जानिए, लद्दाख में तैनात फायर एंड फ्यूरी कोर के जांबाज कौन हैं

फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के पास खून जमा देने वाले पहाड़ी इलाकों में भी जांबाजी से लड़ने की सारी खूबियां हैं -सांकेतिक फोटो
फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स के पास खून जमा देने वाले पहाड़ी इलाकों में भी जांबाजी से लड़ने की सारी खूबियां हैं -सांकेतिक फोटो

भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कोर (Fire and Fury Corps in Indian Army) ऊंचे पहाड़ों पर बर्फीले तूफानों में भी दुश्मन सेना का मुकाबला करने के लिए प्रशिक्षित है. ये कोर अब लद्दाख में चीन (China in Ladakh) को जवाब देने को तैयार है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 17, 2020, 12:43 PM IST
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पूर्वी लद्दाख में किसी भी चुनौती से निपटने के लिए भारतीय सेना की एक खास टुकड़ी तैनात हो चुकी है. फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स (Fire and Fury Corps) नाम से इस टुकड़ी के पास खून जमा देने वाले पहाड़ी इलाकों में भी जांबाजी से लड़ने की सारी खूबियां होती हैं. बता दें कि चीन के हजारों सैनिक तोप-बारूद के साथ लद्दाख के उस पार तैनात हैं और लगातार आक्रामक हो रहे हैं. ऐसे में भारतीय सेना अपनी ओर से पूरी तैयारी में है.

क्या है ये कोर 
फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स भारतीय थल सेना का खास हिस्सा है. इसे 14 कोर भी कहते हैं. ये आमतौर पर जम्मू-कश्मीर के उधमपुर में तैनात रहने वाली टुकड़ी है. सेना के इस कोर का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं. साल 1962 में इसे चीन से युद्ध के बीच तैयार किया गया था. तब इसे पूर्वी कमान के रिजर्व के तौर पर रखा गया था. पूर्व में लगभग 3 दशक तक रहने के बाद इस सैन्य टुकड़ी को लद्दाख भेज दिया गया और तब से वहीं पर उसकी तैनाती है.

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पहले भी दिखाई है जांबाजी


कोर-14 कई बार विपरीत हालातों में भी अपने पराक्रम का परिचय दे चुका है. ये करगिल-लेह में साल के बारहों महीने तैनात रहता है ताकि पाकिस्तान के किसी नापाक मंसूबे का जबाव दे सके. साथ ही साथ सियाचिन ग्लेशियर में ये टुकड़ी चीन से सुरक्षा के लिए खड़ी रहती है.

फायर एंड फ्यूरी कोर में कई हिस्से हैं- सांकेतिक फोटो (Pixabay)




क्या काम करती है
भारतीय सेना की ये टुकड़ी इसलिए भी अहम मानी जाती है क्योंकि ये सियाचिन में तैनात सैनिकों के लिए रसद और बाकी जरूरी चीजों की सप्लाई करती है. बता दें कि साल के बारहों महीने माइनस से काफी कम तापमान के कारण यहां जरूरी चीजें पैदल पथ से ले जानी होती हैं, जैसे बर्फीले जानवरों की मदद से ढोते हुए. हेलीकॉप्टर से गोला-बारूद जैसी सप्लाई ही पहुंचाई जाती है, जो बर्फीली हवा वाले मौसम में मुमकिन नहीं.

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कोर के कई हिस्से हैं 
फिलहाल फायर एंड फ्यूरी कोर में कई हिस्से हैं. जैसे एक है थर्ड इंफेंट्री डिवीजन. ये हिस्सा अक्टूबर 1962 में लद्दाख में तैयार हुआ. यही टुकड़ी साल 1965 में भारत-पाकिस्तान लड़ाई में मजबूती से पाक सेना के मुकाबले में खड़ी रही. साल 1991 में ये 15 कोर का हिस्सा बन गई. इसका हेडक्वार्टर लेह से लगभग 40 किलोमीटर दूर कारू में स्थित है. कारगिल युद्ध में भी इसने अहम भूमिका निभाई.

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फायर एंड फ्यूरी कोर का एक और हिस्सा है आठवां इंफेंट्री डिवीजन. इसे साल 1963 में नगालैंड में काउंटर इनसर्जेंसी के जवाब के लिए तैयार किया गया था. साल 1990 तक ये कोहिमा में तीसरे कोर के तहत काम करती रही.

14 कोर की एक सबसे बड़ूी खासियत है इसका मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल


सबसे ऊंचाई पर तमाम सुविधाओं वाला अस्पताल
14 कोर की एक सबसे बड़ूी खासियत है इसका अस्पताल. हाई अल्टिट्यूड मेडिकल रिसर्च सेंटर (HAMRC) के नाम से ये अस्पताल अकेला ऐसा मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल है, जो इतनी ऊंचाई पर स्थित है और बर्फीले मौसम में भी सर्जरी से लेकर सारी जरूरतों पर पूरी दक्षता से काम करता है.

अब ये हैं कोर के प्रमुख
हाल ही में इस कोर की कमान लेफ्टिनेंट जनरल पीजीके मेनन को दी गई. 14 कोर के मुख्यालय लेह में लेफ्टिनेंट जनरल हरीन्द्र सिंह ने कोर की कमान लेफ्टिनेंट जनरल मेनन को दी.ये सेना के वही अफसर हैं, जो 21 सितंबर को भारत और चीन के बीच मीटिंग का हिस्सा रहे थे. ये पहली ऐसी मीटिंग थी, जिसमें दोनों देशों के मिलिट्री अधिकारी और राजनयिकों ने हिस्सा लिया था.

बता दें कि लेफ्टिनेंट जनरल मेनन आतंकवाद, नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान की साजिशें नाकाम करने में खासी महारत रखते हैं. वे इससे पहले जम्मू कश्मीर में सेना की राष्ट्रीय राइफल्स की यूनिट, नियंत्रण रेखा पर एक ब्रिगेड व पूर्वी सेक्टर में सेना की इन्फैंट्री डिवीजन की कमान संभाल चुके हैं.
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