क्या है कांग्रेस (I) और कांग्रेस (A) का मतलब, इतिहास और लड़ाई?

न्यूज़18 कार्टून

आगामी विधानसभा चुनाव (Assembly Election) के मद्देनज़र केरल में कांग्रेस (Kerala Congress) की राजनीति को लेकर काफी उथल पुथल मची हुई है. गुटबाज़ी इतनी और इस तरह है कि सीएम के चेहरे को लेकर कांग्रेस के भीतर और बाहर चर्चा दिलचस्प है.

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    केरल में कांग्रेस के भीतर भारी मतभेदों (Kerala Congress) और कमज़ोरियों की बातें पार्टी के लोग भी स्वीकार रहे हैं. इन्हीं बातों के चलते कांग्रेस के चर्चित नेता पीसी चाको (P.C. Chacko) ने इस्तीफा दिया और केरल में कांग्रेस के खत्म होने तक की बात कह दी, तो पार्टी के लोगों ने चाको को भी बगैर जनाधार वाला नेता कह दिया. इस बीच, चाको ने अहम बात कही कि केरल में 'कांग्रेस का अस्तित्व ही नहीं है, या तो Congress (I) है या Congress (A).

    क्या है कांग्रेस (I) और कांग्रेस (A) का इतिहास?
    आई का मतलब साफ तौर पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी रहा है. इमरजेंसी के बाद चुनाव हुए और नतीजे कांग्रेस के पक्ष में न रहने के बाद पार्टी के भीतर 1978 में जब फूट पड़ी, तो कांग्रेस दोफाड़ हुई थी. इंदिरा गांधी के समर्थकों ने कांग्रेस के ​धड़े को कांग्रेस (I) नाम दे दिया था. इससे पहले इंदिरा गांधी वाले खेमे को कांग्रेस (R) के नाम से भी जाना गया था.

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    कामराज के नेतृत्व में रही कांग्रेस (O) को मूल कांग्रेस पार्टी माना गया, लेकिन वह बाद में विलय हो गई थी. एक खेमा पूर्व मुख्यमंत्री के करुणाकरण के नेतृत्व में बना था, जिसमें के सुधाकरण, वीडी सतीशन, के मुरलीधरन जैसे नेता जुड़े. 1979 में कांग्रेस उर्स नाम का धड़ा बना था, जिसके नेता कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री देवराज उर्स थे, जो इंदिरा के विरोधी हुए थे.

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    केरल विधानसभा चुनावों के दौरान केरल में कांग्रेस की भीतरी कलह चर्चा में है.


    कांग्रेस में इसी तरह टूट फूट से धड़े बनते रहे. केरल में जब कांग्रेस का विघटन हुआ तो केरल के दिग्गज नेता एके एंटनी के नेतृत्व में पार्टी बनी, जिसे बाद में कांग्रेस (A) का नाम मिला. पहले यह धड़ा कांग्रेस उर्स के साथ ​जुड़ा था, लेकिन 1980 में अलग हो गया.

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    इस धड़े के साथ ओमेन चांडी और एमएम हसन जैसे नामों के साथ उस समय युवा नेता जुड़े थे. केरल के ही एक कांग्रेस नेता के हवाले से खबरों में कहा गया है कि 'कांग्रेस में तरक्की के रास्ते तभी खुल सकते हैं, जब आप किसी न किसी खेमे के साथ अपनी वफादारी साबित करें.'

    लेफ्ट की तरफ लपकते रहे दोनों ही खेमे
    ये बात समझना ज़रूरी है कि ये कांग्रेस के धड़े गुटबाज़ी के नतीजे रहे. ज्यादातर यही हुआ कि यह पार्टी के भीतर का अलगाव रहा, नई पार्टी बनने जैसी नौबतें नाम मात्र की ही रहीं. मसलन ऐसे समझें कि केरल में जब कांग्रेस (A) के नेता को मुख्यमंत्री पद मिला, तो उस समय पार्टी के राज्य प्रमुख का पद कांग्रेस (I) के नेता को दिया गया. यानी बैलेंस की राजनीति.

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    दोनों ही धड़े खुद को पार्टी का आधार और महत्व होने के दावे करते रहे. केरल के दोनों ही धड़ों ने ऐतिहासिक रूप से लेफ्ट डेमोक्रैटिक फ्रंट के साथ हाथ मिलाया. एंटनी के नेतृत्व में कांग्रस (A) ने ईके नायनार सरकार को जॉइन किया था और 1982 में यह सरकार गिरी, तो कांग्रेस (A) वापस मूल कांग्रेस की तरफ चली गई थी.

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    केरल में कांग्रेस के नेता ओमेन चांडी और चेनि​नथला.


    इसी तरह करुणाकरण का धड़ा भी लोकल चुनाव के समय एलडीएफ के साथ हो गई थी, लेकिन एलडीएफ ने जब विधानसभा चुनाव में इस धड़े को अहमियत नहीं दी तो इसे भी वापसी करना पड़ी.

    दोनों धड़ों का मतलब और मौजूदा हाल
    राजनीति के जानकार कहते हैं कि कांग्रेस के भीतर म्यूज़िकल चेयर वाला खेल चलता रहता है और सब कुर्सी के लिए इधर उधर दौड़भाग करते रहते हैं. जानकारों के हवाले से कहा जाता है कि कांग्रेस (I) और कांग्रेस (A) के नेताओं के बीच सीधे तौर पर गुट बदले नहीं जाते लेकिन एक समय के बाद नेता इस गुटबाज़ी को लेकर नरम हो जाते हैं और संतुलित बर्ताव करते हैं.

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    पार्टी के भीतरी लोगों की राय के आधार पर ​द प्रिंट की रिपोर्ट कहती है कि फिलहाल केरल में कांग्रेस (A) का पलड़ा थोड़ा भारी है क्योंकि कांग्रेस (I) की तुलना में इस धड़े से ज़्यादा सीएम मिले हैं. मौजूदा हालात में एंटनी और करुणाकरण के नाम तकरीबन धुंधले पड़ चुके हैं और अब मामला चांडी बनाम चेनि​नथला हो चुका है.

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    केरल से कांग्रेस सांसद शशि थरूर.


    राजनीतिक विश्लेषक जे प्रभाष ने भी इस बात को सही बताया है कि केरल कांग्रेस में गुटबाज़ी इस कदर है कि यही कहना सही लगता है कि या तो यहां कांग्रेस (I) है या कांग्रेस (A). दोनों धड़ों के बीच 2013 में तनाव बेहद बढ़ गया था, जब एक तरह से संन्यास पर जा चुके एंटनी को चांडी बनाम चेनिनथला राजनीति में मध्यस्थता करना पड़ी थी.

    बहरहाल, लेकिन इस गुटबाज़ी का एक और दिलचस्प पहलू शशि थरूर हैं, जो इन दोनों ही धड़ों में नहीं हैं और पार्टी के लोग मानते हैं कि उनके संबंध सीधे आलाकमान के साथ हैं. खैर इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की यह गुटबाज़ी और सीएम के चेहरे को लेकर होने वाली उठापटक सुर्खियों में है भी और रहेगी भी.

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