क्या है बांग्लादेश में उस शक्तिपीठ का इतिहास, जहां पीएम मोदी ने की खास पूजा

बांग्लादेश स्थित जेशोरेश्वरी मंदिर की तस्वीर विकिकॉमन्स से साभार.

बांग्लादेश स्थित जेशोरेश्वरी मंदिर की तस्वीर विकिकॉमन्स से साभार.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (WB Assembly Elections 2021) के समय में बांग्लादेश के दौरे (Modi's Bangladesh Tour) पर पहुंचे पीएम मोदी ने वहां मतुआ समुदाय से मुलाकात के साथ, मंदिर में विशेष प्रार्थना की. सर्वधर्म समभाव की मिसाल रहे इस मंदिर को कितना जानते हैं आप?

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 28, 2021, 7:47 AM IST
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हिंदू धर्म (Hinduism) की मान्यता अनुसार 51 शक्तिपीठों (Shaktipeeth) में से एक बांग्लादेश स्थित जशोरेश्वरी मंदिर है, जिसे यशोरेश्वरी के नाम से भी जाना जाता रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) की यात्रा और पूजा पाठ के बाद से यह मंदिर चर्चा में आ गया है. मोदी के दौरे के मद्देनज़र बांग्लादेश में इस मंदिर का रखरखाव भी किया गया और पीएम मोदी ने यहां श्रद्धालुओं के लिए एक सामुदायिक भवन (Community Hall) के निर्माण की बात भी कही. कम से कम 400 साल पुराने इस मंदिर के बारे में कई फैक्ट्स ऐसे हैं, जिन्हें कम ही लोग जानते हैं.

मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि जब सती का शव लेकर शिव आर्यावर्त में शोकाकुल भटक रहे थे, तब सती के अंग जहां जहां गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई. बांग्लादेश के सतखीरा ज़िले में स्थित इस मंदिर को शक्तिपीठ का दर्जा हासिल है. इसके इतिहास और परंपराओं के बारे में डॉ. अलका पांडे की किताब में विस्तार से उल्लेख मिलता है.

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कब और कैसे बनी शक्तिपीठ?
मान्यता की बात की जाए तो माना जाता है कि अनाड़ी नाम के किसी ब्राह्मण ने जशोरेश्वरी मंदिर के 100 दरवाज़ों वाले डिज़ाइन को तैयार करके निर्माण भी शुरू करवाया था, लेकिन यह कब हुआ, इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता. यह मिलता है कि बाद में इसे लक्ष्मण सेन और राजा प्रताप आदित्य ने इसका उद्धार करवाया.

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सोशल मीडिया पर कहा जा रहा है कि पीएम मोदी के दौरे के मद्देनज़र जशोरेश्वरी मंदिर का कायाकल्प करवाया गया.


यह भी कहा जाता है कि सती की हथेली इस भूमि पर गिरी हुई थी. 16वीं सदी के राजा प्रताप आदित्य को झाड़ियों से जब एक तेज़ प्रकाश दिखाई दिया, तब उन्होंने इस हथेली के आकार की एक शिला खोजी, जिसमें से तेज़ रोशनी निकल रही थी. तबसे प्रताप काली के भक्त हुए और उन्होंने इस क्षेत्र यानी जशोर में काली मंदिर बनवाया और इसे जशोरेश्वरी मंदिर कहा गया. यहां सती का नाम जशोरेश्वरी और कालभैरव का नाम चंड प्रचलित हुआ.



क्या कहता है इतिहास?

भारत के बेनापोल और बांग्लादेश के खुलना के बीच बॉर्डर के करीब बसा हुआ जशोर अपनी बांग्ला सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता रहा है. यहां पुरातात्विक महत्व की कई संरचनाएं हैं. चंचरा राजभरी, काली मंदिर और गाज़ी कालू की दरगाह ऐसे ही कुछ स्थान हैं, जहां पर्यटक बड़ी संख्या में पहुंचते रहे हैं. इनके अलावा, राजा मुकुट राय का महल और नवाब मीर जुलमा की कोठी भी आकर्षण का केंद्र रही है.

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विविधता वाली संस्कृति दर्शाने वाले जशोर में देवी शक्ति पीठ श्यामनगर के ईश्वरीपुर गांव में स्थित है, जहां माना जाता है कि देवी की कमल के फूल जैसी बाईं हथेली गिरी थी. डॉ. पांडे की किताब के मुताबिक प्रताप आदित्य के मंदिर बनवाए जाने के बाद लक्ष्मण सेन ने इसमें कुछ और बदलाव भी किए थे. 1971 में जब युद्ध हुआ और उसके बाद बांग्लादेश स्वतंत्र देश बना, उस दौरान इस मंदिर में कई तरह की तोड़ फोड़ हुई, जिससे इसके कई पुराने ढांचे ध्वस्त हुए.

इस मंदिर के परिसर में नाथ मंदिर स्थित था, जो बुरी तरह ध्वस्त किया गया. अब उसके खंभे ही बाकी दिखते हैं. यह नाथ मंदिर वह जगह थी, जहां से खड़े होकर देवी के दर्शन किए जाते थे. इसी तरह और भी संरचनाओं को उस समय नुकसान पहुंचा, जिसकी देख रेख समय समय पर की जाती रही, लेकिन पूरी तरह से संरक्षण नहीं किया गया.

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क्या हैं धार्मिक विश्वास व परंपराएं?

माना जाता है कि देवी की हथेली की अभय मुद्रा पाई गई थी, जिसका आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व है. यहां लोग डर, कष्ट और रोगों आदि से छुटकारा पाने के लिए आते रहे हैं. हर शनिवार और मंगलवार को मंदिर में पारंपरिक तौर पर पूजा की जाती रही है, जिसमें आसपास के इलाकों के लोग शामिल हुआ करते हैं.

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पीएम मोदी ने बांग्लोदश शक्तिपीठ में पूजा की.


यहां हर धर्म संप्रदाय के लोग आ सकते हैं और आते रहे हैं. सिर्फ बांग्लादेश ही नहीं बल्कि अन्य जगहों से भी श्रद्धालु​ यहां पहुंचते रहे हैं. यहां काली पूजा अनूठे तौर पर होती है और इसे आत्मा से परमात्मा तक पहुंचने की आध्यात्मिक यात्रा से जोड़ा जाता है. नवरात्रि के मौकों पर यहां विशेष पूजन की परंपरा रही है और प्रसिद्ध मेले का आयोजन होता रहा है.

इस मेले में दूरदराज से कई लोग शामिल होते रहे हैं और नवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष चढ़ावा और प्रार्थनाओं आदि का महत्व बताया गया है. खास तौर से इसी मेले के दौरान आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए पीएम मोदी ने अपने बांग्लादेश दौरे के दौरान यहां मल्टीपरपज़ कम्युनिटी हॉल के निर्माण को लेकर वादा किया.
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