Explained: क्या है खालिस्तान, जिसका जिक्र किसान आंदोलन में हो रहा है?

किसानों के आंदोलन को कथित तौर पर खालिस्तान समर्थकों ने हाईजैक कर लिया- सांकेतिक फोटो (news18 English file photo)

किसान आंदोलन (Kisan Andolan) से जुड़ी तमाम खबरों के बीच ये जानना जरूरी है कि आखिर खालिस्तान (Khalistan) की मांग क्या है और क्यों लगातार सरकारें इसके विरोध में रहीं.

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    दिल्ली बॉर्डर पर किसान आंदोलन को दो महीने से भी ज्यादा वक्त हो चुका. पंजाब से हजारों की संख्या में किसान यहां नए कृषि कानून के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं. यहां तक कि आंदोलन ने गणतंत्र दिवस पर हिंसक रूप भी ले लिया था. इस बीच बार-बार खालिस्तान का भी जिक्र आ रहा है. कई नेताओं के मुताबिक किसानों के आंदोलन को कथित तौर पर खालिस्तान समर्थकों ने हाईजैक कर लिया है.

    क्यों कहा जा रहा है ऐसा
    कृषि कानूनों के विरोध में किसान लगातार सिंघु बॉर्डर पर बने हुए हैं. वे आमतौर पर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख रहे हैं. केंद्र सरकार के साथ बातचीत का दौर भी लगातार चल रहा है. हालांकि इस बीच कई अलग चीजें भी दिखीं. जैसे बॉर्डर पर कथित तौर पर खालिस्तानी कट्टरपंथी जनरैल सिंह भिंडरावाले के फोटो लहराते दिखे और खालिस्तान के पक्ष में नारेबाजी की गई. ऐसी रिपोर्ट्स आने पर आंदोलनकारी किसानों ने प्रदर्शन के खालिस्तान से कोई संबंध न होने की बात की.

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    कब शुरू हुआ था खालिस्तान आंदोलन
    साल 1947 में अंग्रेज भारत को दो देशों में बांटने की योजना बना रहे थे, तभी कुछ सिख नेताओं ने अपने लिए अलग देश खालिस्तान की मांग की. उन्हें लगा कि अपने अलग मुल्क की मांग करने के लिए ये सबसे उपयुक्त समय है. आजादी के बाद इसे लेकर हिंसक आंदोलन चला. जिसमें कई लोगों की जान भी गई.

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    साल 1950 में अकाली दल ने पंजाबी सूबा आंदोलन के नाम से आंदोलन चलाया (Photo- moneycontrol via AFP)


    पंजाबी सूबा आंदोलन और अकाली दल का जन्म
    साल 1950 में अकाली दल ने पंजाबी सूबा आंदोलन के नाम से आंदोलन चलाया. भारत सरकार ने साफतौर पर पंजाब को अलग करने से मना कर दिया. ये पहला मौका था जब पंजाब को भाषा के आधार पर अलग दिखाने की कोशिश हुई. अकाली दल का जन्म हुआ. कुछ ही वक्त में इस पार्टी ने बेशुमार लोकप्रियता हासिल कर ली. अलग पंजाब के लिए जबरदस्त प्रदर्शन शुरू हुए.

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    सरकार ने अलग राज्य की बात मानी
    1966 में भारत सरकार ने पंजाब को अलग राज्य बनाने की मांग मान ली लेकिन भाषा के आधार पर हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और केंद्र शाषित प्रदेश चंडीगढ़ की स्थापना हुई.अकाली चाहते थे कि पंजाब की नदियों का पानी किसी भी हाल में हरियाणा और हिमाचल को नहीं दिया जाए. सरकार ने इसे मानने से साफ इनकार कर दिया.

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    कब इसे खालिस्तान नाम दिया गया
    अलग सिख देश की आवाज लगातार उठती रही. सत्तर के दशक में खालिस्तान को लेकर कई चीजें हुईं. 1971 में गजीत सिंह चौहान ने अमेरिका जाकर वहां के अखबार में खालिस्तान राष्ट्र के तौर पर एक पेज का विज्ञापन प्रकाशित कराया और इस आंदोलन को मजबूत करने के लिए चंदा मांगा. बाद में 1980 में उसने खालिस्तान राष्ट्रीय परिषद बनाई और उसका मुखिया बन गया. लंदन में उसने खालिस्तान का देश का डाकटिकट भी जारी किया. इससे पहले 1978 में जगजीत सिंह चौहान ने अकालियों के साथ मिलकर आनंदपुर साहिब के नाम संकल्प पत्र जारी किया, जो अलग खालिस्तान देश को लेकर था.

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    स्वर्ण मंदिर के अंदर 6 जून 1984 को व्यापक अभियान चलाया गया- सांकेतिक फोटो


    जनरैल सिंह भिंडरावाले का आंदोलन का चेहरा बनना
    80 के दशक में खालिस्तान आंदोलन पूरे उभार पर था. उसे विदेशों में रहने वाले सिखों के जरिए वित्तीय और नैतिक समर्थन मिल रहा था. इसी दौरान पंजाब में जनरैल सिंह भिंडरावाले खालिस्तान के सबसे मजबूत नेता के रूप में उभरा. उसने स्वर्ण मंदिर के हरमंदिर साहिब को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया. उसने अपने साथियों के जरिए पूरे पंजाब में इस आंदोलन को खासा उग्र कर दिया. तब ये स्वायत्त खालिस्तान आंदोलन अकालियों के हाथ से निकल गया.

    आतंक का दौर
    जरनैल सिंह भिंडरावाला के बारे में कहा जाता है कि वो सिख धर्म में कट्टरता का समर्थक था. सिखों के शराब पीने, बाल कटाने जैसी चीजों के वो सख्त खिलाफ था. जब भिंडरावाले ने पूरे पंजाब में अपनी पकड़ बनानी शुरू की तो अराजकता का दौर भी शुरू हो गया.

    मंदिर को बनाया ठिकाना
    साल 1980 से 1984 के बीच पंजाब में आतंकी हिंसाओं में जबरदस्त इजाफा हुआ. 1983 में डीआईजी अटवाल की स्वर्णमंदिर परिसर में ही हत्या कर दी गई. इसी साल से भिंडरावाला ने स्वर्ण मंदिर को ठिकाना बना लिया. सैकड़ों हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों से वो हमेशा घिरा रहता था, साथ ही हथियारों का जखीरा भी वहां जुटाया जाने लगा. कह सकते हैं कि मंदिर को किले में तब्दील करने की तैयारी शुरू हो गई थी.

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    दूसरे देशों में बैठकर भी खालिस्तान समर्थक भारत में कट्टरवादी विचारधारा को हवा देते रहते हैं (Photo- news18 English via Reuters)


    ऑपरेशन ब्लू स्टार
    पहले 'ऑपरेशन सनडाउन' बनाया गया, 200 कमांडोज को इसके लिए ट्रेनिंग दी गई. लेकिन बाद में आम नागरिकों को ज्यादा नुकसान की आशंका के चलते इस ऑपरेशन को नकार दिया गया. आखिरकार एक जून 1984 में भारत सरकार ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को अंजाम देकर सैन्य कार्रवाई की और इस आंदोलन को कुचल दिया. उस दौरान स्वर्ण मंदिर में पानी और बिजली की सप्लाई काट दी गई.

    किस तरह हुई कार्रवाई
    स्वर्ण मंदिर के अंदर 6 जून 1984 को व्यापक अभियान चलाया गया, भारी गोलीबारी के बाद जरनैल सिंह भिंडरवाला का शव बरामद कर लिया गया. सात जून 1984 को स्वर्ण मंदिर पर आर्मी का कंट्रोल हो गया. हालांकि इससे सिख समुदाय में इंदिरा सरकार के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा भी बरपा. महज 4 महीने बाद ही 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही 2 सिख सुरक्षाकर्मियों ने कर दी

    ब्लू स्टार के बाद कहां हैं खालिस्तान आंदोलन
    खालिस्तान आंदोलन यहीं खत्म नहीं हुआ, इसके बाद से कई छोटे-बड़े संगठन बने. 23 जून 1985 को एक सिख राष्ट्रवादी ने एयर इंडिया के विमान में विस्फोट किया, 329 लोगों की मौत हुई थी. दोषी ने इसे भिंडरवाला की मौत का बदला बताया था. इसके बाद 10 अगस्त 1986 को पूर्व आर्मी चीफ जनरल एएस वैद्य की दो बाइक सवार बदमाशों ने हत्या कर दी. वैद्य ने ऑपरेशन ब्लूस्टार को लीड किया था. इस वारदात की जिम्मेदारी खालिस्तान कमांडो फोर्स नाम के एक संगठन ने ली. 31 अगस्‍त 1995 को पंजाब सिविल सचिवालय के पास हुए बम विस्फोट में पंजाब के तत्कालीन सीएम बेअंत सिंह की हत्‍या कर दी गई थी. ब्लास्ट में 15 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी. इन सब घटनाओं को खालिस्तान आंदोलन से जोड़कर देखा जाता है. दूसरे देशों में बैठकर भी खालिस्तान समर्थक भारत में कट्टरवादी विचारधारा को हवा देते रहते हैं.

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