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क्या होता है क्रीमी लेयर, जिसकी बंदिशों के खिलाफ खड़ा है SC/ST समुदाय

News18Hindi
Updated: December 3, 2019, 1:49 PM IST
क्या होता है क्रीमी लेयर, जिसकी बंदिशों के खिलाफ खड़ा है SC/ST समुदाय
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एस. ए. बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने 2 दिसंबर को कहा है कि एससी/एसटी की क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने या न रखने के पहलू पर दो सप्ताह बाद विचार किया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की पांच सदस्यीय संविधान पीठ (Constitutional Bench) ने 2018 में कहा था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC/ST) के समृद्ध लोग यानी कि क्रीमी लेयर (Creamy Layer) को कॉलेज में दाखिले तथा सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता.

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  • Last Updated: December 3, 2019, 1:49 PM IST
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क्रीमी लेयर (Creamy Layer) टर्म का इस्तेमाल ओबीसी जातियों (OBC Caste) के उन व्यक्तियों के लिए होता है जो अपेक्षाकृत ज्यादा समृद्ध और पढ़े-लिखे हैं. इस टर्म का प्रयोग पहली बार सत्तनाथन कमीशन (sattanathan commission) ने 1971 में किया था जिसका कहना था कि सरकारी नौकरियों में ऐसे लोगों को आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए. बाद में इसका इस्तेमाल जस्टिस रामनंदन कमेटी (ram nandan committee) ने 1993 में भी किया था.

जब लागू हुआ क्रीमी लेयर
ओबीसी समुदाय के पढ़े लिखे और समृद्ध लोगों के लिए टर्म तो बन गया, लेकिन जब इसे लागू करने की बारी आई तो इसका पैमाना पारिवारिक इनकम को माना गया. 1993 में जब क्रीमी लेयर पहली बार लागू हुआ तब 1 लाख से ऊपर सालाना आय वाले परिवारों को इसमें रखा गया. बाद में साल 2004 में इसे बढ़ाकर 2.5 लाख कर दिया गया. 2008 में यह 4.5 लाख हुआ तो 2013 में 6 लाख हो गया. आखिरी बार इसमें परिवर्तन 2017 में हुआ और इसे 8 लाख कर दिया गया.

साल 2015 में नेशनल कमीशन फॉर बैकवर्ड क्लासेज ने प्रस्ताव दिया कि सीलिंग को बढ़ाकर 15 लाख कर दिया जाना चाहिए. आयोग ने तब ओबीसी जातियों में भी कैटेगरी बनाने की वकालत की थी. आयोग ने कहा था कि ओबीसी जातियों में बैकवर्ड, मोर बैकवर्ड और एक्सट्रिमली बैकवर्ड की श्रेणियां बनाई जानी चाहिए और 27 प्रतिशत का कोटा इन सभी में जरूरत के आधार पर बांटना चाहिए. आयोग का तर्क था कि इससे मजबूत ओबीसी जातियां आरक्षण का पूरा लाभ खुद ही नहीं उठा पाएंगी. अन्य कमजोर जातियों को भी इसका लाभ मिल पाएगा.

क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने
सुप्रीम कोर्ट ने 8 सितंबर 1993 को जारी भारत सरकार के मेमोरंडम के आधार पर इसकी व्याख्या की थी. सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर की व्याख्या करते हुए कहा था कि आरक्षण का लाभ संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों (जैसे राष्ट्रपति, सुप्रीम के न्यायाधीश, हाईकोर्ट के न्यायाधीश, केंद्र और राज्य के ब्यूरोक्रेट, पब्लिक सेक्टर के कर्मचारी, सेना और अर्द्धसैनिक बलों में कर्नल रैंक से ऊपर के अधिकारी) के बच्चों को नहीं मिलना चाहिए. हालांकि तब इससे SC/ST समुदाय को बाहर रखा गया था.

SC/ST भी हुआ शामिल
30 सितंबर 2018 के पहले तक SC/ST समुदाय को क्रीमी लेयर से बाहर रखा गया था. लेकिन इसके बाद  क्रीमी लेयर के दायरे में ये समुदाय भी आ गया. हालांकि इस समुदाय पर क्रीमी लेयर का इस्तेमाल आर्थिक आधार पर नहीं किया गया है. इन जातियों के लिए पिछड़ापन और छुआछूत को आधार बनाया गया है. इसके अलावा इसका इस्तेमाल प्रमोशन में आरक्षण पर भी होता है.

सुप्रीम कोर्ट का आदेश
दरअसल SC/ST समुदाय को क्रीमी लेयर के दायरे में लाने का निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने दिया था. पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 2018 में कहा था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के समृद्ध लोग यानी कि क्रीमी लेयर को कॉलेज में दाखिले तथा सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ SC/ST समुदाय ने देश में कई जगह विरोध प्रदर्शन किए थे.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ SC/ST समुदाय ने देश में कई जगह विरोध प्रदर्शन किए थे.


अभी चर्चा में क्यों है मुद्दा
समता आंदोलन समिति और पूर्व आईएएस अधिकारी ओपी शुक्ला ने नई याचिका दायर की है. एक जनहित याचिका में 'एससी/एसटी की क्रीमी लेयर की पहचान के लिए तर्कसंगत जांच करने और उन्हें एससी/एसटी की नॉन क्रीमी लेयर से अलग करने' का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है.

मुद्दे पर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एस. ए. बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने 2 दिसंबर को कहा है कि एससी/एसटी की क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने या न रखने के पहलू पर दो सप्ताह बाद विचार किया जाएगा.

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First published: December 3, 2019, 1:24 PM IST
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