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चीन और अमेरिका से ज्यादा अवसादग्रस्त भारत में क्यों बढ़ रहे हैं

News18Hindi
Updated: October 21, 2019, 4:41 PM IST
चीन और अमेरिका से ज्यादा अवसादग्रस्त भारत में क्यों बढ़ रहे हैं
डिप्रेशन हमारे देश में बढ़ता ही जा रहा है

WHO के अनुसार डिप्रेशन की वजह से साल 2012 से 2030 के बीच देश को 1.03 trillion डॉलर का नुकसान हो सकता है. इस नुकसान की बड़ी वजह अवसाद को नजरअंदाज करना और मेंटल हेल्थ सुविधाओं का न के बराबर होना है.

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अवसाद यानी डिप्रेशन को ग्लोबल डिसएबिलिटी में सबसे ऊपर रखा गया है. यानि डिप्रेशन की वजह से सबसे ज्यादा लोगों पर असर हो रहा है, जिसका सीधा असर कार्यक्षमता पर पड़ता है. WHO (World Health Organization) की रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया का सबसे ज्यादा अवसादग्रस्त देश है, जिसके बाद अमेरिका और फिर चीन का नंबर आता है. इतनी बड़ी संख्या के बीमार होने के बावजूद लगभग 1 लाख लोगों पर एक मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक है.

हालिया आंकड़े और भी ज्यादा डराने वाले हैं. ये बताते हैं कि भारत में हर साल लगभग 2.2 लाख आत्महत्याएं होती हैं. Global Burden of Diseases, Injuries and Risk Factors Study के अनुसार साल 2016 में देश की जनसंख्या कुल ग्लोबल जनसंख्या का 18% थी, जिसमें महिलाओं में खुदकुशी की दर 36.6% और पुरुषों में इसका प्रतिशत 24.3% था. वैसे तो सारे लोग, जो डिप्रेशन में हों, उनकी मौत खुदकुशी से नहीं होती लेकिन मेजर डिप्रेशन में खुदकुशी का खतरा दोगुना हो जाता है.ॉ

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अवसाद किसी को भी हो सकता है

कुछ महीनों पहले कैफे कॉफी डे (सीसीडी) के संस्थापक चेयरमैन वी.जी. सिद्धार्थ की संदिग्ध हालातों में मौत और फिर सुसाइड नोट का मिलना यही बताता है कि इसका पैसों या सामाजिक स्टेटस से खास लेना-देना नहीं.

डिप्रेशन का सबसे पहला लिखित प्रमाण ईसापूर्व दूसरी सदी में दिखता है. उस दौरान डिप्रेशन को फिजिकल या मेंटल कंडीशन की बजाए आध्यात्मिक कंडीशन माना गया और इसे चर्च के पादरी ठीक किया करते थे. ग्रीस, रोम, चीन और इजिप्ट में यही माना गया. कुछ वक्त बाद पुजारियों की जगह ग्रीक और रोमन डॉक्टरों ने इसका इलाज शुरू किया. तब जिमनास्टिक, मालिश, खानपान के अलावा गधे के दूध से इसका इलाज किया जाता था.Hippocrates नाम तो खूब सुना होगा. ये वही Hippocrates है जिसने सबसे पहले डिप्रेशन को एक बीमारी की तरह देखा.

अवसाद में हमारे सोचने और काम करने के तरीके पर असर पड़ता है

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ये समझना जरूरी है कि डिप्रेशन क्या है
ये major depressive disorder के तहत आता है जो कि आम लेकिन सीरियस मेडिकल जरूरत है. अवसाद में हमारे सोचने और काम करने के तरीके पर असर पड़ता है. कम से कम दो हफ्ते तक लगातार सिर्फ नकारात्मक सोच रहे, नींद और खाने का तरीका बदल जाए, हरदम थकान रहे, शौक खत्म हो जाए तो ये सारे लक्षण डिप्रेशन के तहत आते हैं. हालांकि कई दूसरी बीमारियों के लक्षण डिप्रेशन से मिलते-जुलते हैं जैसे कि थायरॉइड, ब्रेन ट्यूमर और विटामिन डी की कमी. ऐसे में डिप्रेशन के नतीजे पर पहुंचने से पहले डॉक्टर दूसरी जांचें भी करवाते हैं.

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कैसे डिप्रेशन उदासी से अलग है
किसी करीबी की मौत, नौकरी जाने या किसी रिश्ते के टूटने पर दुख या उदासी का भाव रहना सामान्य बात है. ये स्वाभाविक है. इस दौरान भी लोगों में डिप्रेशन के लक्षण दिखाई देते हैं लेकिन ये डिप्रेशन है नहीं. दुख या उदासी का भाव किसी खास वजह से उपजता है और कुछ वक्त बाद चला भी जाता है, वहीं डिप्रेशन में एकाएक कोई वजह नहीं दिखती.

किनको है ज्यादा खतरा
वैसे तो डिप्रेशन किसी को भी हो सकता है लेकिन कुछ खास लोगों में इसका खतरा ज्यादा रहता है. जैसे मस्तिष्क में कुछ खास केमिकल्स में बदलाव से अवसाद होता है. इसकी वजह से दिमाग के 3 हिस्सों- हिप्पोकैंपस, एमीग्डेला और प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स पर असर होता है. ये तीनों ही हिस्से काफी अहम हैं और याददाश्त, निर्णय लेने की क्षमता और भावनाओं पर कंट्रोल रखते हैं. इनपर असर पड़ने पर इंसान का नॉर्मल व्यवहार बदल जाता है. डिप्रेशन के पीछे कोई आनुवांशिक वजह भी हो सकती है. इसके तहत कुछ लोग जब चुनौतीपूर्ण समय से गुज़र रहे होते हैं तो उनके अवसाद में जाने की आशंका अधिक रहती है. इनके अलावा हिंसा, बचपन के बुरे अनुभव, गरीबी और कमजोर आत्मविश्वास भी डिप्रेशन की वजह हो सकता है.

मस्तिष्क में कुछ खास केमिकल्स में बदलाव से अवसाद होता है


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कैसे काम करती हैं दवाएं
रिसर्च में देखा गया कि एंटी डिप्रेसेंट्स लगभग 90 प्रतिशत लोगों पर काम करते हैं. ये मूलतः 4 तरह के होते हैं, जैसे serotonin, norepinephrine, dopamine और monoamine oxidase inhibitors. इन दवाओं के इस्तेमाल से मस्तिष्क में रासायनिक असंतुलन काफी हद तक ठीक हो जाता है. वैसे ये दवाएं तुरंत असर नहीं करतीं, बल्कि तीन से चार हफ्तों के भीतर ही असर दिखना शुरू होता है और इलाज कुछ महीनों से लेकर कई साल तक चल सकता है. ये इस बात पर निर्भर करता है कि डिप्रेशन किस स्तर का है, माइल्ड, मॉडरेट या सीवियर. दवाओं के साथ psychotherapy भी दी जाती है, इसके तहत मरीज से बात करके डिप्रेशन की जड़ तक पहुंचने की कोशिश होती है. कई बार मरीज का डिप्रेशन इतना पुराना और इस स्तर का होता है कि दवाओं के साथ ही साथ electroconvulsive therapy (ECT) भी देनी होती है.

इंटरनेट के जरिए भी पहचान
वैज्ञानिकों ने इंटरनेट पर ऐसे कई थैरेपी प्लेटफॉर्म बनाए हैं जो डिप्रेशन से लड़ने में मदद करते हैं. ये रिसर्च अमेरिका की इंडियाना यूनिवर्सिटी में की गई. शोधकर्ताओं ने 4781 लोगों को रिसर्च में शामिल किया और उन्हें वे थैरेपी दी गईं, जो इंटरनेट पर उपलब्ध हैं या जो इस तरह के दावे करती हैं. सकारात्मक रिजल्ट के बाद ये शोध जर्नल ऑफ मेडिकल इंटरनेट रिसर्च में भी प्रकाशित हुई. रिसर्च से जुड़े एक शोधकर्ता लॉरेंजो लॉसेस कहते हैं- पहले मुझे लगता था कि इंटरनेट पर मिलने वाले एप्स से हल्के-फुल्के अवसाद को ठीक किया जा सकता है लेकिन शोध के नतीजे बताते हैं कि इनसे गंभीर अवसाद से जूझ रहे लोगों को भी मदद मिलती है.

डिप्रेशन के पीछे कोई आनुवांशिक वजह भी हो सकती है


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iCBT या इंटरनेट-बेस्ड कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी एप्स के जरिए डिप्रेशन से अलग-अलग स्तरों पर प्रभावित लोगों की मदद हो सकती है. हालांकि ये एप्स मनोवैज्ञानिकों, मनोचिकित्सकों और दवाओं का विकल्प नहीं.

गूगल ने एक टूल की पहल की है
इसमें गूगल पर डिप्रेशन सर्च करते ही वो एक प्रश्नावली लाएगा जिसे पेशेंट हेल्थ क्वेश्चनायर नाम दिया जा रहा है. इसपर क्लिक करते ही नौ सवाल एक के बाद एक खुलेंगे, जो आपको एक निष्कर्ष तक पहुंचने में मदद करेंगे. नौ सवालों के कारण इसे पीएचक्यू-9 नाम दिया गया है. ये सवाल कुछ इस तरह के होंगे कि क्या आप काम में अपनी दिलचस्पी खो रहे हैं या क्या आपको पढ़ने या किसी से बात करते हुए ध्यान केंद्रित करने में मुश्किल आती है. इसी तासीर के सवालों के जरिए आप एक जवाब तक पहुंच सकेंगे. हालांकि फिलहाल ये दुनिया के सारे देशों के इंटरनेट यूजर्स के लिए नहीं है.

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First published: October 21, 2019, 4:21 PM IST
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