क्यों फिर आर्टिकल 35ए पर मचा है बवाल, क्या इसे हटा सकती है केंद्र सरकार

केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर में अतिरिक्त दस हजार सैनिकों को भेजे जाने के बाद ये चर्चाएं तेज हो गई हैं कि आर्टिकल 35ए को हटाया जा सकता है, क्या वाकई हो सकता है ऐसा और क्या हैं इसके प्रावधान, जानिए इस बारे में...

News18Hindi
Updated: July 29, 2019, 3:01 PM IST
क्यों फिर आर्टिकल 35ए पर मचा है बवाल, क्या इसे हटा सकती है केंद्र सरकार
सुरक्षा के साये में श्रीनगर
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Updated: July 29, 2019, 3:01 PM IST

जम्मू-कश्मीर में अतिरिक्त सुरक्षाबलों को भेजे जाने के बाद ये खबरें तेजी से फैल रही हैं कि केंद्र आर्टिकल 35ए में बदलाव कर सकती है. इन अटकलों ने घाटी का सियासी माहौल गरमा दिया है. पीडीपी की मुखिया महबूबा मुफ्ती ने चेतावनी दी है कि अगर ऐसा हुआ तो घाटी में आग लग जाएगी. सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या केंद्र इस समय घाटी से आर्टिकल 35ए हटा सकती है. कानून या संविधान इस बारे में क्या कहता है.


अनुच्छेद 35ए को हटाने के बारे में हमेशा कहा जाता रहा है कि जब चुनी हुई राज्य सरकार इसके लिए विधानसभा में बहुमत से प्रस्ताव पारित नहीं करतीं तब तक इसे नहीं हटाया जा सकता है. लेकिन संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि ये व्यवस्था केवल राष्ट्रपति द्वारा जारी एक आदेश पर की गई है. लिहाजा इसे हटाने के लिए भी राष्ट्रपति का एक आदेश ही काफी होगा, बशर्ते राज्य सरकार इसकी सलाह राष्ट्रपति को दें.


चूंकि अभी राज्य में कोई सरकार नहीं है. राष्ट्रपति शासन लागू है. लिहाजा ऐसी सलाह जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल भी दे सकते हैं. फिलहाल ये मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन भी है. पांच साल पहले ये याचिका सुप्रीम कोर्ट में डाली गई थी.


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हाल ही में जम्मू-कश्मीर में 10 हजार अतिरिक्त सुरक्षाबल भेजे गए हैं, जिसके बाद घाटी की राजनीति गरमा गई है. स्थानीय नेता सवाल खड़े कर रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी ने वर्ष 2019 के आम चुनावों से पहली जारी घोषणापत्र में 35ए हटाने का वादा किया भी है. आर्टिकल 35A जम्मू-कश्मीर के स्थानीय निवासियों को विशेष अधिकार देता है.




जम्मू-कश्मीर में हाल में अतिरिक्त सैन्य बल की तैनाती की गई है


क्या है आर्टिकल 35A
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35A भारतीय संविधान का वह अनुच्छेद है जो जम्मू-कश्मीर विधानसभा को लेकर प्रावधान करता है. यह राज्य को यह तय करने की शक्ति देता है कि जम्मू का स्थायी नागरिक कौन है?

  • ये कानून जम्मू-कश्मीर में ऐसे लोगों को कोई भी प्रॉपर्टी खरीदने या उसका मालिक बनने से रोकता है जो वहां के स्थायी नागरिक नहीं हैं.

  • आर्टिकल 35A जम्मू-कश्मीर के अस्थायी नागरिकों को वहां सरकारी नौकरियों और सरकारी सहायता से भी वंचित करता है.-

  • अनुच्छेद 35A के मुताबिक अगर जम्मू-कश्मीर की कोई लड़की राज्य के बाहर के किसी लड़के से शादी कर लेती है तो उसके जम्मू की प्रॉपर्टी से जुड़े सारे अधिकार खत्म हो जाते हैं. साथ ही जम्मू-कश्मीर की प्रॉपर्टी से जुड़े उसके बच्चों के अधिकार भी खत्म हो जाते हैं.




किसे माना जाता है जम्मू-कश्मीर का स्थायी नागरिक?
वैसे तो जम्मू-कश्मीर के संविधान के मुताबिक, वहां का स्थायी नागरिक वो है जो 14 मई 1954 को राज्य का नागरिक रहा हो या फिर उससे पहले के 10 सालों से राज्य में रह रहा हो और उसने वहां संपत्ति हासिल की हो.

कश्मीर के पूर्व महाराजा हरि सिंह द्वारा नोटिस के अनुसार जम्मू-कश्मीर का स्थायी नागरिक वह है जो जम्मू-कश्मीर में ही 1911 या उससे पहले पैदा हुआ और रहा हो. या जिन्होंने कानूनी तौर पर राज्य में प्रॉपर्टी खरीद रखी है.

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जम्मू-कश्मीर का गैर स्थायी नागरिक लोकसभा चुनावों में तो वोट दे सकता है, लेकिन वो राज्य के स्थानीय निकाय यानी पंचायत चुनावों में वोट नहीं दे सकता.

आर्टिकल 35A अस्तित्व में कैसे आया?
महाराजा हरि सिंह जो कि आजादी से पहले जम्मू-कश्मीर के राजा हुआ करते थे. उन्होंने दो नोटिस जारी करके यह बताया था कि उनके राज्य की प्रजा किसे-किसे माना जाएगा? ये दो नोटिस उन्होंने 1927 और 1933 में जारी किये थे. इन दोनों में बताया गया था कि कौन लोग जम्मू-कश्मीर के नागरिक होंगे?

महाराजा हरिसिंह ने दो नोटिसों के जरिए बताया था कि कौन कश्मीर का स्थायी निवासी माना जाएगा


फिर जब भारत की आजादी के बाद अक्टूबर, 1947 में महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये. तो इसके साथ ही भारतीय संविधान में आर्टिकल 370 जुड़ गया. यह आर्टिकल जम्मू-कश्मीर को विशेषाधिकार देता था. इसके बाद केंद्र सरकार की शक्तियां जम्मू-कश्मीर में सीमित हो गई. अब केंद्र, जम्मू-कश्मीर में बस रक्षा, विदेश संबंध और संचार के मामलों में ही दखल रखता था.

राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने संविधान में 35ए अनुच्छेद जोड़ा था
इसके बाद 14 मई, 1954 को राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने एक आदेश पारित किया. इस आदेश के जरिए संविधान में एक नया अनुच्छेद 35A जोड़ दिया गया. संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत यह अधिकार दिया गया था.

राष्ट्रपति का यह आदेश 1952 में जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच हुए 'दिल्ली समझौते' के बाद आया था. दिल्ली समझौते के जरिए जम्मू-कश्मीर राज्य के नागरिकों को भारतीय नागरिकता प्रदान की गई थी. 1956 में जम्मू-कश्मीर का संविधान लागू होने के साथ ही इस व्यवस्था को लागू भी कर दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता कौन हैं और उनकी मांगें क्या हैं?
वर्ष 2014 में एक एनजीओ ने अर्जी दाखिल कर इसको समाप्त करने की मांग की. इस NGO, जिसका नाम वी द सिटिजन्स (We The Citizens) है ने आर्टिकल 35A की वैधता को चुनौती दी है. इसका आरोप है कि दूसरी चीजों के साथ ही यह आर्टिकल भारत की एकता की भावना के खिलाफ है. यह भारतीय नागरिकों की एक श्रेणी के अंदर ही एक श्रेणी बना देता है.

साथ ही दूसरे राज्यों से आने वाले भारतीय नागरिकों को जम्मू-कश्मीर में प्रॉपर्टी खरीदने और रोजगार पाने से रोकता है. यह मौलिक अधिकारों का हनन करता है.



दूसरी याचिकाकर्ता चारू वालिया खन्ना ने इस आधार पर इस आर्टिकल को चुनौती दी है कि यह महिलाओं के राइट टू प्रॉपर्टी को अनदेखा करता है. क्योंकि अगर वह एक ऐसे इंसान से शादी कर लेती है जो कि कश्मीरी नागरिक नहीं है तो उसके  प्रॉपर्टी से जुड़े सारे अधिकार खत्म हो जाते हैं. साथ ही संसद के पास ही संविधान में बदलाव की क्षमता होती है. जबकि राष्ट्रपति के आदेश से आर्टिकल 35A को संविधान में शामिल कर लिया गया था. और इसमें संसद की अनदेखी की गई है.

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इसको हटाने पर घाटी में क्या प्रतिक्रिया हो सकती है

  • बड़े पैमाने पर विद्रोह की स्थिति आ सकती है

  • बड़े स्तर पर अशांति फैल सकती है.

  • साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि अगर आर्टिकल 35A खत्म हो जाता है तो बड़े स्तर पर घाटी की मुस्लिम बहुल जनसंख्या में बदलाव आ सकते हैं.

  • य़े कई मामलों में जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता को भी कम कर देगा.

  • इससे पहले भी 35A पर सुनवाई के दौरान नेशनल कांफ्रेंस के फारुख अब्दुल्ला और राज्य की तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने चेतावनी भरे बयान दिये थे. महबूबा मुफ्ती ने तो यहां तक कह दिया था कि अगर आर्टिकल 35A के साथ खिलवाड़ किया जाता है तो कोई भी तिरंगा उठाने वाला नहीं बचेगा.

  •  प्राइवेट सेक्टर निवेश भी इन कानूनों के चलते प्रभावित हो सकता है.


इसकी वजह से क्या गलत प्रभाव पड़ा है

अनुच्छेद 35A की वजह से जम्मू-कश्मीर में पिछले कई दशकों से रहने वाले बहुत से लोगों को कोई भी अधिकार नहीं मिला है. 1947 में पश्चिमी पाकिस्तान को छोड़कर जम्मू में बसे हिंदू परिवार आज तक शरणार्थी हैं.

एक आंकड़े के मुताबिक 1947 में जम्मू में 5 हज़ार 764 परिवार आकर बसे थे. इन परिवारों को आज तक कोई नागरिक अधिकार हासिल नहीं हैं. अनुच्छेद 35A की वजह से ये लोग सरकारी नौकरी भी हासिल नहीं कर सकते. और ना ही इन लोगों के बच्चे यहां व्यावसायिक शिक्षा देने वाले सरकारी संस्थानों में दाखिला ले सकते हैं.

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First published: July 29, 2019, 1:48 PM IST
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