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जानिए क्या है Helium 3 जिसके लिए चांद तक पर जाने को तैयार हैं हम

चांद के अगले हिस्से पर ज्वालामुखी गतिविधियां ज्यादा हुई हैं.

चांद के अगले हिस्से पर ज्वालामुखी गतिविधियां ज्यादा हुई हैं.

हीलियम-3 (Helium-3) चांद पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है जो एक हानिरहित प्रचुर ऊर्जा का स्रोत है. इसी के दोहन के लिए दुनिया के कई देश चांद से इसे पृथ्वी पर लाने की तैयारी कर रहे हैं.

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नई दिल्ली: कई लोगों को लगता है कि अंतरिक्ष अनुसंधान (Space Research) के लिए किया जाने वाला खर्च फिजूल है. इस बात से वैज्ञानिक और विशेषज्ञ सहमत नहीं हैं. उन्हें लगता है कि ये तमाम शोध एक न एक दिन इंसान के काम ही आएंगे. ऐसे ही शोधों में से एक है हीलियम-3 (Helium-3)की खोज जो हमें धरती पर नहीं बल्कि चांद पर मिलेगा.

कई देश लगे हैं इस अभियान में
चांद पर से किसी भी वस्तु को लाना आसान काम नहीं हैं. लेकिन भारत सहित दुनिया के कई देश इस काम को कर रहे हैं. अमेरिका इंसान को चांद पर भेजने के अपने अभियान पर 19 बिलियन से ज्यादा खर्च करने को तैयार है. चीन भी चांद के पिछले हिस्से में रोवर भेजने के बाद वहां इंसान भेजने की तैयारी कर रही है.

क्या होता है हीलियम-3 और क्यों है यह खास
हीलियम-3 हीलियम का ऐसा आइसोटोप हैं. आम हीलियम में दो प्रोटोन दो न्यूट्रॉन और दो इलेक्ट्रॉन होते हैं. और उसका आणविक भार 4 होता है, लेकिन हीलियम-3 में दो प्रोटोन, दो इलेक्ट्रॉन और एक ही न्यूट्रॉन होता है और आणविक भार 3 होता है. माना जाता है कि हीलियम का यह आईसोटोप फ्यूजन रिएक्टर के लिए एक सुरक्षित आण्विक स्रोत है क्योंकि यह रेडियोएक्टिव नहीं है और इससे खतरनाक अपशिष्ट उत्पाद नहीं मिलेंगे. यानि यह रोडियोएक्टिव प्रदूषण भी नहीं फैलाएगा.

कहां से आया चांद पर हीलियम-3
चांद पर हीलियम-3 का प्रचुर भंडार सौरपवन से आई हैं जहां उससे रोकने के लिए पृथ्वी की तरह कोई मैग्नेटिक फील्ड नहीं है. इसी मैग्नेटिक फील्ड की वजह से यह हीलियम पृथ्वी पर नहीं आ सका. पृथ्वी की मैनेटिक फील्ड हमें सूर्य पर होने वाली सौर तूफानों के कारण पैदा हुई सौरपवनों से तो हमें बचा लेती हैं. इसके साथ ही हीलियम-3 भी पृथ्वी पर नहीं पहुंचा पाता. अब इस कमी को चंद्रमा पूरा कर सकता है.

चांद से लाए गए नमूने में पहले हीलियम 3 पाया गया था.


कितना हीलियम-3 है चांद पर
नासा की एडवाइजरी काउंसिल के पूर्व सदस्य जिराल्ड कुलकिंस्की का कहना है कि अनुमान है कि चांद पर कम से कम एक मिलियन मेट्रिक टन हीलियम-3 मौजूद है. उसमें से भी केवल एक चौथाई ही पृथ्वी पर लाया जा सकता है. फिर भी यह दुनिया की अगले तीन या पांच शताब्दियों की मांग की आपूर्ति करने में सक्षम है. कुलसिंक्सी का मानना है कि इसकी कीमत करीब 5 अरब डालर प्रति टन है. जबकि पृथ्वी पर 250,000 टन की हीलियम-3 लाई जा सकती है.

कैसे पता चला हीलियम का
हीलियम-3 की चांद पर मौजूदगी का पता अपोलो मिशन से आए नमूनों से पता चला. अपोलो-17 के अंतरिक्ष यात्री और जियोलॉजिस्ट हैरिसन शिमिट दिसंबर 1972 में चांद पर गए थे. उन्हें वहां से लाए नमूनों में हीलियम-3 मिला था.

क्या चुनौतियां हैं. हीलियम-3 के प्रयोग में
चांद पर जाना, वहां पर हीलियम-3 को जमा करना और फिर वहां से इतनी बड़ी मात्रा में सुरक्षित उसे धरती पर लाना नामुमकिन भले ही न हो, लेकिन आसान भी नहीं है. उससे ज्यादा यह कम खर्चीला भी नहीं है. इसके बाद इसका फ्यूजन आण्विक रिएक्टर बनाना भी आसान नहीं हैं. इससे नियंत्रित रखना बहुत ही ज्यादा मुश्किल होता है.

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