रूस ने ऐसे हासिल की थी हाइड्रोजन बम बनाने की टेक्नोलॉजी

रूस (Russia) ने 1953 में पहली बार हाइड्रोजन बम (Hydrogen Bomb) का सफल परीक्षण किया था. ये परमाणु बम (Nuclear bomb) से आगे की टेक्नोलॉजी थी. हाइड्रोजन बम पूरी मानव जाति का विनाश करने में सक्षम है...

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Updated: August 29, 2019, 10:31 AM IST
रूस ने ऐसे हासिल की थी हाइड्रोजन बम बनाने की टेक्नोलॉजी
परमाणु बम से हजार गुना ताकतवर होता है हाइड्रोजन बम
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Updated: August 29, 2019, 10:31 AM IST
रूस (Russia) ने 1953 में आज ही के दिन पहली बार हाइड्रोजन बम (Hydrogen Bomb) का परीक्षण किया था. शीतयुद्ध के उस काल में परमाणु बम (Nuclear bomb) से आगे की टेक्नोलॉजी हासिल करते हुए रूस ने हाइड्रोजन बम का विस्फोट कर पूरी दुनिया को सन्न कर दिया था.

हाइड्रोजन बम की ताकत हासिल करने की ऐसी होड़ मची थी कि इसमें रूस, अमेरिका और ब्रिटेन एकदूसरे को पछाड़ने में लगे थे. ये मानव जाति के सबसे विनाशकारी हथियार को हासिल करने की होड़ थी. रूस ने इस होड़ में खुद को आगे कर दुनिया के सामने एक नए तरह का संकट खड़ा कर दिया था.

कितना ताकतवर होता है हाइड्रोजन बम
हाइड्रोजन बम परमाणु बम से एक हजार गुना ज्यादा ताकतवर होता है. इसे इस तरह से समझ सकते हैं कि 1945 में जब अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा शहर पर परमाणु बम बरसाए थे तो करीब 1 लाख 40 हजार लोग मारे गए थे. करीब 70 शहर तबाह हो गए थे. आप सोच सकते हैं कि इससे एक हजार गुना ज्यादा ताकतवर बम का इस्तेमाल किया जाए तो विनाश का कैसा मंजर बन सकता है.

क्या होता है हाइड्रोजन बम
हाइड्रोजन बम को थर्मोन्यूक्लियर बम या एच-बम भी कहा जाता है. हाइड्रोजन बम में Deuterium और Tritium का इस्तेमाल किया जाता है. हाइड्रोजन बम आइसोटोप्स के आपस में मिलने के सिद्धांत पर काम करता है. ये वही सिद्धांत है जो सूर्य के गर्भ में निरंतर चलता रहता है. हाइड्रोजन बम के विस्फोट से असीमित ऊर्जा निकलती है. विस्फोट से निकली गर्मी सूरज के तापमान के बराबर होती है.

किन देशों के पास है हाइड्रोजन बम
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हाइड्रोजन बम फिलहाल आधिकारिक तौर पर अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, रूस, भारत, पाकिस्तान और इजरायल के पास है. उत्तरी कोरिया के भी हाइड्रोजन बम के सफल परीक्षण की बात सामने आती है, लेकिन उसकी पुष्टि नहीं हो पाई है. अमेरिका ने पहली बार 1952 में हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया था. मार्शल द्वीप के बिकिनी अटॉल में अमेरिका ने हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया था. इस परीक्षण की वजह से यहां विशाल गड्ढे का निर्माण हुआ. इसके साथ ही यहां की कोरल रीफ बुरी तरह से प्रभावित हुईं.

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अमेरिका का हाइड्रोजन बम


रूस ने कैसे हासिल की थी हाइड्रोजन बम बनाने की क्षमता
1953 में रूस ने खुलेआम स्वीकार कर लिया कि उसने हाइड्रोजन बम हासिल कर लिया है और उसका सफल परीक्षण भी किया है. इसके पीछे रूस के फीजिसिस्ट एंद्रेई सखारोव का बड़ा हाथ था. हाइड्रोजन बम को डिजाइन करने वाले एंद्रेई सखारोव ही थे.

रूस ने जिस हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया था, उसमें 400 किलोटन विस्फोट का इस्तेमाल हुआ था. ये नागासाकी और हिरोशिमा में गिराए गए परमाणु बम से 26 गुना ज्यादा ताकतवर था.

जब रूस अपनी परमाणु क्षमता बढ़ाने में लगा था

अमेरिकी के जापान पर किए परमाणु बम हमले के बाद रूस ने अपनी परमाणु क्षमता बढ़ाने की दिशा में कदम उठाने शुरू किए. 29 अगस्त 1949 को रूस ने पहली बार परमाणु बम का परीक्षण किया था. रूस ने इस परीक्षण को एक कोड नेम दिया था. वो कोड नेम था- आरडीएस 1.

रूस के कजाकिस्तान प्रांत में परमाणु बम का परीक्षण हुआ. 22 किलोटन वजनी हाइड्रोजन बम के विस्फोट से धरती हिल उठी थी.

एक युवा ने संभाली थी रूस की परमाणु क्षमता हासिल करने की कमान
1945 में हिरोशिमा और नागासाकी में अमेरिकी परमाणु बम हमले के बाद रूस में बेचैनी थी. वो किसी भी तरह से परमाणु क्षमता में अमेरिका से आगे निकलना चाहता था. रूस की सरकार ने इसके लिए 5 साल का लक्ष्य रखा था. रूस के न्यूक्लियर प्रोजेक्ट में एक युवा वैज्ञानिक इगोर कुर्चातोव को लगाया गया. इगोर ने ही इस प्रोजेक्ट को लीड किया.

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समूची मानव जाति का विनाश कर सकता है हाइड्रोजन बम


रूस का आरडीएस 1 अमेरिकी बम फैट मैन की तरह का था. फैट मैन को अमेरिका ने नागासाकी पर गिराया था. जिसके बाद वहां भयावह तबाही हुई थी. रूस ने अपने जासूसों के जरिए अमेरिकी न्यूक्लियर प्रोजेक्ट की जानकारी हासिल कर ली थी. अमेरिका का मैनहट्टन प्रोजेक्ट और 16 जुलाई 1945 के ट्रीनीटी टेस्ट की डिटेल्स रूस के पास थी. रूस ने अमेरिकी टेक्नोलॉजी को हैक कर लिया था.

हालांकि अमेरिका को भी रूस के इस खुफिया प्रोजेक्ट की जानकारी हासिल हो चुकी थी. रूस ने अमेरिकी परमाणु क्षमता को दबाए रखने की मोनोपॉली तोड़ दी थी. 23 सितंबर 1949 को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन ने इस बारे में घोषणा की थी. इसके एक दिन बाद रूस की तरफ से भी इसी तरह का बयान आया था.

कोल्ड वॉर के दौरान परमाणु हथियारों को बढ़ाने की होड़ लग गई थी. रूस और अमेरिका दोनों ही अपनी-अपनी परमाणु क्षमता बढ़ाने में लगे थे. 1951 में अमेरिका ने पहला थर्मोन्यूक्लियर डिवाइस का टेस्ट किया. इसके बाद रूस ने लगातार कई न्यूक्लियर टेस्ट किए. कोल्ड वॉर के खत्म होते-होते अमेरिका 1,031 न्यूक्लियर टेस्ट कर चुका था और रूस 715.

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First published: August 29, 2019, 9:47 AM IST
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