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क्या होता है ला नीना इफेक्ट, जिससे भारत में पड़ेगी घनघोर ठंड

क्या होता है ला नीना इफेक्ट, जिससे भारत में पड़ेगी घनघोर ठंड

ला नीना( La Nina) का प्रभाव प्रशांत महासागर में हुए बदलावों से शुरू होकर पूरी दुनिया को प्रभावित करता है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

ला नीना( La Nina) का प्रभाव प्रशांत महासागर में हुए बदलावों से शुरू होकर पूरी दुनिया को प्रभावित करता है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

जलवायु (Climate change) के बड़े लेकिन दिखाई देने वाले दुष्प्रभावों में से ला नीना (la Nina) प्रभाव एक है. प्रशांत महासागर में अल नीना की वजह से बदलाव की शुरुआत होती है और इसका असर दुनिया के कई हिस्सों में देखने को मिलता है जो असामान्य से लेकर चरम मौसम के रूप में दिखाई देता है. हाल ही में भारत से मानूसन (Indian Monsoon) की विदाई की बाद लोगों को बहुत जल्द काफी ज्यादा ठंड झेलनी पड़ सकती है. मौसम विभाग का कहना है कि इस बार पिछले कुछ सालों की तुलना में ठंड का प्रकोप ज्यादा भीषण होने वाला है.

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    आखिरकार भारत (India) से मानसून की विदाई हो ही गई. आमतौर पर 15 अक्टूबर तक पूरे भारत से मानसून लौट जाता है, लेकिन इस बार देर हो गई. इतना ही नहीं अब अनुमान लगाया जा रहा है कि इस साल भारत में ठंड (Cold) भी लोगों में ज्यादा ठिठुरन पैदा करने वाली होगी. भारतीय मौसम विभाग का भी यही कहना है कि इस बार की ठंड पिछले कुछ सालों की तुलना मे ज्यादा तीखी होने वाली है. यह अनुमान सुदूर प्रशांत महासागर में हुए मौसम के बदलावों की वजह से लगाया जा रहा है. जिसका पूरी दुनिया पर असर होगा. ये बदालव ला नीना (Al Nina) प्रभाव की वजह से आ रहे हैं.

    क्या है ला नीना शब्द का मतलब
    ला नीना स्पेनी भाषा का शब्द है जिसका मतबल छोटी बच्ची होता है. यह एक जटिल प्रक्रिया एन नीनो साउदर्न ऑसिलेशन (ENSO) चक्र का हिस्सा होता है ज प्रशांत महासागर में घटित होती है जिसका पूरी दुनिया के मौसमों पर असर होता है. इस प्रक्रिया के दूसरे को अल नीनो कहते हैं (स्पेनिश भाषा में छोटा बच्चा) जिसका ला नीना के मुकाबले बिलकुल विपरीत असर होता है.

    प्रशांत महासागर का भूगोल
    इस पूरे चक्र में प्रशांत महासागर के भूगोल में अहम भूमिका होती है जो अमेरिका के पर्व से लेकर एशिया और ऑस्ट्रेलिया तक फैला है. ईएनएसओ प्रशांत महासागर की सतह पर पानी और हवा में असामान्य बदालव लाता है. इसका असर पूरी दुनिया के वर्षण, तापमान और वायु संचार के स्वरूपों पर पड़ता है. जहां ला नीना ईएनएसओ के ठंडे प्रभाव केरूप में  देखा जाता है, वहीं अल नीनो गर्मी लाने वाले प्रभाव के रूप में देखा जाता है.

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    प्रशांत महासागर (Pacific Ocean)की हवाओं में असामान्य ठंड का असर सब जगह पर होने लगता है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

    प्रशांत महासागर का ठंडा होना
    दोनों ही प्रभाव प्रशांत महासागर की सतह के सामान्य तापमानों में प्रभावी असमान्यता ला देते हैं. ला नीना में प्रशांत महासगर की गर्म पानी की सतह पर हवा पश्चिम की ओर बहती है, जब गर्म पानी में गतिविधि होती है तो ठंडा पानी सतह तक आता है. इससे पूर्वी प्रशांत सामान्य से ज्यादा ठंडा हो जाता है.

    और ये होते हैं प्रभाव
    वहीं ला नीना प्रभाव वाले साल में हवा सर्दीयों में ज्यादा तेज बहती है जिससे भूमध्य रेखा और उसके पास का पानी सामान्य से ठंडा हो जाता है. इसी वजह से महासागर का तापमान पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित कर बदल देता है. भारत में भारी बारिश वाला मानूसन, पेरु और इक्वाडोर में सूखे, ऑस्ट्रेलिया में भारी बाढ़, और हिंद एवं पश्चिम प्रशांत महासागर उच्च तापमान की वजह ला नीना ही है.

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    इस साल क्या हो सकता है असर
    इस बार ला नीना सक्रिय है. द प्रिंट की रिपोर्ट में जवाहर लाल यूनिवर्सिटी के पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर एबी दिमित्री ने बताया कि इसका असर भारत में लागातार कम तापमान के रूप में नहीं होगा, बल्कि बीच बीच में आने वाली शीत लहर के रूप में होगा. ला नीना और अल  नीनो का असर 9 से 12 महीनों के बीच में होता है ये हर दो से सात साल में अनियमित रूप से दोबारा आते हैं. अल नीनो ला नीना से ज्यादा बार आता देखा गया है.

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    इस साल भारत में साइबेरिया से शीत लहर (Cold Wave) आने की संभावना है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

    ये घटनाएं भी ला लीना की वजह से
    भारतीय मौसम विभाग के डायरेक्टर जनरल मृत्युंजय महापात्रा का कहना है कि प्रशांत महासागर में कमजोर ला नीना के हालात की वजह से यह सब देखने को मिलेगा. डाउन टू अर्थ को अमेरिकी वैज्ञानिक और यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के जलवायु वैज्ञानिक रघु मूर्तुगडे ने बताया कि महाबलेश्वर में पाला और तमिलनाडु के पहाड़ी इलाकों में ठंड जैसी घटनाओं का संबंध ला नीना से है.

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    भारत में ला नीना का असर देश के सर्दी के मौसम पर होता है. इस मौसम में हवाएं उत्तर पूर्व  के भूभाग की ओर से बहती है. जिन्हें उच्च वायुमंडल में दक्षिण पश्चिमी जेट का साथ मिलता है. लेकिन अल नीना के दौरान यह जेट दक्षिण की ओर धकेल दी जाती है.  इससे ज्यादा पश्चिमी विक्षोभ होते हैं जिससे उत्तर पश्चिम भारत में बारिश और बर्फबारी होती है. लेकिन ला नीना उत्तर और दक्षिण प में निम्न दबाव का तंत्र बनाता है जिससे साइबरिया की हवा आती है और शीतलहर और दक्षिण की ओर जाती है.

    Tags: Climate Change, India, Monsoon, Research, Science

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