क्या है ब्लू अमोनिया, जो पहली बार सऊदी अरब से जापान भेजा जा रहा है?

ब्लू अमोनिया सऊदी अरब से जापान भेजा जा रहा है- सांकेतिक फोटो
ब्लू अमोनिया सऊदी अरब से जापान भेजा जा रहा है- सांकेतिक फोटो

जापान ने हाल ही में सऊदी से भारी मात्रा में ब्लू अमोनिया (Saudi Arabia makes shipment of blue ammonia to Japan) मंगवाया है. ये कदम प्रदूषण रोकने के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 29, 2020, 11:10 AM IST
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पहली बार ब्लू अमोनिया (blue ammonia) का इंटरनेशनल स्तर पर व्यापार होने वाला है. ये सऊदी अरब से जापान भेजा जा रहा है, जहां इसका इस्तेमाल बिजली घरों में बिजली पैदा करने के लिए होगा. बता दें कि ब्लू अमोनिया वो पदार्थ है, जिससे बिना प्रदूषण के ही बिजली बनाई जा सकती है. इस तरह से पर्यावरण के लिए काफी सचेत जापान दुनिया का पहला ऐसा देश बन जाएगा, जो बड़े स्तर पर अमोनिया को कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए काम में लाएगा. जानिए, क्या है ये अमोनिया.

ये है ताजा मामला
जापान ने साल 2030 तक अपना ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन 26% तक कम करने का एलान किया था. इसी दिशा में वो कई कदम ले रहा है. इन्हीं में से एक है ब्लू अमोनिया के इस्तेमाल की पहल. इस बारे में 27 सितंबर को सऊदी अरामको (ARAMCO) ने आधिकारिक घोषणा की. अरामको सऊदी की तेल कंपनी है, जो दुनिया की सबसे ज्यादा रिवेन्यू वाली कंपनियों में से है. अरामको के मुताबिक जापान पहले शिपमेंट में 40 टन ब्लू अमोनिया लेने जा रहा है. ये अमोनिया थर्मल पावर स्टेशन में काम में लाया जाएगा, जिससे बिजली बनेगी और कार्बन का उत्सर्जन कम से कम होगा.

जापान ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन 26% तक कम करने में लगा हुआ है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)

क्या है ये अमोनिया


ब्लू अमोनिया जीवाश्म से बने ईंधन का एक नया रूप माना जा सकता है. इसमें 18% हाइड्रोजन होती है, जो कि ईंधन का अच्छा स्त्रोत हो सकता है, वो भी न्यूनतम प्रदूषण के साथ. अब ये जानते हैं कि अमोनिया बनाते कैसे हैं. इसके लिए हाइड्रोकार्बन को हाइड्रोजन और अमोनिया में बदला जाता है. ये सीधे पावर स्टेशन में काम आते हैं. ब्लू अमोनिया को जलाए जाने पर उससे कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकलती है. इस तरह से इसे दुनिया की पहली कार्बन-मुक्त गैस माना जा रहा है, जो ईंधन बनाने के काम आ सकती है.

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ग्रीन अमोनिया की भी पहल 
फिलहाल ब्लू अमोनिया पेट्रोकेमिकल इंडस्ट्रीज में बाईप्रोडक्ट की तरह बन रहा है. यही कारण है कि सऊदी की तेल कंपनी ARAMCO इस नए ईंधन स्रोत के निर्माण में अग्रणी कंपनी है. हालांकि ब्लू अमोनिया को ग्रीन अमोनिया की तरफ पहला कदम माना जा रहा है. अब सवाल ये आता है कि ये ग्रीन अमोनिया क्या बला है और इससे हमें क्या फायदा है. ये भी ब्लू अमोनिया की ही तरह है. फर्क केवल इतना है कि ग्रीन अमोनिया ईंधन के उन स्त्रोतों से बनाया जा सकेगा, जो प्रदूषण नहीं करते हैं यानी जो ग्रीन फ्यूल हैं. वहीं अभी बन रहा ब्लू अमोनिया प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन स्त्रोतों का बाईप्रोडक्ट है. हालांकि फिलहाल तो ब्लू अमोनिया को ही प्रदूषण कम करने की दिशा में बड़ी पहल माना जा रहा है.

फिलहाल ब्लू अमोनिया पेट्रोकेमिकल इंडस्ट्रीज में बाईप्रोडक्ट की तरह बन रहा है- सांकेतिक फोटो


क्या है पेरिस समझौता
जापान ने सऊदी से ब्लू अमोनिया लेने की पहल पेरिस समझौते के तहत की है. ये समझौता देशों को प्रदूषण रोकने के लिए कदम उठाने के मकसद से किया गया. असल में क्लाइमेट चेंज पर लगातार बढ़ती चिंता के बीच साल 2015 के नवंबर-दिसंबर में पेरिस में 195 देश जमा हुए. वहां ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के मकसद से ग्लोबल समझौता हुआ. इसे ही पेरिस समझौते के नाम से जाना जाता है. इसके तहत तय हुआ कि ग्लोबल तापमान में बढ़ोत्तरी 2 डिग्री सेल्सियस के भीतर सीमित रहे. जमा हुए ज्यादातर देशों ने इसके लिए लिखित अनुमति दे दी.

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समझौते में हैं कई कमजोरियां 
बता दें कि पेरिस संधि पर शुरुआत में ही 177 सदस्यों ने हस्ताक्षर कर दिए थे. ये पहली बार हुआ जब किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते के पहले ही दिन इतनी बड़ी संख्या में सदस्यों ने सहमति जताई थी. हालांकि पेरिस समझौता उतने प्रभावी तरीके से लागू नहीं हो सका क्योंकि इसमें सदस्य देशों पर निर्भर था कि वे कार्बन कटौती के लिए क्या तरीके अपनाते हैं.

जापान ने सऊदी से ब्लू अमोनिया लेने की पहल पेरिस समझौते के तहत की है- सांकेतिक फोटो


टारगेट पूरा न हो पाने पर यानी जरूरत से ज्यादा कार्बन उत्सर्जन पर किसी तरह के जुर्माने का भी कोई प्रावधान नहीं. सभी देशों द्वारा स्वेच्छा से इस ओर ध्यान देने की बात की गई. यही वजह है कि सभी देशों ने अपने-अपने तरीके से ये किया. सभी देश आर्थिक उन्नति के लिए लगातार उद्योग बढ़ाते गए और उत्सर्जन बढ़ता ही गया.

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भारत इस समझौते में कहां है
ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक कार्बन डाईऑक्साइड गैस उत्सर्जन के मामले में खुद भारत की भी भागादारी सात से आठ प्रतिशत है. चीन प्रदूषण के मामले में 26 प्रतिशत के साथ सबसे ऊपर है. वहीं अमेरिका भी 15 प्रतिशत के साथ दूसरे नंबर पर है. तीसरे नंबर पर यूरोपियन यूनियन आता है. कुल मिलाकर पूरी दुनिया के प्रदूषण में इन्हीं चार देशों की लगभग 58 फीसदी हिस्सेदारी है. भारत में प्रदूषण स्तर ज्यादा रहने की वजह यहां उद्योगों की कोयले पर ज्यादा निर्भरता है. यही कारण चीन में भी है. जबकि दूसरे विकसित देश सोलर और हवा से पैदा एनर्जी का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करते हैं.
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