Explained: क्या है चाइना सिंड्रोम और क्यों इसने उथल-पुथल मचा रखी है?

परमाणु दुर्घटना की काल्पनिक स्थिति से उपजा टर्म चाइना सिंड्रोम अब राजनीति में भी चल पड़ा- सांकेतिक फोटो (news18 English)

परमाणु दुर्घटना की काल्पनिक स्थिति से उपजा टर्म चाइना सिंड्रोम अब राजनीति में भी चल पड़ा- सांकेतिक फोटो (news18 English)

परमाणु दुर्घटना की काल्पनिक स्थिति से उपजा टर्म चाइना सिंड्रोम (China syndrome) अब राजनीति में भी चल पड़ा है. यही वो शब्द है, जो भारत समेत अमेरिका तक की विदेश नीति पर अलग असर डाल सकता है.

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  • Last Updated: January 11, 2021, 10:10 PM IST
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साल 2021 की शुरुआत के साथ ही सबकी नजरें अमेरिका की ओर हैं. अगले 9 दिनों में वहां नए राष्ट्रपति जो बाइडन पद की शपथ लेंगे. बाइडन ने चुनाव प्रचार के दौरान चीन पर कड़ा प्रहार किया था. डोनाल्ड ट्रंप चीन को घेरने में बाइडन से भी एक कदम आगे रहे और लगातार चीन को धमकाते रहे. अब बाइडन की विदेश नीति इस तरह की हो सकती है, जो एशियाई देशों का साथ लेकर चीन को आगे बढ़ने से रोके.

क्या वजह है कि सुपर पावर अमेरिका चीन के इस तरह से पीछे पड़ा है?
ये है चाइना सिंड्रोम, जिसने अमेरिका को विदेश नीति पर नए सिरे से सोचने को मजबूर कर दिया. यही कारण है कि राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव अभियान के दौरान दोनों ही नेताओं ने बार-बार चीन को झटका देने और सख्ती बरतने जैसी बातें कहीं.

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कोरोना ने दी हवा 


बता दें कि अमेरिका फिलहाल कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित देश है, जहां मौत के आंकड़े भी सबसे ज्यादा है. अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी इस बीच लॉकडाउन के कारण चरमरा गई. इसके तुरंत साथ ही राष्ट्रपति ट्रंप कोरोना के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराने और उसे डराने लगे. हालांकि कोरोना संक्रमण केवल एक वजह है जो अमेरिका के चाइना सिंड्रोम को ऊपर लेकर आया.

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कोरोना संक्रमण केवल एक वजह है जो अमेरिका के चाइना सिंड्रोम को ऊपर लेकर आया- सांकेतिक फोटो (pixabay)


दशकभर से अमेरिका आक्रामक
साल 2011 में ही अमेरिकी राजनीति में एक टर्म आया- ‘Asian Pivot’ यानी एशिया की धुरी. इसके तहत अमेरिका एशियाई देशों को इकट्ठा करने की कोशिश करने लगा ताकि चीन के असर को कम किया जा सके. लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी. चीन मजबूत अर्थव्यवस्था के तौर पर पूरी दुनिया के बाजार पर लगभग कब्जा कर चुका था और साथ ही साथ वो अपनी विस्तारवादी प्रवृति भी दिखाने लगा था.

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क्या अमेरिका ने देर कर दी?
आज से 9 साल पहले तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चीन को रोकने के लिए विदेश नीतियां कुछ बदलीं, जबकि विशेषज्ञों के मुताबिक इसकी शुरुआत दो दशक पहले हो जानी चाहिए थी. लेकिन एक बार सुपर पावर बन चुका अमेरिका इस दौरान 9/11 हमले और अफगानिस्तान में युद्ध जैसी बातों में उलझा रहा और आर्थिक नीतियों या फिर चीन के तेजी से बढ़ने पर ध्यान नहीं दे सका.

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अब अमेरिकी संसद चीन के आगे बढ़ने को और खासकर उसके आक्रामक रवैये को लेकर डरी हुई है और नए सिरे से अपनी नीतियां बना रही है. सीनेट के कहने पर न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी ने साल 2020 की शुरुआत में Rising to the China Challenge नाम से एक रिपोर्ट तैयार की. इसमें एशियाई देशों के लिए अलग और चीन के लिए अलग रवैया सुझाया गया.

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डोनाल्ड ट्रंप चीन को घेरने में बाइडन से भी एक कदम आगे रहे


ट्रंप और बाइडन यहां साथ खड़े दिखते हैं
चीन के लिए रवैये में उसे आर्थिक तौर पर घेरने के अलावा कूटनीतिक झटका देने जैसी बातें भी शामिल हैं. यही कारण है कि ट्रंप जाते-जाते भी चीन पर आर्थिक कड़ाई कायम रखे हैं, वहीं ट्रंप के विरोधी और नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन भी चीन की नीतियों को लेकर ट्रंप का साथ देते दिखते हैं. कई बार अपने बयानों से बाइडन ने साफ कर दिया कि चीन के साथ कोई ढिलाई नहीं बरती जाएगी.

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उइगर मुस्लिमों पर हिंसा का मुद्दा उठाया
इसके अलावा मानवाधिकार के मुद्दे पर भी अमेरिका चीन को घेर चुका है. वो बार-बार चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर मुस्लिमों पर हिंसा की बात करता है. इस बारे में अमेरिकी सरकार ढेरों बयान दे चुकी और यहां तक कि ये मुद्दा अब यूएन में भी उठाया जा रहा है. इसका ये फायदा है कि चीन में मानवाधिकारों का पालन न होने को लेकर बाकी देश भी उससे दूरी बना लें. ऐसा हो भी रहा है. कोरोना को लेकर चीन से गुस्साए देश अब लगातार उससे उइगरों और तिब्बत के मुद्दे पर सवाल कर रहे हैं. ये अलग बात है कि कम्युनिस्ट देश चीन इस बारे में कोई सफाई नहीं दे रहा.

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग कर्ज देकर देशों को कमजोर बना रहे हैं


अमेरिका और कई देश लामबंद हुए 
चीन के खिलाफ इस अमेरिकी नीति में फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और थाइलैंड जैसे देश आ मिले हैं. भारत पहले से ही चीन पर भड़का हुआ है, तो इस लिहाज से वो अमेरिका का नया साथी है. अमेरिका से भारत के संबंध हाल में मजबूत हुए हैं तो इसकी वजह भी चीन से उसके तनावपूर्ण संबंध हैं. डॉन में अमेरिकी रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया है कि अमेरिका अब भारत को एशियाई देशों में सबसे ताकतवर बनाना चाहता है ताकि चीन कमजोर पड़ जाए.

चीन ने अलग ढंग से पाया साथ
इधर अमेरिका चीन के खिलाफ लामबंदी कर रहा है तो चीन उससे कहीं कम नहीं. वो भी अपनी कर्ज देकर गुलाम बनाने वाली नीति पर अमल कर रहा है. चीन इस पर लंबे समय से काम कर रहा है. बीते एक दशक में चीन ने भारत के आसपास के लगभग सभी एशियाई देशों को ऋण दिया और उनके यहां इंफ्रास्ट्रक्टचर में भारी निवेश किया. इन देशों में पाकिस्तान, बांग्लादेश श्रीलंका और नेपाल शामिल हैं. अब कर्ज न चुका पाने की स्थिति में चीन लगभग सभी देशों की आंतरिक नीति में घुसपैठ कर रहा है ताकि वो भारत या फिर उसके जरिए अमेरिका को नुकसान पहुंचा सके.

तो कुल मिलाकर चाइना सिंड्रोम फिलहाल उफान पर है. वैसे ये टर्म एक काल्पनिक स्थिति है, जो परमाणु दुर्घटना से जुड़ी हुई है. इस पर कई फिल्में भी बन चुकी हैं.
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