Explained: क्या है Islam Map जिसपर ऑस्ट्रियाई मुस्लिमों को गुस्सा आ गया?

नेशनल मैप ऑफ इस्लाम नाम की वेबसाइट के आने के साथ ही ऑस्ट्रिया में बवाल मच गया- सांकेतिक फोटो (pixabay)

नेशनल मैप ऑफ इस्लाम नाम की वेबसाइट के आने के साथ ही ऑस्ट्रिया में बवाल मच गया- सांकेतिक फोटो (pixabay)

साल 2020 के आखिर में ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में आतंकी हमला (2020 Vienna attacks) हुआ था. इसके बाद से वहां बहुसंख्यकों और सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी वाले मुस्लिम समुदाय में अलगाव दिखने लगा. इस्लाम मैप (Islam map) को इसी का हिस्सा कहा जा रहा है.

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यूरोपियन देशों का मुस्लिमों के साथ जटिल रिश्ता दिखता है. युद्ध-प्रभावित मिडिल ईस्ट से आए काफी सारे मुस्लिम यहां के कई देशों में शरणार्थी हैं, और बहुतों को नागरिकता भी मिल चुकी. इसके बाद भी उन देशों में कई बार समुदाय विशेष के लिए अलगाव दिख जाता है. ऐसा ही एक कदम ऑस्ट्रिया में दिखा. वहां इंटीग्रेशन मंत्री सुसैन राब ने एक वेबसाइट लॉन्च की, जिसका नाम है नेशनल मैप ऑफ इस्लाम. लॉन्चिंग के बाद से स्थानीय मुस्लिम आबादी काफी गुस्से में है.

मस्जिदों के नाम-पते हैं 

गुरुवार को जारी वेबसाइट में 620 से भी ज्यादा एड्रेस और नाम दिए हुए हैं, जहां ऑस्ट्रिया में मस्जिद, मुस्लिम एसोसिएशन हैं. इसके अलावा वहां के अधिकारियों के नाम और पते भी इस वेबसाइट में हैं. साथ ही विदेशों में उनके संभावित कनेक्शन भी हैं.

मुस्लिमों पर हमले का डर
नेशनल मैप ऑफ इस्लाम नाम की इस वेबसाइट के आने के साथ ही ऑस्ट्रिया में बवाल मच गया. वहां के स्थानीय मुस्लिम समूहों को डर है कि इस तरह से मस्जिदों और मुस्लिम संस्थानों के नाम, पते देने से इस्लामोफोबिक लोग मुस्लिम आबादी को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इस्लामिक रिलीजियस कम्युनिटी इन ऑस्ट्रिया (IGGOE) नाम के समूह ने सीधे-सीधे कहा कि ये देश में मुस्लिमों की छवि को नुकसान पहुंचाने जैसा है. इसे रेसिज्म करार देते हुए समूह ने इसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की.

Islam map Austrian Muslims
ऑस्ट्रिया में मुस्लिम आबादी 8% के साथ सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है- सांकेतिक फोटो (pxhere)

कितने मुस्लिम हैं ऑस्ट्रिया में



दरअसल सभी मस्जिदों के नाम आ जाने से समुदाय की सुरक्षा को खतरा होने की बात की जा रही है. ऑस्ट्रिया में मुस्लिम आबादी 8% के साथ सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है. वहां पर 206 मस्जिदें रजिस्टर्ड हैं, जिनके अलावा और भी कई मस्जिदें हैं, जो बगैर रजिस्ट्रेशन चल रही हैं. ये तो हुआ वहां के मुस्लिम धार्मिक स्थलों का हाल. लेकिन जानने की बात ये है कि दशकों से मिलजुलकर रह रहे ऑस्ट्रिया में आखिर एकाएक ये अलगाव क्यों दिखा.

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अलगाव आने का संभावित कारण 

इसके पीछे साल 2020 के अंत में हुआ वियना आतंकी हमला हो सकता है. ये हमला फ्रांस पर आतंकी हमले के बाद हुई, जिसमें सात से ज्यादा मारे गए और 15 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे. हमले को कई संदिग्ध हथियारबंद हमलावरों ने अंजाम दिया, जिनकी पहचान इस्लामिक कट्टरवाद से जुड़ी हुई पता चली. हमले के दौरान कार्रवाई में मारा गया एक संदिग्ध इस्लामिक स्टेट से जुड़ा हुआ बताया गया.

Islam map Austrian Muslims
ऑस्ट्रिया में साल 2020 के अंत में वियना आतंकी हमला हुआ था (Photo- news18 English via Reuters)

वेबसाइट के पीछे बुरे इरादे से किया इनकार 

इसके बाद ही धार्मिक सद्भाव वाले इस देश में भी अलगाव दिखने लगा. हालांकि आधिकारिक तौर पर ये पहली बार दिख रहा है और खुद सरकार इससे कन्नी काट रही है. मैप जारी करने वाली मंत्री ने एक बयान में कहा कि उनका इरादा मुस्लिम आबादी को संदेह के दायरे में लाना नहीं था. अलजजीरा की रिपोर्ट में इसका हवाला दिया गया है.

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फ्रांस पर लगातार आतंकी हमले 

वैसे यूरोपियन देशों में इस्लामिक कट्टरता के खिलाफ टकराव कोई नई बात नहीं. फ्रांस इसमें सबसे ऊपर है, जहां लगातार आतंकी हमलों के बाद कथित तौर पर अलगाववाद को खत्म करने की बात हो रही है. इसकी शुरुआत 16 अक्टूबर की उस घटना से हुई, जब एक इस्लामिक कट्टरपंथी ने एक फ्रांसीसी शिक्षक की गला काटकर हत्या कर दी. दोषी की बेटी उसी स्कूल में पढ़ती थी और दोषी का आरोप है कि टीचर ने बच्चों को पैगंबर मुहम्मद का कार्टून दिखाने का अपराध किया.

Islam map Austrian Muslims
फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों कथित तौर पर अलगाववाद को खत्म करने की बात कर रहे हैं

मैक्रों ने दिया बयान 

घटना के तुरंत बाद फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने फ्रेंच जनता को संबोधित करते हुए कहा कि हम जारी रहेंगे. हम उस आजादी को सुरक्षित रखेंगे, जो हमें मिली. और खुद को एक धर्मनिरपेक्ष देश बनाए रखेंगे. साथ ही साथ मैक्रों ने फ्री स्पीच के नाम पर फ्रांस की तस्वीरें, कार्टून बनाने की संस्कृति जारी रखने की भी बात की.

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ये नियम हैं बिल में 

इसके बाद से सेपरेटिज्म बिल की चर्चा जोर पकड़ने लगी. राष्ट्रपति मैक्रों समेत मंत्रियों के सुझाए इस बिल में कई ऐसे नियम हैं, जिससे मुस्लिम जगत भड़क उठा. जैसे टीआरटी वर्ल्ड के मुताबिक इसके तहत फ्रांस में फ्रेंच इमाम ही होंगे और विदेश से सीखकर आने वाले या विदेशी लोगों को इमाम नहीं बनाया जा सकेगा, चाहे वो कितना ही जानकार क्यों न हो. साथ ही इसके तहत उन स्कूल और शिक्षण संस्थानों को बंद करवाया जा सकेगा, जो शिक्षा के बहाने ब्रेनवॉश करते हैं. साथ ही साथ नए कानून के तहत होम-स्कूलिंग पर कड़े प्रतिबंध लगेंगे ताकि सबको समान शिक्षा मिल सके.

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फ्रांस ने विदेशी इमामों के आने पर रोक लगा दी- सांकेतिक फोटो (pixabay)

पूरे यूरोप में फ्रांस में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी

साल की शुरुआत में फ्रांस ने विदेशी इमामों के आने पर रोक लगा दी. बता दें कि फ्रांस में हर साल करीब 300 इमाम दुनियाभर के देशों से आते हैं. इसकी वजह है कि फ्रांस में बड़ी मुस्लिम आबादी होना. यूरोप में सबसे ज़्यादा मुसलमान फ्रांस में रहते हैं. साल 2017 के प्यू रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार फ्रेंच मुस्लिम आबादी देश की कुल आबादी का लगभग 8.8% हिस्सा है, जो सबसे बड़ी माइनोरिटी है.

इस्लामिक कट्टरता के खिलाफ स्कैंडिनेवियाई देश भी दिखने लगे हैं. डेनमार्क की ही बात लें तो Religion.dk ने साल 2018 में कहा था कि देश में 3 लाख 6 हजार मुस्लिम हैं. इस तरह से वे वहां की सबसे बड़ी माइनोरिटी आबादी है. इसमें से अधिकतर लोग मिडिल ईस्ट के आतंक से बचते हुए आए हैं. लेकिन अब वहां तेजी से मस्जिदें बन रही हैं और स्थानीय लोग भी नए धर्म को स्वीकार कर रहे हैं. यहां तक कि धर्मनिरपेक्ष डेनमार्क में मुस्लिमों के लिए अलग कानून की मांग हो रही है. अब ये देश परेशान हैं कि कैसे इस्लामोफोबिया का शिकार हुए बगैर वो धार्मिक हिंसा को रोकें.

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