वो अखाड़ा, जिसके सशस्त्र साधुओं ने बाबरी मस्जिद पर कब्जा कर लिया था

वो अखाड़ा, जिसके सशस्त्र साधुओं ने बाबरी मस्जिद पर कब्जा कर लिया था
निर्मोही अखाड़े में शारीरिक मजबूती के साथ अस्त्र-शस्त्र सीखना जरूरी था

निर्मोही अखाड़े (Nirmohi Akhara) में शारीरिक मजबूती के साथ अस्त्र-शस्त्र सीखना जरूरी था ताकि वे रामभक्तों की रक्षा कर सकें.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 4, 2020, 3:04 PM IST
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अयोध्या (Ayodhya) में कल यानी 5 अगस्त को पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) राम मंदिर (Ram Temple) की नींव रखने वाले हैं. पूरे अयोध्या विवाद के बीच एक नाम बार-बार सामने आता रहा, वो है निर्मोही अखाड़ा. इसी अखाड़े के संतों ने साल 1853 में अयोध्या की विवादित भूमि को अपना बताते हुए, तब वहां बनी बाबरी मस्जिद पर कब्जा कर लिया था. जानिए, क्या है ये अखाड़ा और राम जन्मभूमि से इसका क्या संबंध है.

निर्मोही अखाड़ा पिछले करीब सौ साल से इस जगह पर मंदिर बनवाने की लड़ाई लड़ रहा है. वैष्णव संप्रदाय का ये अखाड़ा तब चर्चा में आया, उसने कोर्ट में विवादित ढांचे के बारे में अपना पक्ष रखते हुए दावा किया. ये साल 1959 की बात है. अखाड़े ने खुद को उस जगह का संरक्षक बताया जहां भगवान राम का जन्म हुआ था. सबसे पहली कानूनी प्रक्रिया भी इसी अखाड़े के महंत रघुवीर दास ने साल 1885 में शुरू की थी. उन्होंने एक याचिका दायर करके राम जन्मभूमि वाले स्थान के चबूतरे पर छत्र बनवाने की इजाजत मांगी. इसे फैजाबाद की जिला कोर्ट ने खारिज कर दिया. तब ये मामला उतना उछला नहीं था.

अखाड़े ने अर्जी डालते हुए कहा उसे राम जन्मभूमि के पूजा-पाठ और प्रबंधन की अनुमति मिले (सांकेतिक फोटो)




तीसरी बार निर्मोही अखाड़े ने अर्जी डालते हुए कहा उसे राम जन्मभूमि के पूजा-पाठ और प्रबंधन की अनुमति मिले. उनके वकील का दावा था कि राम जन्मभूमि का अंदरुनी हिस्सा कई सौ सालों से निर्मोही अखाड़े के अधिकार में रहा. साथ ही बाहरी हिस्से के चबूतरा, सीता रसोई और भंडार गृह भी इसी अखाड़े के कंट्रोल में रहे. बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा.


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यहां भी निर्मोही अखाड़ा एक पक्ष था. उनका कहना था कि वे कारकून हैं, जिनका काम ही यहां का प्रबंधन है. हालांकि नवंबर साल 2019 में दिए गए ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े के जमीन पर मालिकाना हक के एक्सक्लूजिव दावे को खारिज कर दिया. इस तरह से विवाद का अंत हुआ.

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वैसे वैष्णव संप्रदाय से जुड़े इस अखाड़े के बारे में कहा जाता है कि वो सालों तक इस जमीन पर अपना हक जमाने के लिए लगातार कोशिश करता रहा. जैसे साल 1853 में निर्मोही अखाड़े के ही कुछ साधुओं ने बाबरी मस्जिद पर कब्जा कर लिया था. माना जाता है कि वे सशस्त्र थे. विकिपीडिया में इस बारे में जानकारी मिलती है. इन सशस्त्र साधुओं ने वहां अपना दावा पेश किया था. हालांकि बाद में वे किस तरह से हटे या हटाए गए, इसकी खास जानकारी नहीं मिलती है.

अखाड़े के संत मानते थे कि रामभक्तों की रक्षा करना उनका धर्म है


अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद से मान्यता प्राप्त 14 अखाड़ों में से एक है निर्मोही अखाड़ा. 14वीं सदी में वैष्णव संत और कवि रामानंद ने इस अखाड़े की नींव रखी थी. राम की पूजा करने वाले इस अखाड़े के बारे में माना जाता है कि वो आर्थिक रूप से काफी संपन्न है. इसके यूपी, उत्तराखंड, मप्र, राजस्थान, गुजरात और बिहार में कई अखाड़े और मंदिर हैं. अखाड़े में किशोरवय की शुरुआत में ही बच्चे शामिल कर लिए जाते हैं लेकिन इस दौरान उन्हें पूजा-पाठ और ब्रह्मचारी जीवन की कड़ी सीख दी जाती है. शिक्षा पूरी करने के बाद इन्हें साधु पुकारा जाता है.

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वैसे पहले निर्मोही अखाड़ा पूजा-पाठ के अलावा लोगों की रक्षा का भी काम करता था. पुराने समय में इसके सदस्यों के लिए वेद, मंत्र आदि समझने के साथ शारीरिक कसरत और अस्त्र-शस्त्र सीखना भी जरूरी था. अखाड़े के संत मानते थे कि रामभक्तों की रक्षा करना उनका धर्म है. यही वजह है कि वे कई तरह के हथियार चलाना सीखते थे, जैसे तलवार, तीर-धनुष और कुश्ती. हालांकि समय के साथ इन चीजों की अनिवार्यता कम हो गई. अब भी निर्मोही अखाड़े के साधुओं के लिए शारीरिक मजबूती जरूरी है लेकिन अस्त्र-शस्त्र चलाना सीखने की अनिवार्यता नहीं रही.
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