Coronavirus: जानिए, कौन होते हैं वे लोग, जो खुदपर करवाते हैं खतरनाक परीक्षण

Coronavirus: जानिए, कौन होते हैं वे लोग, जो खुदपर करवाते हैं खतरनाक परीक्षण
छोटे समूह से क्रमशः बड़े समूहों पर होने वाला ह्यूमन क्लिनिकल ट्रायल असल में क्या होता है

कोरोना (corona) के कहर के बीच कई देशों में वैक्सीन का क्लिनिकल ट्रायल (clinical trial of corona vaccine) शुरू हो चुका है. चार चरणों में छोटे समूह से क्रमशः बड़े समूहों पर होने वाला ह्यूमन क्लिनिकल ट्रायल असल में क्या होता है? खुद पर वैक्सीन का परीक्षण करवा रहे मरीजों के लिए क्या खतरे हैं, आइए जानें.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 26, 2020, 10:56 AM IST
  • Share this:
ब्रिटेन में 23 अप्रैल से कोरोना की वैक्सीन का इंसानों पर परीक्षण शुरू हो चुका है. हेल्थ मिनिस्टर मैट हैनकॉक के मुताबिक पहले चरण में 510 लोगों पर वैक्सीन की जांच होगी, जो 18 से 44 साल के भीतर हैं. पहले स्टेज की कामयाबी के बाद ही दूसरे और तीसरे चरण का ट्रायल होगा, जिसमें अपेक्षाकृत बड़ा ग्रुप होगा और मरीजों की उम्र भी ज्यादा होगी. इनमें बहुत से स्वस्थ लोगों को भी शामिल किया जाएगा. इस बीच कई देशों में दवाओं पर भी क्लिनिकल ट्रायल चल रहे हैं, फिलहाल कहीं भी पॉजिटिव नतीजे नहीं दिखे.

क्या है क्लिनिकल ट्रायल
ये एक तरह की मेडिकल रिसर्च होती है, जिसमें दवा या वैक्सीन की जांच लोगों पर होती है. किसी खास बीमारी की पहचान, इलाज या उसकी रोकथाम के लिए ये जांच होती है, जो ये समझने में मदद करती हैं कि दवा या टीका सेफ भी है और असरदार भी. दवाओं और टीके के अलावा मौजूदा दवाओं में किसी नई खोज, किसी नए चिकित्सा उपकरण का भी क्लिनिकल ट्रायल हो सकता है.

पहले होती है रिसर्च
इंसानी शरीर पर जांच से पहले वैज्ञानिक प्री-क्लिनिकल रिसर्च कहते हैं, ये जांच लैब में ह्यूमन सेल कल्चर पर या फिर चूहे या बंदर जैसे जानवरों पर होती है. जांच में ये समझ आता है कि नया तरीका या दवा या टीका प्रभावी है या नहीं. कई बार ये तरीका इंसानी सेहत के लिए घातक भी हो सकता है तो क्लिनिकल रिसर्च के दौरान ही ये सामने आ जाता है. अगर प्री-क्लिनिकल रिसर्च में फायदा दिखता है तो ही लोगों पर स्टडी होती है.



जांच लैब में ह्यूमन सेल कल्चर पर या फिर चूहे या बंदर जैसे जानवरों पर होती है


ट्रायल कई चरणों में होता है
हर चरण पहले स्टेप की सफलता या असफलता पर आगे बढ़ता है. पहला चरण फेज जीरो (phase 0) कहलाता है. इसमें बहुत छोटे समूह को लिया जाता है, जैसे 11 से 15 व्यक्ति. ट्रायल में शामिल लोगों पर दवा या वैक्सीन का डोज काफी कम मात्रा में दिया जाता है, सिर्फ ये जांचने के लिए कि कहीं इसका कोई खतरनाक असर तो नहीं हो रहा. अगर असर ठीक न दिखे तो ट्रायल बंद करके वैज्ञानिक दोबारा रिसर्च करते हैं.

दूसरा चरण क्या है
दूसरे चरण यानी फेज 1 (phase I) क्लिनिकल परीक्षण के दौरान लगभग 20 से 80 लोगों पर जांचकर्ता कई महीनों तक दवा के प्रभाव को देखते हैं. ये वो लोग होते हैं जो सेहतमंद हों. इस स्टेप का मकसद इस बात की जांच करना है कि दवा या वैक्सीन की ज्यादा खुराक या कितनी ज्यादा खुराक ली जाए, जिसका शरीर पर कोई साइड इफेक्ट न हो. इस दौरान बहुत बारीकी से देखा जाता है कि शरीर दवा पर कैसे प्रतिक्रिया करते हैं. ये भी हो सकता है कि प्री रिसर्च और फेज जीरो में जो परिणाम दिखे हों, इस स्टेप के नतीजे उससे एकदम अलग हों. असर खराब होने पर ट्रायल रोकना होता है. यही वो फेज है, जिसमें ये तय होता है कि दवा को कैसे दिया जाए, जिससे वो ज्यादा असर करे यानी सीरप के रूप में, कैप्सूल की तरह या फिर नसों के जरिए.

सालभर भी चलता है परीक्षण
तीसरे चरण को फेज 2 (phase II) ट्रायल कहते हैं. इसमें वे मरीज शामिल होते हैं, जिनकी सेहत के लिए दवा या वैक्सीन तैयार की जा रही है. उन्हें आमतौर पर वही डोज दिया जाता है तो इससे पहले वाले चरण में मरीजों को दिया गया था. इस फेज के दौरान शोधकर्ता प्रतिभागियों को कई महीनों से लेकर साल-सालभर भी देखते हैं कि दवा का उनके शरीर पर लंबे समय में क्या असर दिख रहा है. क्रॉनिक बीमारियों जैसे कैंसर की दवा का ट्रायल इसी तरह चलता है. Food and Drug Administration (FDA) के मुताबिक इस चरण में आने के बाद लगभग 33% दवाएं या वैक्सीन अगले फेज में पहुंच पाते हैं.

पहले ट्रायल में शामिल लोगों पर दवा या वैक्सीन का डोज काफी कम मात्रा में दिया जाता है


काफी अहम है तीसरा चरण
तीसरे चरण यानी phase III में सबसे ज्यादा लोगों पर प्रयोग होता है. इसके तहत 3 हजार से ज्यादा लोग लिए जाते हैं, जो बीमार हों. ये फेस कई सालों तक चलता है जिसमें बारीकी से असर देखा जाता है. इस फेज का मकसद ये देखना है कि किसी खास बीमारी पर मौजूदा दवाओं की तुलना में नई दवा कैसा असर कर रही है. हालांकि इस ट्रायल तक पहुंचने के लिए शोध करने वालों को ये साबित करना होता है कि दवा सेफ है और उसका असर मौजूदा दवा से ज्यादा नहीं होगा तो कम भी नहीं होगा. इसके लिए एक खास प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिसे randomization कहते हैं. इसमें दो ग्रुप बनाए जाते हैं. एक समूह को मौजूदा यानी पहले से चली आ रही दवा दी जाती है और दूसरे ग्रुप को नई दवा दी जाती है. हालांकि खुद वैज्ञानिकों को ये नहीं पता होता कि कौन सा समूह कौन सी दवा ले रहा है. इससे नतीजे आने पर वैज्ञानिक बिना किसी पूर्वाग्रह के देख पाते हैं कि असल में किस दवा का असर ज्यादा है.

ये स्टेप लगातार चलता रहता है
इसके बाद वाले चरण तक पहुंचते हुए काफी छंटनी हो जाती है और Food and Drug Administration (FDA) के मुताबिक मुश्किल से 25 से 30% दवाएं ही अगले चरण तक पहंच पाती हैं. चौथे और आखिरी चरण (phase IV) की शुरुआत तब होती है, जब FDA दवा या टीके को अप्रूव कर चुका हो. ये बाजार में भी आ चुकी होती है. लेकिन इसके बाद भी लंबे समय तक चलने वाली दवा के साइड इफेक्ट को समझने के लिए ये चरण होता है. इसमें हजारों प्रतिभागियों पर कई सालों तक दवा के असर की स्टडी होती है और ये देखा जाता है कि इससे उनके शरीर में क्या बदलाव आए.

तीसरे चरण में सबसे ज्यादा लोगों पर प्रयोग होता है, इसके तहत 3 हजार से ज्यादा लोग लिए जाते हैं


कौन शामिल हो सकते हैं ट्रायल में 
कई वजहों से लोग क्लिनिकल ट्रायल का हिस्सा बनते हैं. जैसे कुछ लोग अपनी बीमारी से हार चुके होते हैं और सोचते हैं कि नई दवा से कुछ तो होगा. कुछ लोग इस वजह से जुड़ते हैं क्योंकि उनकी बीमारी का कोई इलाज नहीं है. ट्रायल का हिस्सा बनें, इससे पहले वैज्ञानिक उन्हें उनकी बीमारी और उसके मौजूदा यानी वर्तमान में चल रहे इलाज के बारे में बताते हैं. साथ ही नए परीक्षण की पूरी जानकारी दी जाती है कि इसमें क्या होगा और उनके शरीर पर कैसा असर हो सकता है. ये बातें प्री-रिसर्च में सामने आई बातें ही होती हैं. क्लिनिकल रिसर्च में स्वस्थ लोग भी जुड़ते हैं जो किसी बीमारी से बचाव में दुनिया की मदद करना चाहते हैं या फिर जो अपने किसी परिजन की बीमारी ठीक करने की इच्छा रखते हों.

सिर्फ आपकी हां ही काफी नहीं, ट्रायल के लिए आपके हेल्थ की जांच भी होती है. सब ठीक होने पर सहमति पत्र साइन किया जाता है और फिर ट्रायल की शुरुआत होती है. इसमें लगातार आपकी निगरानी होती है. चारों ही चरणों में हर उम्र और सेहत के लोगों को लिए जाने पर जोर होता है ताकि स्टडी के परिणाम व्यापक रहें.

ये भी देखें:

Coronavirus: सामने आई वे 2 कोशिकाएं, जिनके जरिए शरीर पर हमला करता है वायरस

Coronavirus: जानें किस देश ने अब तक नहीं लगाई कोई पाबंदी, 9500 से ज्‍यादा लोग हो चुके हैं संक्रमित

38 साल पहले भारत में आज ही के दिन पहली बार रंगीन हुआ था टीवी, 96 साल में कैसे बदला इडियट बॉक्‍स

समुद्र यात्रा पर निकला ये कपल 25 दिन तक कोरोना वायरस से दुनिया में मची तबाही से रहा अनजान
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज

corona virus btn
corona virus btn
Loading