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सजा पाए कैदियों की दास्तान: मौत से भी बदतर होता है फांसी पर लटकने का इंतजार

Vivek Anand | News18Hindi
Updated: December 14, 2019, 3:18 PM IST
सजा पाए कैदियों की दास्तान: मौत से भी बदतर होता है फांसी पर लटकने का इंतजार
एक रिसर्च के जरिए फांसी की सजा पाए कैदियों की मनोदशा जानने की कोशिश की गई

निर्भया गैंगरेप और हत्या (Nirbhaya Gangrape and Murder Case) के दोषियों के संगीन अपराध पर किसी तरह की बहस नहीं हो सकती. लेकिन क्या आपको अंदाजा है कि जिस व्यक्ति को फांसी मिलने वाली होती है, उसकी क्या मनोदशा होती है? फांसी पर लटकने का इंतजार कैसा होता है..

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  • Last Updated: December 14, 2019, 3:18 PM IST
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निर्भया केस (Nirbhaya Case) के 4 दोषी फांसी पर लटकने का इंतजार कर रहे हैं. शायद उन्हें अहसास हो चुका है कि अब उनका फांसी के फंदे से बचना नामुमकिन है. बताया जा रहा है कि मौत को नजदीक देखकर निर्भया केस के चारों दोषी अवसाद में चले गए हैं. उन्होंने खाना-पीना कम कर दिया है. तिहाड़ जेल (Tihar Jail) में बंद अक्षय ठाकुर, मुकेश, पवन गुप्ता और विनय शर्मा सख्त पहरेदारी में हैं, ताकि डिप्रेशन की हालत में वो खुद को नुकसान न पहुंचा लें.

निर्भया गैंगरेप और हत्या के दोषियों के संगीन अपराध पर किसी तरह की बहस नहीं हो सकती. लेकिन क्या आपको अंदाजा है कि जिस व्यक्ति को फांसी मिलने वाली होती है, उसकी क्या मनोदशा होती है? फांसी पर लटकने का इंतजार कैसा होता है? मौत को आहिस्ता-आहिस्ता अपने करीब आता देखकर, आदमी क्या सोचता है? मौत का दिन तय हो जाने के बाद उस व्यक्ति की हालत कैसी हो जाती है?

फांसी की सजा पाए कैदियों पर रिसर्च
इन सारे सवालों को लेकर एक रिसर्च हुई है. रिसर्च के नतीजे रोंगटे खड़े कर देता है. 2016 में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी ने फांसी की सजा पाए कैदियों पर एक रिसर्च की थी. ऐसे कैदियों का इंटरव्यू किया गया था, जो अपनी फांसी की सजा का इंतजार कर रहे थे. भारत में इस तरह का ये पहला रिसर्च था. उस वक्त इसकी रिपोर्ट की काफी चर्चा हुई थी. हालांकि किसी भी जेल प्रशासन या कोर्ट सिस्टम ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दी थी.

मौत से भी बदतर होता है फांसी की सजा का इंतजार
रिसर्च के दौरान ऐसे-ऐसे कैदियों से मुलाकात की गई, जो 6-6 साल से फांसी का इंतजार कर रहे थे. इन कैदियों से मुलाकात के बाद एक सबसे बड़ी बात जो पता चली, वो थी- फांसी की सजा का लंबा इंतजार कैदियों की मनोदशा खराब कर देता है. कैदियों की मानसिक हालत पर इसका बहुत बुरा असर पड़ता है. फांसी की सजा का इंतजार इतना भयावह होता है कि कई कैदियों ने कहा कि इससे अच्छा होता, उन्हें बिना देर किए फांसी पर लटका दिया जाता.

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निर्भया केस के चारों दोषियों को फांसी के फंदे पर लटकाया जाने वाला है
फांसी की सजा के निष्पादन की लंबी और तनावपूर्ण प्रक्रिया ने उन्हें डिप्रेशन से भर दिया था. वो इतने हताश हो चुके थे कि बिना देरी किए खुद के लिए मौत मांग रहे थे.

हालांकि कुछ कैदी ऐसे भी थे, जिन्हें उम्मीद थी कि वो फांसी पर लटकने से बच जाएंगे. वो जेल में उम्मीद की जिंदगी जी रहे थे. उन्हें लगता था कि उनकी सजा आजीवन कारावास में बदल जाएगी. वो जिंदगी के प्रति आशान्वित थे. उन्हें इस बात का संतोष था कि कम से कम जिंदा तो हैं.

फांसी की सजा पाए कैदी ने कर ली थी छिपकली से दोस्ती
रिसर्च में फांसी की सजा पाए एक कैदी ने सबको बहुत हैरान किया. उस कैदी को काल कोठरी में रखा गया था. जब वो इंटरव्यू करने वाले से मिलने बाहर आया तो कुछ मिनटों तक अपनी आंखें मिचमिचाता रहा. वो बाहर की रोशनी बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था. कैदी दिन में सिर्फ 20 मिनट के लिए सूरज की रोशनी देख पाता था. बाकी पूरे दिन वो अंधेरी काल-कोठरी में बिताता. उसकी काल-कोठरी के बाहर खड़ा गार्ड, एकलौता आदमी था, जिसे वो देख और महसूस कर पाता था.

रिसर्च में लिखा गया था कि काल कोठरी के अकेलेपन में उसने एक छिपकली से दोस्ती कर ली थी. कैदी अपने खाने को छिपकली से शेयर करता था. खाना देने के बहाने वो छिपकली को अपने पास बुलाता. कैदी ने बताया कि छिपकली जब शोर करती, तो उसे ऐसा लगता मानों वो खाना देने के लिए उसे थैंक्यू बोल रही हो.

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फांसी की सजा पर एक रिसर्च ने कुछ दिलचस्प जानकारी दी है


कई कैदियों ने बताया कि वो न दिन में सो पाते हैं और न रात में. दिन में मच्छर उन्हें सोने नहीं देते और रात में कोठरी में जलते हुए बल्ब की रोशनी में वो सो नहीं पाते.

कैदियों को नहीं होती अपने केस की जानकारी
रिसर्च में पता चला कि फांसी की सजा पाए कैदी को कोर्ट में चल रहे अपने केस के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती. स्टडी से खुलासा हुआ कि ज्यादातर मामलों में वकील अपने मुवक्किल को बचाने के लिए ज्यादा मेहतन करना नहीं चाहते, क्योंकि उनकी फीस ज्यादा नहीं होती. ज्यादातर कैदियों के परिवार वकीलों की फीस चुकाने में असमर्थ थे.

रिसर्च में करीब 258 कैदियों का इंटरव्यू किया गया था. इसमें से करीब 77 फीसदी कैदियों ने कहा कि कोर्ट के बाहर वकीलों से उनकी कभी मुलाकात नहीं हुई. ज्यादातर कैदियों की शिकायत थी कि कोर्ट में भी वकील उनसे केस के बारे में ज्यादा डिस्कस नहीं करते. उनकी दिलचस्पी फीस में ज्यादा होती है. कुछ कैदियों का कहना था कि वकील उनके परिवार से पैसों की उगाही में लगे रहते हैं. वकील धमकाते हैं कि अगर फीस नहीं दिए तो वो कोर्ट सुनवाई में हाजिर नहीं होंगे.

लगी रहती है आखिरी वक्त की आहट
फांसी की सजा पाए कैदी कई बार सबकुछ किस्मत के भरोसे छोड़ देते हैं. वो पूरी प्रक्रिया से हताश हो चुके होते हैं. उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि वो जिंदा रहेंगे या नहीं. कई कैदियों ने बताया कि वो मौत का इंतजार करते हुए वक्त बिताते हैं. जब भी बैरक में लगा लोहे का दरवाजा खुलता है, लगता है उनका आखिरी वक्त आ गया.

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फांसी की सजा पाए कैदियों ने कहा कि मौत से भी ज्यादा बदतर होता है फांसी पर लटकने का इंतजार


फांसी की सजा पाए एक कैदी की अपील साढ़े छह साल बाद ठुकरा दी गई थी. कैदी को इस बारे में कुछ जानकारी नहीं थी. एक बार जेल में जब वो टीवी देख रहा था तो एक न्यूज चैनल के समाचार के जरिए उसे पता चला कि उसे फांसी पर लटकाने की तैयारी शुरू हो चुकी है. अचानक मिले इस सदमे से वो इतना उत्तेजित हो गया कि उसी वक्त उसने अपनी जान लेने की कोशिश की. कैदी ने फर्श पर लगे टाइल्स के एक टुकड़े से अपना सिर फोड़ लिया. वो फांसी से पहले अपनी जान दे देना चाहता था.

एक कैदी ने अपनी पांच बेटियों की हत्या कर दी थी. उसे फांसी की सजा मिली थी. एक दिन उसे बताया गया कि ये जो वो मसूर की दाल, चपाती और सब्जी खा रहा है, ये उसका आखिरी खाना है. उसने बताया कि मौत उसके सामने थी. वो डर रहा था. लेकिन जिस दिन उसे फांसी देनी थी, उसी रोज सुप्रीम कोर्ट ने उसकी फांसी पर रोक लगा दी. उसकी दया याचिका खारिज होने की आधिकारिक जानकारी उसे नहीं दी गई थी. इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने उसकी फांसी टाल दी थी. मौत को करीब से देखकर वो लौट आया था.

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First published: December 14, 2019, 1:11 PM IST
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