Explained: क्या है कैपिटल पनिशमेंट और क्यों लगातार विवादों में रहा?

मृत्युदंड यानी कैपिटल पनिशमेंट पर बहस एक बार फिर गर्म हो गई (Photo-news18 creative)

मृत्युदंड यानी कैपिटल पनिशमेंट पर बहस एक बार फिर गर्म हो गई (Photo-news18 creative)

मानवाधिकार संस्थाएं दलील देती रही हैं कि मृत्युदंड (capital punishment) से अपराधी के सुधरने की गुंजाइश खत्म हो जाती है. साथ ही इससे अपराधी-मानसिकता के लोग पीड़ित की हत्या भी कर सकते हैं ताकि उनका राज न खुल जाए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 22, 2021, 11:29 AM IST
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उत्तरप्रदेश के अमरोहा में अप्रैल 2008 में एक हत्याकांड को लेकर खासा बवाल हुआ था, जिसमें शबनम नाम की युवती ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने ही परिजनों की हत्या कर दी थी. मृतकों में लगभग 11 महीने का शिशु भी था. इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने शबनम को फांसी की सजा सुनाई, हालांकि फांसी रोकने के लिए दोषी ने दया याचिका भेजी, जिसके कारण सजा कुछ समय के लिए स्थगित हो गई. इस बीच मृत्युदंड यानी कैपिटल पनिशमेंट पर बहस एक बार फिर गर्म है.

क्यों हो रही है चर्चा 

शबनम मामले के साथ लगातार मृत्युदंड पर चर्चा हो रही है कि क्या इसे हमेशा के लिए खत्म कर देना चाहिए. इस सजा के खिलाफ बोलने वालों की दलील है कि मौत के साथ ही अपराधी के सुधर सकने की गुंजाइश खत्म हो जाती है. साथ ही ये भी कहा जा रहा है कि मौत के डर से अपराधी पीड़ित को जान से मार दे, ऐसी आशंका बढ़ती है. इस बारे में अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में कानूनविद डॉ फैजन मुस्तफा का संपादकीय विस्तार से बात करता है.

कौन हैं डॉ फैजन मुस्तफा
मृत्युदंड के बारे में जानने से पहले एक बार डॉ मुस्तफा के बारे में जानते हैं. वे शिक्षाविद के साथ-साथ कानून के जानकार भी हैं. फिलहाल वे हैदराबाद की NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के वाइस-चांसलर हैं. डॉ मुस्तफा ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से इतिहास और कानून में ग्रेजुएशन के बाद यहीं से एलएलएम भी किया. इसके अलावा वे कॉपीराइट लॉ में डॉक्टरेट हैं. हालांकि डॉ मुस्तफा केवल पढ़ने-पढ़ाने से नहीं जुड़े, बल्कि वे लगातार नए-नए विषयों पर आम लोगों से संपादकीय के जरिए बात करने की कोशिश करते रहते हैं. खासकर कानून पर वे साधारण भाषा में लगातार लिखते हैं ताकि लोगों में जागरुकता आए.

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शबनम नाम की युवती ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने ही परिजनों की हत्या कर दी थी


अब बारी आती है कि क्या है कैपिटल पनिशमेंट, जो लगातार चर्चा में रहा. किसी व्यक्ति को कानूनी तौर पर न्यायिक प्रक्रिया के तहत किसी अपराध के लिए मौत देना ही कैपिटल पनिशमेंट है. हमारे देश में ये सजा दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों में ही दी जाती है.



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निर्भया मामले से आया मोड़

दिसंबर, 2012 के दिल्ली के निर्भया गैंगरेप व हत्या मामले के बाद संविधान संशोधन के जरिए आईपीसी की धारा—376 (ई) के तहत बार-बार बलात्कार के दोषियों को उम्रकैद या मौत की सजा का प्रावधान किया गया था. बॉम्बे हाईकोर्ट ने बार-बार बलात्कार के दोषी को उम्रकैद या मौत की सजा देने के लिए आईपीसी की धारा में किए गए इस संशोधन की संवैधानिकता को बरकरार रखा. रेप भारतीय कानून के तहत गंभीर श्रेणी में आता है. इस अपराध के लिए भारतीय दंड संहिता में धारा 376 व 375 के तहत सजा का प्रावधान है. वहीं, केंद्र सरकार ने 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार के मामलों में दोषी ठहराए गए व्यक्तियों को मृत्युदंड सहित सख्त सजा देने का अध्यादेश जारी किया था.

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सरकार के विरोध में लड़ाई छेड़ने पर सजा

सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने या ऐसी कोशिश करने वाले को आईपीसी की धाारा—121 के तहत मौत की सजा का प्रावधान किया गया है. इस अपराध में अगर फांसी की सजा नहीं दी जाती है तो आजीवन कैद और जुर्माना भी लगाया जा सकता है. वहीं, अगर सेना, वायुसेना या नौसेना का कोई अधिकारी या सैनिक सरकार के खिलाफ अपने साथियों या आम लेागों को सरकार के खिलाफ विद्रोह के लिए उकसाता है और विद्रोह भड़क जाता है तो दोषी को धारा—132 के तहत मौत की सजा का प्रावधान है. इस अपराध में भी आजीवन कारावास या 10 साल तक की कठोर कारावास और जुर्माने की सजा भी दी सकती है.

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किसी व्यक्ति को कानूनी तौर पर न्यायिक प्रक्रिया के तहत किसी अपराध के लिए मौत देना ही कैपिटल पनिशमेंट है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


आत्महत्या के लिए उकसाना

अगर कोई व्यक्ति बच्चों या 18 वर्ष से कम उम्र के किशोर व युवाओं को आत्महत्या के लिए उकसाता है और उसकी ऐसी कोशिश में मौत हो जाती है तो दोषी को आईपीसी की धारा—305 के तहत सजा—ए—मौत की व्यवस्था की गई है. इसी धारा के तहत पागल या मंदबुद्धि व्यक्ति को भी आत्महत्या के लिए उकसाने के बाद किए गए प्रयास में मौत हो जाने पर मृत्युदंड का प्रावधान है. इस धारा के तहत मौत की सजा नहीं दिए जाने पर 10 वर्ष से लेकर उम्रकैद तक का प्रावधान है. वहीं, कोर्ट सजा के साथ जुर्माना भी लगा सकता है.

रेलवे में भी मौत की सजा

आईपीसी के अलावा भारतीय रेल अधिनियम की धारा—124 के तहत भी मौत की सजा का प्रावधान है. अगर कोई व्यक्ति यह जानते हुए भी ट्रेन को नुकसान पहुंचाता है कि इससे यात्रियों की जान जा सकती है तो इस धारा के तहत उसे मौत की सजा दी जा सकती है. आपातकाल में प्रभावी होने वाले डिफेंस आफ इंडिया एक्ट की धारा—18—2 के तहत विशेष न्यायालय को फांसी की सजा देने का अधिकार होता है. वहीं, नशीली दवा अधिनियम में भी मौत की सजा का प्रवाधान किया गया है. इन सभी धाराओं में तब तक फांसी नहीं दी जा सकती जब तक कि आईपीसी की धारा—433 के तहत कोर्ट मंजूरी नहीं दे देता.

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कुछ श्रेणियों के लोगों को मौत की सजा नहीं दी जाती है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


इन लोगों की नहीं दी जा सकती सजा

इनके अलावा कुछ श्रेणियों के लोगों को मौत की सजा नहीं दी जाती है. जैसे कि 15 साल के कम उम्र के बच्चे को किसी हाल में मौत की सजा नहीं सुनाई जाती है. गर्भवती महिलाएं भी इस सजा से बची रहती हैं. जैसे शबनम मामले को ही लें तो उसने जेल में ही बच्चे को जन्म दिया था. अब बच्चा लगभग 12 साल का है और अब शबनम की फांसी की बात हुई है. हालांकि इसपर भी अस्थायी तौर पर रोक लग गई. मानसिक रूप से बीमार लोगों को किसी हाल में कैपिटल पनिशमेंट नहीं दी जाती. इसके अलावा 70 या इससे अधिक उम्र के लोगों को भी कानून में मौत की सजा का प्रावधान नहीं है.

इसके बाद भी दोषी के पास अपने बचाव के कई रास्ते होते हैं. जैसे वो कई दलीलें देते हुए, या उस वक्त में अपने साथ किसी मुश्किल का हवाला देते हुए इस दया याचिका लगा सकता है. मानवाधिकार संस्थाएं भी उसमें उसकी मदद करती हैं.
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