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क्या है कम्बाला रेस, जहां बार-बार टूट रहे हैं यूसेन बोल्ट के रिकॉर्ड

News18Hindi
Updated: February 19, 2020, 12:20 PM IST
क्या है कम्बाला रेस, जहां बार-बार टूट रहे हैं यूसेन बोल्ट के रिकॉर्ड
कंबाला रेस के दौरान श्रीनिवास गौड़ा (फोटो क्रेडिट-twitter )

कम्बाला दौड़ (Kambala race) कर्नाटक (Karnataka) और केरल का एक प्राचीन और पारंपरिक खेल है. इसमें भैंसों (Buffalo) के साथ कीचड़ वाले ट्रैक पर दौड़ लगानी होती है.

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  • Last Updated: February 19, 2020, 12:20 PM IST
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कम्बाला रेस (Kambala Race) की इन दिनों खूब चर्चा हो रही है. सोशल मीडिया (Social Media) पर इसकी खबरें छाई हैं. पहले खबर आई कि कर्नाटक (Karnataka) की कम्बाला रेस में एक रेसर श्रीनिवास गौड़ा (Srinivas Gowda) ने दौड़ लगाकर वर्ल्ड चैंपियन यूसेन बोल्ट (Usain Bolt) का रिकॉर्ड तोड़ दिया.

श्रीनिवास गौड़ा ने कम्बाला रेस में 100 मीटर की दूरी सिर्फ 9.55 सेकंड में तय की थी, जबकि यूसेन बोल्ट का रिकॉर्ड 9.58 सेकंड का है. सोशल मीडिया पर श्रीनिवास गौड़ा छा गए. ऐसे टैलेंट को ट्रेनिंग देकर ओलंपिक में उतारने की बातें की जाने लगी. खेल मंत्री किरन रिजिजू ने स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के कोच की देखरेख में उनका ट्रायल कराने की बात भी कही. हालांकि बाद में श्रीनिवास गौड़ा ने ट्रायल देने से मना कर दिया.

अब खबर आई है कि कम्बाला दौड़ में श्रीनिवास गौड़ा का रिकॉर्ड भी टूट गया है. निशांत शेट्टी नाम के एक रेसर ने सिर्फ 9.51 सेकंड में 100 मीटर की दौड़ लगाई है. निशांत शेट्टी ने कर्नाटक के वेनुर में हुई कम्बाला दौड़ में ये रिकॉर्ड बनाया.

क्या होती है कम्बाला दौड़



कम्बाला दौड़ कर्नाटक और केरल का एक प्राचीन और पारंपरिक खेल है. इसमें भैंसों के साथ कीचड़ वाले ट्रैक पर दौड़ लगानी होती है. कर्नाटक के तटीय इलाकों में ये खेल सदियों से खेला जाता रहा है. कम्बाला दक्षिण कन्नड़ा, उत्तर कन्नड़ा और केरल के कसारगोड में काफी पॉपुलर है. इसमें भैंसों की जोड़ी के साथ एक रेसर दौड़ लगाता है. कर्नाटक के तटीय इलाकों और केरल के कुछ हिस्सों में हर साल ये खेल आयोजित होता है.

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निशांत शेट्टी से पहले श्रीनिवास गौड़ा कंबाला रेस में अपने प्रदर्शन से सुर्खियों में आ गए थे.


कौन करवाता है कम्बाला रेस
कम्बाला रेस को हर साल कुछ सामाजिक और धार्मिक संगठन आयोजित करवाते हैं. इस खेल में इलाके के बड़े-बड़े जमींदार हिस्सा लेते हैं. कम्बाला रेस में भैंसें उन जमींदारों की होती हैं, जबकि भैंसों के साथ दौड़ने वाले जमींदार के यहां काम करने वाले मजदूर होते हैं.

कर्नाटक में पारंपरिक तौर पर तुलुवा समुदाय के लोग इस खेल को आयोजित करवाते हैं. दक्षिणी भारत का ये प्राचीन समुदाय है. तुलुवा समुदाय के लोग अपनी तुलु भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिए जाने की मांग करते रहे हैं. इन लोगों की मांग अलग राज्य की भी रही है, जिसे ये तुलु नाडु का नाम देते हैं. इसको लेकर आंदोलन भी हुए हैं.

किस सीजन में होता है ये खेल
कम्बाला का सीजन नवंबर महीने में शुरू होता है और ये मार्च तक चलता है. दौड़ आयोजित करवाने के लिए स्पेशल कम्बाला एसोसिएशन बनाया जाता है. इस वक्त करीब 18 ऐसे एसोसिएशन हैं. कर्नाटक में इस तरह की 45 रेस हर साल आयोजित होती हैं. पहले इस खेल में विजेता को नारियल दिया जाता था. अब विजेताओं को सोने-चांदी के सिक्के दिए जाते हैं. कुछ आयोजनकर्ता विजेता को 8 ग्राम का सोने का सिक्का देते हैं. कुछ प्रतियोगिताओं में कैश प्राइज भी दिए जाते हैं.

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कंबाला रेस में असाधारण प्रदर्शन कर चर्चा में आए श्रीनिवास गौड़ा एक कंस्ट्रक्‍शन वर्कर हैं. (फाइल फोटो)


सुप्रीम कोर्ट लगा चुका है इस खेल पर बैन
कीचड़ से भरे खेतों में इसका रेस ट्रैक बनाया जाता है. खेल में हिस्सा लेने वालों भैंसों को खूब अच्छी तरह से सजाया जाता है. भैंसों के साथ दौड़ने वाला जॉकी (धावक) अपने साथ में छड़ी या डंडा रखता है. भैंसों को तेज भगाने के लिए बीच-बीच में वो उन्हें डंडे मारता रहता है. जल्लीकट्टू की तरह कम्बाला रेस को भी सुप्रीम कोर्ट ने बैन किया था. लेकिन कर्नाटक में एक बिल लाकर सुप्रीम कोर्ट के बैन को निष्प्रभावी कर दिया गया. इसको लेकर प्रिवेंशन ऑफ क्रूएलिटी टू एनिमल्स (कर्नाटक अमेंडमेंट) ऑर्डिनेंस 2017 लाया गया. कर्नाटक में इस आर्डिनेंस के बाद ये खेल फिर से कानून वैध हो गया.

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First published: February 19, 2020, 11:41 AM IST
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