जानिए क्या है BCG, क्यों हो रही है इसकी कोरोना वारयस के लिए चर्चा

जानिए क्या है BCG, क्यों हो रही है इसकी कोरोना वारयस के लिए चर्चा
बीसीजी वैक्सीन को लेकर दी जा रही दलीलेें सिरे से खारिज नहीं की जा सकतीं.

हाल ही में सार्स कोव2 (SARS CoV-2) के लिए BCG का प्रयोग की बात उठी थी जिसे ICMR ने कहा था कि अभी उसका अनुमोदन नहीं किया जा सकता. बीसीजी की सुर्खियों में आने की कई ठोस वजहें हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 18, 2020, 4:07 PM IST
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नई दिल्ली: कोरोना वायरस (Corona virus) के इलाज के लिए दुनिया भर में तरह तरह के इलाज को आजमाया जा रहा हैइसी बीच यह खबर भी आई की बीसीजी (BCG) का टीका (Vaccine) जो भारत में भी बच्चों को जन्म के बाद दिया जाता है सोर्स कोव-2 ( SARS CoV-2) पर असरदार हो सकता है. ICMR ने इस पर शोध पर आवश्यकता बता कर इसे फिलहाल खारिज किया है. आइए जानते हैं क्या है बीसीजी और इसकी चर्चा कितनी सार्थक है.

क्या है बीसीजी
बैसिलस कैलमेट-गुएरिन यानि बीसीजी एक वैक्सीन है जो टीबी जैसी बीमारी के लिए इस्तेमाल में लाई जाती है. यह वैकसीन उन देशों में दी जाने की सलाह दी जाती है जहां टीबी यानि टुबरकुलोसिस या कोढ़ यानि लेपरोसी जैसी बीमारियां आम हों. यह टीका बच्चे जन्म के बाद जल्द से जल्द देने की सलाह दी जाती है. भारत में यह टीका आम है.

केवल टीबी से ही नहीं बचाता बीसीजी



बताया जाता है कि बीसीजी टीबी के अलावा बुरुली अल्सर जैसे संक्रमण और टीबी के इतर वाले माइकोबैक्टीरिया संक्रमण पर भी प्रभावकारी होता है. कई बार यह ब्लैडर कैंसर के इलाज में भी कारगर सिद्ध हुआ है.



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कहा जा रहा है कि कोरोना उन देशों में ज्यादा नुकसान कर रहा है जहां बीसीजी नहीं दिया गया. (सांकेतिक तस्वीर)


कब से उपयोग में लाई जा रही है बीसीजी
बीसीजी का इंसानों पर इस्तेमाल पहली बार साल 1921 में हुआ था. भारत में व्यापक पैमाने पर इसका इस्तेमाल 1948 में शुरू हुआ था. तब से यह टीका हर बच्चे को दिया जाना निश्चित किया गया है. भारत सरकार आज भी इस टीके का अनुमोदन करती है.

क्या खास है इस वैक्सीन में
इस वैक्सीन के बारे में कहा जाता है कि यह केवल टीबी ही नहीं, इंसान में कई अन्य बीमारियां होने से भी रोकती है. इससे इंसान की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है. कई कैंसर वैक्सीन भी बीसीजी का एक ऐडेटिव के तौर पर प्रयोग करती हैं. कहा जाता है कि यह लोगों में प्रतिरोध क्षमता का शुरू में तीव्र करने में मदद करता है.

तो कैसे चर्चा में आ गई बीसीजी की वैक्सीन
अमेरिका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के शोध के मुताबिक जहां जहां बीसीजी का टीका दिया गया है वहां कोरोना वायरस संक्रमण कम देखे गए हैं. हालांकि इस शोध या अन्य कहीं भी इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि मामलों में कमी की वजह बीसीजी का टीका ही है. इसलिए इस मामले में दावा करने की स्थिति में कोई नहीं है और बीसीजी की सार्सकोव-2 पर प्रभावोत्पादकता शोध का विषय है.

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कोरोना वायरस का अभी तक इलाज या वैक्सीन नहीं ढूंढी जा सकी है.


तो क्या है समस्या
समस्या यही है कि बीसीजी वैक्सीन की कोरोना पर प्रभावोत्पादकता को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है. इसकी कई वजह है. पहला जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के शोध को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता है. यह सच है. कि जहां भारत में व्यापक पैमाने पर बीसीजी का टीका उपयोग में किया गया है तो वहीं अमेरिका में इस वैक्सीन का उपयोग सार्वजनिक और व्यापक स्तर पर नहीं किया है. जहां अमेरिका में कोरोना संक्रमण की संख्या तेजी से बढ़ती ही जा रही है. वहीं भारत में यह उतनी तेजी से बढ़ नहीं पा रहा है.

एक यह भी तो वजह है
बीसीजी के विषय में दूसरी वजह है उसकी प्रतिरोधी क्षमता पर होने वाला असर. यह टीका टीबी ही नहीं कई अन्य बीमारियों में भी लोगों को बचा सकती है. इसके अलावा कहा जाता है यह टीका मरीज के इम्यून सिस्टम को ताकत देता है और उसकी शुरुआती सक्रियता तेज भी कर देता है. कोरोना वायरस के बारे में शुरू से ही कहा जा रहा था कि जिन लोगों का इन्म्यून सिस्टम मजबूत है वे लोग इससे उबर पाने में सफल हो रहे हैं. ऐसे में बीसीजी कोरोना के खिलाफ उम्मीद जगाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए, खासकर तब जब उलका इलाज नहीं निकला है.

बीसीजी का असर शोध का विषय
बेशक बीसीजी का फलोत्पादकता शोध का विषय है. इसके लिए ट्रायल करने होंगे उनके नतीजे परखने होंगे और इसके साथ ही उन्हें विभिन्न परिस्थितियों में भी जांचना होगा. खुद बीसीजी का प्रभावोत्पादकता दुनिया की सभी इलाकों में कारगर सिद्ध नहीं हुई है.

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माना जा रहा है कि बेहतर प्रतिरोधी क्षमता वाले रोगी आसानी से ठीक भी हो रहे हैं.


दुनिया में मिले जुले नतीजे हैं बीसीजी और कोरोना के संबंध के
यूरोप की बात करें तो इटली और स्पेन में न तो इसे आवश्यक किया गया और न ही इसका अनुमोदन किया गया. फ्रांस में यह बच्चों के लिए आवश्यक कर दी गई थी, लेकिन जर्मनी में ऐसा नहीं किया गया. जर्मनी में कोरोना संकट के हालात फ्रांस से बहुत बेहतर हैं. वहीं ईरान में भी यह वैक्सीन आवश्यक है लेकिन वहां हालात संकटपूर्ण हैं.

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