'भद्रलोक' क्या है और पश्चिम बंगाल की राजनीति में क्यों चर्चा में है?

प्रतीकात्मक तस्वीर pixabay से साभार

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West Bengal Politics : सत्यजीत रे (Satyajit Ray) रहे हों, या बिधानचंद्र रॉय, ये सभी इसी वर्ग से ताल्लुक रखने वाली हस्तियां रहीं, लेकिन सामाजिक तौर पर इसे उत्तर भारत में ब्राह्मणों (North Indian Brahmins) जैसे जातिगत समीकरणों की तरह नहीं समझा जा सकता.

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रबींद्रनाथ ठाकुर का एक उपन्यास है 'नष्टनीड़', जिसे सत्यजीत रे ने फिल्म 'चारुलता' के रूप में ढाला. इसका प्लॉट चारु और भूपति के किरदारों के माध्यम से उस 'भद्रलोक' के जीवन को केंद्र में लाता है, जो संपन्न समाज बंगाल पुनर्जागरण का हिस्सा था और ब्रह्म समाज से प्रेरित. कविता, कहानी से फिल्मों तक चर्चित रहे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाले भद्रलोक की गूंज इस बार पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (Bengal Elections 2021) में सुनी जा रही है. भद्रलोक बनाम हिंदुत्व (Hindutva) वाले इस चुनावी माहौल में आपको इस समाज के बारे में जानना चाहिए.

देश के अन्य कई राज्यों की तरह ही पश्चिम बंगाल में चुनावी राजनीति में जाति और समाज काफी अहम रोल में रहे हैं. सत्ता की बात की जाए तो भद्रलोक इसमें बाज़ी मारता रहा है. सत्ता ही क्या साहित्य, कला और विज्ञान जैसे तमाम क्षेत्रों में भद्रलोक का ही दबदबा दिखता रहा है. जानते हैं कि इस भद्रलोक का महत्व क्या है और यह मौजूदा चुनावों में क्यों चर्चा में है.

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प्रसिद्ध फिल्मकार सत्यजीत रे

भद्रलोक का अर्थ और दायरा क्या है?
शब्द का मतलब देखा जाए तो 'शालीन व्यक्ति' है, लेकिन सामाजिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के चलते बंगाल में भद्रलोक वास्तव में, संभ्रांत लोगों का समाज रहा है, जिसमें ज़्यादातर कथित उच्च जातियों के लोग शामिल रहे हैं. इस भद्रलोक का फैलाव संख्या के हिसाब से भले ही कम रहा, लेकिन प्रभाव के हिसाब से हमेशा वर्चस्व वाला दिखा.

कई पुष्ट रिपोर्ट्स कहती हैं कि भारत की आज़ादी यानी 1947 के बाद से ही इसी समाज के लोग बंगाल की सत्ता में काबिज़ रहे. ब्राह्मण, बैद्य और कायस्थ, इन तीन उच्च जातियों के लोग बंगाल के भद्रलोक में 20 फीसदी हैं. इसके अलावा, अन्य संपन्न समाज के लोग भी इस वर्ग में शामिल हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार शुरुआत में इस वर्ग के लोग बांग्लादेश से रिफ्यूजी के तौर पर जाने जाते थे, जो आर्थिक रूप से बेहतर हाल में भी नहीं थे.


आर्थिक हालत जो भी रहे हों, भद्रलोक का रुतबा कभी कम नहीं रहा. बंगाल के सबसे शिक्षित और कलात्मक आबादी में भद्रलोक की संख्या बहुमत में रही है.

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जब बंटने लगा भद्रलोक
1950 के बाद से बंगाल के इस वर्ग के लोग कांग्रेस, लेफ्ट और नक्सलवादी विचारधारा के बीच बंटते हुए दिखाई दिए. यह भी रोचक फैक्ट है कि टॉप नक्सलवादी भी भद्रलोक समाज से ही ताल्लुक रखने वाले रहे. इस तरह कुछ लोग मान बैठते हैं कि भद्रलोक अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि बुद्धिमत्ता से ताल्लुक रखने वाला वर्ग बनकर रह गया.

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लेकिन, ऐसा नहीं कहा जा सकता. बंगाल की संस्कृति, समाज पर किताबें लिख चुके देबराज भट्टाचार्य ने लिखा है कि भूमि सुधार के कानूनों की बात हो या ज़मींदारी हटाकर पंचायती राज लाने की या फिर बंगाल में उद्योगों के साथ प्रोग्रेसिव राजनीति करने वालों की... भद्रलोक इन सबमें शामिल भी रहा, लेकिन राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से बंटा हुआ भी दिखता रहा.

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इस लेख के मुताबिक इस समाज का बंटवारा नक्सलवादी भद्रलोक, कांग्रेसी भद्रलोक और सीपीआईएम भद्रलोक जैसे शब्दों तक पहुंच गया. इसी भद्रलोक ने बंगाल में सरकारें बनाईं और गिराईं लेकिन अब यही भद्रलोक अपने प्रभाव के पतन के दौर में पहुंचता हुआ दिख रहा है.

कैसे और क्यों पतन की तरफ आया भद्रलोक?
बुद्धदेब भट्टाचार्य की सत्ता के खिलाफ ममता बनर्जी को समर्थन देने वाले बंगाली भद्रलोक ने खुद को धीरे धीरे संभ्रांत वर्किंग क्लास के तौर पर तो बेहतर किया, लेकिन अपने अतीत को भुला दिया. भट्टाचार्य ने लिखा कि इस वर्ग का जीवन स्तर तो काफी बेहतर हुआ लेकिन बंगाली संस्कृति में जिस महान योगदान के लिए यह वर्ग जाना जाता था, वह गौरव खोता रहा.

दूसरी तरफ, बंगाल में एक अलग किस्म की राजनीति गांवों और पिछड़ी जातियों के बीच से शुरू हुई. तीसरा पहलू पिछले कुछ ही समय में बंगाल की राजनीति में धर्म महत्वपूर्ण भावना के तौर पर उभरा. इन सब बदलावों का अंजाम यह हुआ कि नए नेता और एक नया राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक क्लास सामने आया.

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यहां यह बात बहुत दिलचस्प है कि ग्रामीण स्तर पर उभरी यह राजनीति ब्राह्मणों के विरोध में किसी किस्म की दलित क्रांति जैसी नहीं रही, जैसा कि समझ लिया जाता है. वास्तव में, बंगाल का सामाजिक ढांचा बाकी राज्यों से इस मामले में कुछ अलग तरह का रहा है इसलिए यहां भद्रलोक भी कई उलटबांसियों से भरा रहा. ​इतिहासकार जोया चटर्जी ने अपनी किताब 'द स्पॉइल्स ऑफ पार्टिशन' में लिखा :

भले ही सांस्कृतिक रूप से दबदबा रहा या राजनीति में उन्होंने अपनी प्रतिभा को बेहतर माना लेकिन भद्रलोक के नेता बंगाल के बारे में गलतफहमियों के शिकार रहे. भले ही वो बहुत शिक्षित और शिष्ट थे लेकिन राजनीति और अर्थव्यवस्था में उनका नेतृत्व नहीं रहा था, उन्होंने नीतियों को लागू तो करवाया लेकिन निर्माण नहीं किया... कुल मिलाकर इन्हें शासन का तजुर्बा न के बराबर था, लेकिन आत्मविश्वास ज़रूरत से ज़्यादा.


चटर्जी ने इन मिसालों से यह साबित किया कि कैसे भद्रलोक 1947 के बाद अतीत में जीने वाला वर्ग बनकर रह गया जो लगातार होते रहे बदलावों के साथ तालमेल नहीं बिठा सका. भद्रलोक के पतन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट विशेषज्ञ 2018 के पंचायत चुनावों को मानते हैं, जहां ताकतवर पार्टियों के मुकाबले में छोटे और स्थानीय नेताओं ने बाज़ी मारकर दिखाई.

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विशेषज्ञों के मुताबिक ममता बनर्जी की सत्ता जिस भद्रलोक पर टिकी थी, उसके सपोर्ट के बगैर ही बंगाल में भाजपा बहुत विस्तृत पार्टी बनकर उभरी. यह साफ तौर पर प्रमाण है कि भद्रलोक सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से कितना सिमट चुका है. सीपीआईएम के वो कैंडिडेट भी हारे, जो इस समाज से 'साफ छवि' के आधार पर मैदान में उतारे गए थे. यही नहीं, बंगाल में ऐतिहासिक रूप से यह भी हुआ कि बगैर विचारधारा की परवाह किए लोगों ने दल बदले और इनमें भी भद्रलोक शामिल रहा.

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भट्टाचार्य हों या वकील और राजनीतिक विशेषज्ञ अनिकेत घोष, जानकारों के बीच साफ तौर पर मान लिया गया है कि राजनीति में मटुआ जैसे ​कथित पिछड़ी जातियों का केंद्र में आने का मतलब यही है कि बंगाल के भविष्य पर भद्रलोक का प्रभाव खत्म है. यह बंगाल में एक ऐतिहासिक मोड़ है, जब भविष्य ही वर्चस्व वाले एक समाज का भूत बन चुका है.
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