जानिए क्या है NSA और क्यों बार-बार विवादों में आ रहा है?

कथित भड़काऊ भाषण के मामले में रासुका के तहत गिरफ्तार हुए डॉक्टर कफील खान हाल में रिहा हुए- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

कथित भड़काऊ भाषण के मामले में रासुका के तहत गिरफ्तार हुए डॉक्टर कफील खान हाल में रिहा हुए- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

अस्सी के दशक में कांग्रेस सरकार के वक्त NSA (National Security Act) लागू हुआ. इसके तहत कोई FIR दर्ज नहीं की जाती है और आरोपी/दोषी को सीधे गिरफ्तार कर लिया जाता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 8, 2020, 6:56 AM IST
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नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ कथित भड़काऊ भाषण के मामले में रासुका के तहत गिरफ्तार हुए डॉक्टर कफील खान हाल में रिहा हुए हैं. उनके मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि NSA (National Security Act) या रासुका के तहत डॉक्टर कफील को हिरासत में लेना और हिरासत की अवधि को बढ़ाना गैरकानूनी है. इसके बाद डॉ कफील को रिहाई मिली. इसके साथ ही ये चर्चा दोबारा गरमा गई है कि क्या रासुका का दुरुपयोग किया जा रहा है. जानिए, क्या है रासुका जो बार-बार विवादों में आ जाता है.

जानिए, क्या है डॉ कफील का मामला
सबसे पहले तो ताजा मामला समझते हैं. डॉ कफील संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) के खिलाफ पिछले साल अलीगढ़ में भड़काऊ भाषण देने के आरोप में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत करीब सात महीने से मथुरा जेल में बंद थे. इलाहाबाद HC ने उनकी रिहाई के आदेश दिए, जिसके बाद इसी 2 सितंबर को वे जेल से छूटे.

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इससे पहले भी एक बार डॉ कफील भारी चर्चा में थे. ये साल 2017 की बात है, जब बीआरडी मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर में 60 से ज्यादा बच्चों की मौत एक सप्ताह के भीतर हो गई थी. इंसेफेलाइटिस से प्रभावित बच्चों की देखरेख में लापरवाही. समय पर ऑक्सीजन की आपूर्ति न करवा पाने और अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस चलाने के कारण भी कफील को गिरफ्तार किया गया था. बाद में उन्हें आरोपों से बरी करते हुए रिहा कर दिया गया.



dr kafeel khan released
डॉ कफील खान के मामले में रासुका की चर्चा जोरों पर है


कब लग सकता है रासुका
अब इसी मामले में रासुका की चर्चा जोरों पर है. माना जा रहा कि इस कानून का सत्ता के लोग अपने फायदे के लिए आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं. रासुका असल में देश की सुरक्षा के लिए सरकार को अधिक शक्ति देने से संबंधित एक कानून है. यह कानून केंद्र और राज्य सरकार को किसी भी संदिग्ध नागरिक को हिरासत में लेने की शक्ति देता है. इसके अलावा अगर कोई शख्स आवश्यक आपूर्ति और सेवाओं के रखरखाव तथा सार्वजनिक व्यवस्था को किसी भी तरह से बाधित करता है तो उसपर भी रासुका के तहत कार्रवाई हो सकती है. वैसे तो इसके लिए 1 साल की सजा का प्रावधान है लेकिन अगर सरकार को मामले से जुड़े नए सबूत मिल जाएं तो सजा और लंबी हो सकती है.

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कांग्रेस के दौरान हुई शुरुआत
इस कानून की शुरुआत अंग्रेजी हुकूमत से समय से है. बंगाल विनियमन- III, 1818 (Bengal Regulation- III, 1818) के तहत अंग्रेज सरकार किसी को भी बिना किसी कानूनी प्रक्रिया यानी जांच से गुजारे बगैर बंद सकती थी. ये एक बड़ी ताकत थी, जो हुकूमत के खिलाफ बोलने वालों को कम से कम कुछ समय के लिए चुप कर पाती थी. बाद में ये कानून हट गया लेकिन साल 1971 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार इसे लेकर आई. तब ये आंतरिक सुरक्षा अधिनियम कहलाता था. हालांकि जनता सरकार ने सत्ता में आने पर इसे हटा दिया लेकिन फिर से कांग्रेस ने इसे लागू कर दिया.

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सरकार को मामले से जुड़े नए सबूत मिल जाएं तो रासुका में सजा और लंबी हो सकती है- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)


रासुका के साथ आखिर विवाद क्या है!
आमतौर पर किसी को गिरफ्तार किया जाए तो भी उसके मूल अधिकारों की रक्षा की बात होती है. इसके तहत आरोपी या दोषी को ये जानने का अधिकार है कि उसकी गलती क्या है. संविधान में भी अनुच्छेद 22 (1) में कहा गया है कि गिरफ्तार को दोष जानने और परामर्श पाने का हक है. हालांकि रासुका में इन अधिकारों की अनदेखी की जा सकती है. जैसे कफील खान के मामले को ही लें तो उनके वकील का कहना है कि भाषण के जिन अंशों को खतरा बताते हुए उन्हें गिरफ्तार किया गया, उसकी उन्हें सीडी दिलवाने की बात की गई थी, लेकिन आखिर तक उन्हें ये पता नहीं चल सका कि उनके भाषण में भड़काऊ क्या था.

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राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो’ (National Crime Records Bureau) जो देश में अपराध संबंधी डाटा जमा करता है, NSA के तहत आने वाले मामलों को अपने डाटा में शामिल नहीं करता है क्योंकि इन मामलों में कोई FIR दर्ज नहीं की जाती है. ये भी एक बड़ी समस्या है.

हाल में कहां-कहां लगा रासुका
बीते समय में कई लोगों पर रासुका के तहत कार्रवाई हुई. इसमें कई मामले कोरोना से संबंधित भी थे. जैसे गाजियाबाद में कथित तौर पर अस्पताल स्टाफ से खराब व्यवहार करने वालों पर रासुका लगाया गया. इसी तरह से कोरोना संक्रमितों के पास गए अस्पताल स्टाफ पर पथराव करने वालों पर भी रासुका के तहत कार्रवाई हुई. इसके अलावा जो मामला काफी तूल पकड़ रहा है, वो है इस कानून के तहत गोकशी से जुड़े लोगों पर कार्रवाई. यूपी पुलिस ने इस साल अब तक 139 लोगों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत कार्रवाई की है. इनमें से 76 मामले गोकशी से जुड़े हैं. इसपर विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सत्ता पार्टी अपने राजनैतिक मकसद साधने के लिए रासुका का दुरुपयोग कर रही है.
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