लेखक moneycontrol.com में कंसल्टिंग एडीटर हैं)
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