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लकड़ी का तख्त, पेंसिल और अंधेरी रात.... ऐसे बुलाते हैं भटकती आत्माएं!

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Updated: November 18, 2018, 1:41 PM IST
लकड़ी का तख्त, पेंसिल और अंधेरी रात.... ऐसे बुलाते हैं भटकती आत्माएं!
सांकेतिक तस्वीर

साल 1853 में फ्रेंच अध्यात्मवादी एलन कार्डेक ने कथित तौर पर पारलौकिक शक्तियों से संपर्क साधने के लिए प्लेनचिट यंत्र का आविष्कार किया.

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फिल्मों में आपने भी रहस्यमयी माहौल में कुछ लोगों को आत्माओं का आह्वान करते देखा होगा! अंधेरे कमरे में प्लेनचिट के मार्फत सवालों के जवाब पाने की कोशिश हो सकता है आपने भी की हो. भटकती हुई रूहों से संपर्क की ये प्रक्रिया यानी प्लेनचिट का इतिहास बहुत पुराना और दिलचस्प है. अंग्रेजी के Planchette शब्द का जन्म फ्रेंच शब्द प्लैंक से हुआ, जिसका अर्थ है लकड़ी का तख्त. ये एक छोटा और आमतौर पर दिल के आकार का लकड़ी का टुकड़ा होता है जिसपर पेंसिल होती है जो ऑटोमेटिक राइटिंग या खुद-बखुद लिखती है. विक्टोरियन काल से चली आ रही प्लेनचिट विज्ञान की तमाम प्रगति को धता बताती हुई आज भी उतनी ही लोकप्रिय है.

इसे डायल प्लेट्स या टॉकिंग बोर्ड्स भी कहते हैं. साल 1853 में फ्रेंच अध्यात्मवादी एलन कार्डेक ने कथित तौर पर पारलौकिक शक्तियों से संपर्क साधने के लिए इस यंत्र आविष्कार किया. लगभग 2 दशकों तक इसका इस्तेमाल फ्रेंच अध्यात्मवादी ही करते रहे. बाद में अमेरिका की एक खिलौना बनाने वाली कंपनी को भूतों से संपर्क के लिए प्लेनचिट बोर्ड बनाने का ख्याल आया और उन्होंने न केवल बोलने वाला बोर्ड बनाया, बल्कि किताबों की दुकानों को इन बोर्ड्स से भर दिया. जल्द ही ये अमेरिका और ब्रिटेन में लोकप्रिय हो गए. आत्माओं के जरिए सवालों के जवाब पाने का ये तरीका घर-घर में अपनाया जाने लगा, हालांकि इसकी सत्यता पर खुद इस्तेमाल कर रहे लोगों को संदेह रहा. प्लेनचिट की शुरुआत के बारे में हालांकि अलग-अलग मान्यताएं हैं. एक उल्लेख यह भी है कि इसकी शुरुआत न्यूयॉर्क में साल 1848 के आरंभ में फॉक्स बहनों ने की थी, उन्होंने आत्माओं से संपर्क साधकर कई सवालों के जवाब खोजने का दावा किया था.



क्या है प्लेनचिट और कैसे अक्षरों पर रखी ऊंगलियां अपने-आप सरकने लगती हैं, इसे समझने की कोशिश लगातार होती रही है. ब्रिटिश अध्यात्मवादी सैमुअल गुपी ने अपनी किताब मेरी जेन: स्पिरिचुअलज्म केमिकली एक्सप्लेन्ड में इस बारे में बात की है. साल 1863 में आई इस किताब में लेखक ने बताया कि इंसानी शरीर गैसों से मिलकर बना है. त्वचा से लगातार इन गैसों की वजह से एक किस्म की तरंग निकलती रहती है. प्लेनचिट के संपर्क में आने वाली ऊंगलियां भी इन्हीं तरंगों से संचालित होती हैं और पेसिंल या उंगलियां बिना कोशिश ही अपने आप चलने लगती हैं. लगातार हो रही विज्ञान की नई-नई खोजों के बावजूजद प्लेनचिट पर लोगों का यकीन बढ़ने लगा और फ्रांस से होते हुए इसने जर्मनी, अमेरिका और ब्रिटेन के आम लोगों को भी अपनी ओर खींचा.

अमेरिकी गृहयुद्ध और प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान प्लेनचिट की लोकप्रियता घटने लगी और इसकी जगह युद्ध और हिंसा की चर्चाओं ने ले ली. हालांकि पारलौकिक शक्तियों से संपर्क साधने का ये तरीका अपनी वापसी का इंतजार कर रहा था, अबकी बार बदले हुए स्वरूप और ज्यादा लोकप्रियता का. अब प्लेनचिट के अलग-अलग रूप हैं. इनमें से एक है डायल प्लेनचिट. लगभग नौ इंच के कार्डबोर्ड में अक्षर और नंबर होते हैं, साथ ही हां, नहीं, अलविदा जैसे शब्द भी बने होते हैं. प्लेनचिट का ये तरीका भारत में खास लोकप्रिय नहीं.



दूसरा और सर्वाधिक लोकप्रिय तरीका है प्लेनचिट बोर्ड का. इसमें घर पर ही तैयार बोर्ड पर एक से दस तक नंबर और अंग्रेजी के अक्षर लिखे होते हैं. बोर्ड पर गिलास या कटोरी पर आमतौर पर समूह में बैठे लोग अपनी उंगलियां रखे होते हैं. कमरे में अंधेरा होता है और पारलौकिक शक्तियों को प्रसन्न करने के लिए धूप या अगरबत्ती भी जली होती है. पारलौकिक शक्तियों से संपर्क साधने की इस विधा का बाकायदा भारतीयकरण भी किया गया और आत्माओं को मेहमान मानकर उनके लिए शक्कर या मिश्री का भोग भी रखा जाता है. इसके बाद आत्माओं को बुलाया जाता है. आत्मा के आने के बाद गिलास अपने-आप सरककर यस पर चला जाता है यानी कमरे में बैठे लोग समझ जाएं कि उनका आह्वान सफल रहा. इसके बाद शुरू होता है सवालों का सिलसिला और आखिर में उपस्थित आत्मा को विदा भी दी जाती है.वक्त के साथ प्लेनचिट की लोकप्रियता इसकदर बढ़ी कि इसपर कई गाने भी बन गए. फोंडा शीट म्यूजिक कंपनी ने साल 1868 में प्लेनचिट पोल्का गाना बनाया. इसके बाद से लगातार कई गाने बने. साल 1907 में वॉशिंगटन पोस्ट अखबार ने पॉलिटिकल प्लेनचिट बोर्ड नामक कार्टून स्तंभ शुरू किया. फ्रांस और अमेरिका से होते हुए इस तरह आत्माओं को बुलाने का तरीका आम भारतीय जीवन में भी शामिल हो गया. हो सकता है आपने या आपके आसपास भी किसी ने मुश्किल सवालों के जवाब के लिए आत्माओं की मदद ली हो.

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First published: November 18, 2018, 9:35 AM IST
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