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क्यों है नागा साधुओं और अघोरियों में जबरदस्त अंतर, क्या माघ मेले में आए हैं वो

News18Hindi
Updated: January 24, 2020, 1:28 PM IST
क्यों है नागा साधुओं और अघोरियों में जबरदस्त अंतर, क्या माघ मेले में आए हैं वो
प्रयागराज में इन दिनों माघ मेला चल रहा है, उसमें कुछ संख्या में नागा साधु भी दीख जा रहे हैं. एक साल पहले जब वहां अर्धकुंभ हुआ था, तब बड़ी संख्या में नागा साधू भी आए थे और अघोरी भी. भारतीय साधू पंथ में ये दो अलग तरह की धाराएं हैं. दोनों का अलग जीवन दर्शन है. अलग खान-पान. आमतौर पर जो काम नागा नहीं करते वो अघोरी जरूर करते हैं

प्रयागराज में इन दिनों माघ मेला चल रहा है, उसमें कुछ संख्या में नागा साधु भी दीख जा रहे हैं. एक साल पहले जब वहां अर्धकुंभ हुआ था, तब बड़ी संख्या में नागा साधू भी आए थे और अघोरी भी. भारतीय साधू पंथ में ये दो अलग तरह की धाराएं हैं. दोनों का अलग जीवन दर्शन है. अलग खान-पान. आमतौर पर जो काम नागा नहीं करते वो अघोरी जरूर करते हैं

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  • Last Updated: January 24, 2020, 1:28 PM IST
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नागा शब्द का अर्थः 'नागा' शब्द की उत्पत्ति के बारे में कुछ विद्वानों की मान्यता है कि यह शब्द संस्कृत के 'नागा' शब्द से निकला है, जिसका अर्थ 'पहाड़' से होता है और इस पर रहने वाले लोग 'पहाड़ी' या 'नागा' कहलाते हैं. 'नागा' का अर्थ 'नग्न' रहने वाले व्यक्तियों से भी है. उत्तरी-पूर्वी भारत में रहने वाले इन लोगों को भी 'नागा' कहते हैं. प्रयागराज में इन दिनों माघ मेला चल रहा है. एक साल पहले जब प्रयागराज में अर्धकुंभ लगा था तो उसमें नागा साधुओं के साथ अघोरी भी बड़ी तादाद में आए थे लेकिन माघ मेला में दोनों नजर नहीं आते.


वहीं अघोरी शब्द का संस्कृत भाषा में मतलब होता है 'उजाले की ओर'. साथ ही इस शब्द को पवित्रता और सभी बुराइयों से मुक्त भी समझा जाता है. लेकिन अघोरियों को रहन-सहन और तरीके इसके बिलकुल विरुद्ध ही दिखते हैं.


नागा संन्यासी कुछ दिन एक गुफा में रहते हैं फिर दूसरी गुफा में चले जाते हैं. इसके चलते उनकी सटीक स्थिति का पता लगाना मुश्किल होता है. कुछ नागा वस्त्र पहनकर तो कुछ नग्न ही गुप्त स्थान पर रहकर तपस्या करते हैं. अखाड़ों के ज्यादातर नागा साधु हिमालय, काशी, गुजरात और उत्तराखंड में रहते हैं. नागा साधु अखाड़े के आश्रम और मंदिरों में रहते हैं. कुछ तप के लिए हिमालय या ऊंचे पहाड़ों की गुफाओं में जीवन बिताते हैं. अखाड़े के आदेशानुसार यह पैदल भ्रमण भी करते हैं. इसी दौरान किसी गांव की मेर पर झोपड़ी बनाकर धुनी रमाते हैं.


ज्यादातर अघोरी श्मशान घाट पर रहते हैं. वैसे कई अघोरी गुफाओं और सूनसान इलाकों में भी रहते हैं.


नागा साधुओं को रात और दिन मिलाकर केवल एक ही समय भोजन करना होता है. वो भोजन भी भिक्षा मांग कर लिया गया होता है. एक नागा साधु को अधिक से अधिक सात घरों से भिक्षा लेने का अधिकार है. अगर सातों घरों से कोई भिक्षा ना मिले, तो उसे भूखा रहना पड़ता है. जो खाना मिले, उसमें पसंद-नापसंद को नजर अंदाज करके प्रेमपूर्वक ग्रहण करना होता है.


यह बात सच है कि बहुत से इंटरव्यूज और डाक्यूमेंट्रीज में यह बात खुद कई अघोरियों ने मानी है कि वो इंसान का कच्चा मांस खाते हैं. अक्सर ये अघोरी श्मशान घाट की अधजली लाशों को निकालकर उनका मांस खाते हैं, वे शरीर के द्रव्य भी प्रयोग करते हैं. इसके पीछे उनका मानना है कि ऐसा करने से उनकी तंत्र करने की शक्ति प्रबल होती है. वहीं जो बातें आम जनमानस को वीभत्स लगती हैं, अघोरियों के लिए वो उनकी साधना का हिस्सा है.


नागा साधु सोने के लिए पलंग, खाट या अन्य किसी साधन का उपयोग नहीं कर सकते. यहां तक कि नागा साधुओं को कृत्रिम पलंग या बिस्तर पर सोने की भी मनाही होती है. नागा साधु केवल जमीन पर ही सोते हैं. यह बहुत ही कठोर नियम है, जिसका पालन हर नागा साधु को करना पड़ता है. आमतौर पर यह नागा सन्यासी अपनी पहचान छुपा कर रखते हैं.
अघोरी खुद को पूरी तरह से शिव में लीन करना चाहते हैं. शिव के पांच रूपों में से एक रूप 'अघोर' है. शिव की उपासना करने के लिए ये अघोरी शव पर बैठकर साधना करते हैं. 'शव से शिव की प्राप्ति' का यह रास्ता अघोर पंथ की निशानी है. ये अघोरी 3 तरह की साधनाएं करते हैं, शव साधना, जिसमें शव को मांस और मदिरा का भोग लगाया जाता है. शिव साधना, जिसमें शव पर एक पैर पर खड़े होकर शिव की साधना की जाती है और श्मशान साधना, जहां हवन किया जाता है.


जब कोई किशोर या युवक नागा अखाड़े से जुड़ता है तो सबसे पहले अपना श्राद्ध, मुंडन और पिंडदान करते हैं. फिर गुरु मंत्र लेकर संन्यास धर्म में दीक्षा लेते हैं. इसके बाद इनका जीवन अखाड़ों, संत परम्पराओं और समाज के लिए समर्पित हो जाता है, अपना श्राद्ध कर देने का मतलब होता है सांसारिक जीवन से पूरी तरह विरक्त हो जाना, इंद्रियों मे नियंत्रण कर लेना और हर प्रकार की कामना का अंत कर देना.


अघोरियों का मानना है कि हर व्यक्ति अघोरी के रूप में जन्म लेता है. उनका कहना है कि जैसे एक नन्हें बच्चे को अपनी गंदगी, भोजन में कोई अंतर नहीं समझ आता, वैसे ही अघोरी भी हर गंदगी और अच्छाई को एक ही नजर से देखते हैं.


एक से दूसरी और दूसरी से तीसरी इसी तरह गुफाओं को बदलते और भोले बाबा की भक्ति में डूबे नागा जड़ी-बूटी और कंदमूल के सहारे पूरा जीवन बिता देते हैं. कई नागा जंगलों में घूमते-घूमते सालों काट लेते हैं. वो बस कुंभ या अर्ध कुंभ में नजर आते हैं. कभी - कभी वो माघ मेले में भी नजर आते हैं लेकिन ये कोई जरूरी नहीं.


अघोरियों के पास हमेशा एक इंसानी खोपड़ी जरूर रहती है. अघोरी मानव खोपड़ियों को भोजन के पात्र के रूप में इस्तेमाल करते हैं. इसी वजह से उन्हें 'कापालिक' कहा जाता है. कहा जाता है कि ये प्रेरणा उन्हें शिव से मिली. किवदंतियों के अनुसार एक बार शिव ने ब्रह्मा का सिर काट दिया था. फिर उनका सिर लेकर पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगाया था. शिव के इसी रूप के अनुयायी होने के कारण अघोरी भी अपने साथ नरमुंड रखते हैं.


नागा साधुओं की जब दीक्षा हो जाती है तो उन्हें उनका गुरु नया नाम और नई पहचान देता है. फिर जीवन भर वो इसी नाम से पहचाने जाते हैं. घर से उनका संबंध फिर पूरी तरह खत्म हो जाता है.


यह प्रचलित धारणा है कि अघोरी साधु शवों की साधना के साथ ही उनसे शारीरिक संबंध बनाते हैं. यह बात खुद अघोरी भी मानते हैं. इसके पीछे का कारण वो यह बताते हैं कि शिव और शक्ति की उपासना करने का यह तरीका है. उनका कहना है कि उपासना करने का यह सबसे सरल तरीका है, वीभत्स में भी ईश्वर के प्रति समर्पण. वो मानते हैं कि अगर शव के साथ शारीरिक क्रिया के दौरान भी मन ईश्वर भक्ति में लगा है तो इससे बढ़कर साधना का स्तर क्या होगा.


अगर नागा ब्रह्मचर्य का पालन करने की परीक्षा से सफलतापूर्वक गुजर जाता है, तो उसे ब्रह्मचारी से महापुरुष बनाया जाता है. उसके पांच गुरु बनाए जाते हैं. ये पांच गुरु पंच देव या पंच परमेश्वर (शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और गणेश) होते हैं. इन्हें भस्म, भगवा, रूद्राक्ष आदि चीजें दी जाती हैं. यह नागाओं के प्रतीक और आभूषण होते हैं.


अन्य साधुओं की तरह ये ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करते. बल्कि शव पर राख से लिपटे मंत्रों और ढोल नगाड़ों के बीच शारीरिक संबंध बनाते हैं. यह शारीरिक सम्बन्ध बनाने की क्रिया भी साधना का ही हिस्सा है खासकर उस वक्त जब महिला के मासिक चल रहे हों. कहा जाता है कि ऐसा करने से अघोरियों की शक्ति बढ़ती है.


वर्तमान में कई अखाड़ों में महिलाओं को भी नागा साधु की दीक्षा दी जाती है. इनमें विदेशी महिलाओं की संख्या भी काफी है. वैसे तो महिला नागा साधु और पुरुष नागा साधु के नियम कायदे समान ही है. फर्क केवल इतना ही है कि महिला नागा साधु को एक पीला वस्त्र लपेटकर रखना पड़ता है. यही वस्त्र पहन कर स्नान करना पड़ता है. उन्हें नग्न स्नान की अनुमति नहीं है, यहां तक की कुम्भ मेले में भी नहीं.


अघोरियों को कुत्तों से बहुत प्रेम होता है. अन्य सभी जानवरों जैसे गाय, बकरी या इंसान से दूरी बनाने वाले अघोरी अपने साथ और आस-पास कुत्ता रखना पसंद करते हैं.

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First published: January 24, 2020, 1:11 PM IST
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