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क्या है आरे कॉलोनी, जिसे मुंबई का फेफड़ा कहा जाता है, क्यों चर्चाओं में

मुंबई में आरे कॉलोनी को इस शहर का फेफड़ा कहा जाता है, जहां से इस शहर की आबोहवा शुद्ध होती है और यहां का पर्यावरण बचा रहता है.

मुंबई में आरे कॉलोनी को इस शहर का फेफड़ा कहा जाता है, जहां से इस शहर की आबोहवा शुद्ध होती है और यहां का पर्यावरण बचा रहता है.

मुंबई की आरे कॉलोनी फिर चर्चाओं में है. दरअसल मुंबई का ये लंबा चौड़ा इलाका अपनी जबरदस्त ग्रीनरी के लिए फेमस है. ये भी कहा जाता है कि इस इलाके के कारण ही मुंबई का पर्यावरण और हवा की शुद्धता में संतुलन बना रहता है. ये पूरा इलाका मानव निर्मित है. इसलिए एक उदाहरण भी है कि किस तरह ग्रीनरी बनाई जा सकती है.

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महाराष्ट्र में आरे कॉलोनी के जंगल को बचाने के लिए पर्यावरण प्रेमी और कार्यकर्ता विरोध प्रदर्शन तेज करने की तैयारी में हैं. दरअसल एकनाथ शिंदे की नई महाराष्ट्र सरकार ने आरे कॉलोनी को लेकर पुरानी सरकार के फैसले पलट दिया है. अब ये सरकार वहां फिर हजारों पेड़ कटवाकर मेट्रो कारशेड बनाने जा रही है. उद्धव सरकार ने विरोध के बाद फडणवीस सरकार के इस काम को रोक दिया था. इस कदम का बहुत स्वागत किया गया था.

नई सरकार के फैसले से पर्यावरण प्रेमियों और कार्यकर्ताओं में गुस्सा है. 1,800 एकड़ में फैले इस आरे फॉरेस्ट को अक्सर ‘मुंबई का फेफड़ा’ कहा जाता है. आरे जंगल में तेंदुओं के अलावा जीव-जंतुओं की करीब 300 प्रजातियां पायी जाती हैं. यह उपनगर गोरेगांव में स्थित है.

मुंबई जब फडणवीस सरकार थी, तब इस इलाके में मेट्रो कारशेड बनाने के लिए 2500 पेड़ काट जाने थे. विवाद बढ़ा तो मामला कोर्ट में पहुंचा. हालांकि मुंबई हाईकोर्ट ने पेड़ काटे जाने को लेकर आदेश जारी कर दिए थे. लेकिन इसके बाद जब उद्धव ठाकरे सरकार सत्ता में आई तो उसने इस प्रोजेक्ट को रोक दिया. इसे लेकर उसकी काफी तारीफ भी हुई.

अब हम समझते हैं कि आरे कॉलोनी क्या है. ये क्यों मुंबई के लिए महत्वपूर्ण है. कैसे इस पूरे इलाके को हरा-भरा किया गया. आरे कॉलोनी की ग्रीनरी ही इसकी पहचान है.

आरे कॉलोनी मुंबई का ऐसा इलाका है, जो काफी लंबा चौड़ा है. इसमें खूब ग्रीनरी है. जंगल हैं. हजारों-लाखों पेड़ हैं. जंगली जीव जंतु पलते हैं.

क्यों मेट्रो प्रोजेक्ट के लिए चिह्नित की गई ये जगह

2014 में शुरू हुए मेट्रो प्रोजेक्ट का पहला फेज वर्सोवा से लेकर घाटकोपर तक पूरा हो चुका है. इसके विस्तार के बाद मेट्रो को पार्किंग शेड की जरूरत पड़ी. पूरी मुंबई खंगालने के बाद मेट्रो परियोजना से जुड़ी कंपनी को आरे कॉलोनी शेड निर्माण के लिए सही जगह लगी. बीएमसी ने भी पेड़ों को काटे जाने की मंजूरी दे दी. मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के प्रस्ताव के मुताबिक कुल 2702 पेड़ों में से 2,238 पेड़ों को काटा जाना था. बाकी को यहां से ट्रांसफर किया जाना था.

जैसे ही इस फैसले के बारे में मुंबई वासियों को पता चला उन्होंने इसका विरोध करना शुरू कर दिया. मुंबई जैसे कंक्रीट के जंगल वाले शहर में आरे कॉलोनी राहत की सांस की तरह है. यहां के बड़े ग्रीन पैच की वजह से वातावरण शुद्ध बना रहता है. तब लता मंगेशकर जैसी बड़ी शख्सियतों ने इसका विरोध किया. रवीना टंडन ने इसके खिलाफ ट्वीट किए. लोग पेड़ों के काटने के विरोध में चिपको आंदोलन की तरह इकट्ठा होने लगे.

1951 में नेहरू ने इस कॉलोनी का पहला पौधा लगाया था. इसके बाद बड़े पैमाने पर लोगों ने यहां पौधे लगाए, जिससे भविष्य में ये इलाका जबरदस्त हरा-भरा हो गया.

क्यों इसको काटा जाना खतरनाक हो सकता है

विरोध के दौरान ये भी बताया गया कि पेड़ों का काटा जाना सिर्फ वातावरण के लिए ही खतरनाक नहीं होगा. बल्कि इसकी वजह से मुंबई के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास बाढ़ जैसा खतरा पैदा होगा. पर्यावरणविदों ने बताया कि इन पेड़ों की वजह से बारिश का पानी रुकता है. अगर पेड़ नहीं होंगे तो बारिश का अतिरिक्त पानी मीठी नदी में जाएगा. इससे इलाके में बाढ़ का खतरा पैदा होगा.

नेहरू ने रखी थी आरे कॉलोनी की नींव

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आरे कॉलोनी की नींव रखी थी. 1951 में मुंबई में डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए पंडित नेहरू ने आरे मिल्क कॉलोनी की नींव रखी थी. इस मौके पर उन्होंने पौधारोपण किया था. नेहरू के पौधारोपण के बाद यहां इतने लोगों ने पौधा रोपा कि कुछ ही वर्षों में ये इलाका जंगल में तब्दील हो गया. ये पूरा इलाका 3166 एकड़ में फैला है. जहां चारों तरफ सिर्फ पेड़ ही पेड़ नजर आते हैं.

दारा खुरोड़ी का था आइडिया

1949 में मुंबई में डेयरी उत्पादन को बढ़ावा दिए जाने को लेकर आरे मिल्क कॉलोनी की स्थापना के विचार की शुरुआत हुई थी. यह विचार मूलत: दारा खुरोड़ी का था जिन्हें मुंबई में डेयरी सेक्टर का प्रणेता माना जाता है. देश में दुग्ध क्रांति के लिए चर्चित रहे डॉक्टर वर्गीज़ कुरियन के साथ दारा को संयुक्त रूप से 1963 में रैमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

मुंबई की हरी भरी आरे कॉलोनी और इससे लगा जंगल. इसी इलाके के एक एरिया को फिल्म सिटी के तौर पर भी विकसित किया गया.

इसी जंगल में बनी फिल्मसिटी

आरे मिल्क कॉलोनी का विस्तार काफी है, जिसमें 12 गांव या इलाके शामिल हैं : साई, गुंडगांव, फिल्मसिटी, रॉयल पाम्स, डिंडोशी, आरे, पहाड़ी गोरेगांव, व्यारावाल, कोंडिविटा, मरोशी या मरोल, परजापुर और पासपोली. इन तमाम इलाकों को मिलाकर आरे मिल्क कॉलोनी की अवधारणा रखी गई थी और 1977 में इसी इलाके में फिल्मों की शूटिंग की लोकेशन के लिहाज़ से 200 हेक्टेयर के क्षेत्र में फिल्मसिटी की शुरुआत हुई थी, जो आज मुंबई का काफी प्रसिद्ध इलाका है.

नैनीताल जैसा है आरे का जंगल

नेहरू के पौधारोपण के बाद पौधे लगाने के जन अभियान से जंगल बनी आरे कॉलोनी कुछ ही सालों में एक खूबसूरत और हरे भरे जंगल में तब्दील होकर मुंबई की धड़कन बन गई थी. इसका प्राकृतिक सौंदर्य आकर्षक था और 1958 में मशहूर फिल्मकार बिमल रॉय ने अपनी क्लासिक फिल्म मधुमती के लिए यहां शूटिंग की थी. असल में, बिमल दा इस फिल्म के लिए नैनीताल में शूट कर चुके थे और उन्हें उस सीन की मैचिंग के लिए जब शूट करना पड़ा, तो आरे के जंगल में उन्होंने नैनीताल की झलक देखी थी.

छोटा कश्मीर, चिड़ियाघर और नेशनल पार्क

आरे मिल्क कॉलोनी पर्यावरण के लिहाज़ से मुंबई के लिए बेहद महत्वपूर्ण रही है. यहां बगीचे, पशुपालन, नर्सरियां और झीलें हैं. यहां पिकनिक स्पॉट के तौर पर छोटा कश्मीर नाम से एक जगह है जो भरपूर हरियाली और झील से घिरी हुई है और पर्यटकों के लिए खासा आकर्षण है. इसके साथ ही, एक चिड़ियाघर और संजय गांधी नेशनल पार्क भी आरे से सटा हुआ है.

Tags: Deforestation, Eknath Shinde, Mumbai

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