Explained: लीडर चुनते वक्त जनता के दिमाग में क्या चल रहा होता है?

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव है तो दूसरी तरफ बिहार में विधानसभा चुनावों की धूम है- सांकेतिक फोटो
अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव है तो दूसरी तरफ बिहार में विधानसभा चुनावों की धूम है- सांकेतिक फोटो

भीड़ ऐसे नेता को काफी पसंद करती है जो आत्मविश्वास से लबरेज हो. ऐसा नेता चाहे कितना कम ही जानकार हो, जनता उसे सही मान पाती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 3, 2020, 11:33 AM IST
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एक ओर अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव (American presidential election 2020) है तो दूसरी तरफ बिहार में विधानसभा चुनावों (elections in Bihar) की धूम है. देश से लेकर दुनिया तक के नेता लगातार अपने पक्ष और दूसरे नेता के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं. कई बार ये बयान काफी बेतुके हो जाते हैं लेकिन इससे कोई खास फर्क नहीं दिखता. शीर्ष पर बैठे कई नेता अपनी बेतुकी बयानबाजियों के कारण चर्चित रहे. तो क्या अजीब बातें कहना नेताओं के खिलाफ नहीं जाता? जानिए, किन बातों के आधार पर जनता नेता चुनती है.

काम करती है साइकोलॉजी
चुनाव प्रचार के दौरान सारे ही राजनेता लगभग एक-से वादे करते हैं कि आने के बाद वे टैक्स में राहत देंगे, पढ़ाई के वादे, नौकरी की बात और महिलाओं की सुरक्षा के दावे. ये पैटर्न देश-दुनिया में लगभग समान है. इसके बाद भी हर साल टैक्स का बोझ आम जनता पर बढ़ा और बेरोजगारी भी ऊपर जा रही है. इसके बाद भी जनता किसी न किसी को नेता चुनती है. मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि इसके पीछे एक मनोविज्ञान काम करता है. ये इतना गहरा है कि नेता सामान्य बुद्धि से कमतर भी हो तो भी जनता उसे पसंद करती है.

जॉर्ज डब्ल्यू बुश लगातार 8 साल तक वाइट हाउस में रहे- फोटो (flickr)

बुश का बुशिज्म आज भी लोकप्रिय है


मिसाल के तौर पर अमेरिका की ही राजनीति को लें तो जॉर्ज डब्ल्यू बुश, जो वहां लगातार 8 साल तक वाइट हाउस में रहे- उनके बारे में चर्चित रहा कि वो जब बोलेंगे, कोई न कोई मूखर्तापूर्ण बात होगी. द गार्डियन में बताया गया है कि अमेरिकी जनता और खासकर पत्रकार बिरादरी के बीच इसके लिए टर्म लोकप्रिय हो चुकी थी, जिसे Bushisms कहते हैं. यानी जब भी कोई बेतुकी बात हो, उसे बुशिज्म कह दिया जाए. यहां तक कि अमेरिकी नागरिक बुश के बयानों को ऐसे संदर्भो में कोट भी किया करते हैं.

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जनता आखिर ऐसे लीडर क्यों चुनती है
अब सवाल उठता है कि आखिर क्यों जनता ऐसे लोगो को अपना लीडर चुनती है. तो इसके पीछे गहरी साइकोलॉजी है. भीड़ ऐसे लोगों को बहुत पसंद करती है, जो आत्मविश्वास से भरपूर हों, और उनकी बात मान लेती है, चाहे वो बात गलत ही क्यों न हो. कई स्टडीज में ये बात सामने आ चुकी है. तो नेता अगर आत्मविश्वास दिखाए और अपने को सही कहता रहे तो लोग आखिरकार उसे सच मान लेते हैं.

मनोविज्ञान के मुताबिक आत्मविश्वास का बुद्धिमत्ता से कोई लेना-देना नहीं- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


कम जानकार होता है ज्यादा आत्मविश्वासी 
मनोविज्ञान के मुताबिक आत्मविश्वास का बुद्धिमत्ता से कोई लेना-देना नहीं. बल्कि ये पाया गया कि जो ज्यादा बुद्धिमान होते हैं, उनका आत्मविश्वास कमजोर होता है. क्योंकि खुद उन्हें अपना ज्ञान पूरा नहीं लगता. एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी की एक स्टडी बताती है कि सेल्फ-अप्रेजल में ऐसे लोग ही खुद को बेस्ट बता पाते हैं, जिन्हें असल में कुछ नहीं आता. चूंकि वे कम जानते हैं इसलिए उन्हें खुद के भीतर किसी कमी का भी पता नहीं होता. और वे आत्मविश्वास से भरे होते हैं. यानी कुल मिलाकर कॉनफिडेंट नेता, जो भले कम जानकार हो, जनता को लुभाता है.

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जनता की पहुंच हो
किसी लोकप्रिय नेता की एक और खूबी ये होती है कि लोग खुद को उससे रिलेट कर पाते हैं. जैसे जॉर्ज बुश की ही बात लें तो लोगों को लगता था कि वो कभी भी जाकर उनसे साथ बैठकर गप्पें मार सकते हैं. उन्होंने अपनी छवि एक एक्सेसिबल नेता की बना रखी थी, जिसतक कोई भी पहुंच सके. ये उनके पक्ष में था क्योंकि ऐसे नेता को भले काम कम करना पड़े लेकिन वो मिलकर ही लोगों के इगो को संतुष्ट कर पाता है.

मनोविज्ञान का एक और सिद्धांत है, जिसे Parkinson’s law of triviality कहते हैं- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


ज्यादा बुद्धिमान यानी कम लोकप्रिय
इसके उलट, अगर जनता के लिए किसी नेता से मिलना या उससे जुड़ सकना नामुमकिन लगे, तो ये उसकी छवि खराब करता है. जनता को लगता है कि हमारे वोट से ये नेता हुआ और हमारी समस्या का इसे पता तक नहीं. लिहाजा वो उससे दूरी बना लेते हैं. मनोवैज्ञानिक इसे इस बात से भी समझाते हैं कि ज्यादा बुद्धिमान और संवेदनशील लोग दफ्तर या सार्वजनिक जगहों पर कम लोकप्रिय होते हैं, बनिस्बत उनके जो कम बुद्धिमान लेकिन एक्सेसिबल हों.

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छोटी समस्याओं को टारगेट करने वाला पसंद आता है
मनोविज्ञान का एक और सिद्धांत है, जिसे Parkinson’s law of triviality कहते हैं. इसके तहत लोग उन बातों पर ज्यादा चर्चा करते और समय देते हैं, जो बातें या समस्याएं छोटी हैं. वहीं बड़ी समस्याओं के बारे में चूंकि ज्यादातर लोगों की जानकारी सीमित होती है, इसलिए वे न तो ऐसी बात करते हैं और न ही ऐसी बातें करने वालों को पसंद करते हैं. लीडर चुनने के दौरान भी यही होता है. अगर कोई नेता देश या वैश्विक समस्याओं की तह तक बात करे तो लोग उससे छिटकेंगे और उसकी बजाए ऐसा नेता चुनेंगे जो उन बातों पर बोल सके, जिसपर वे खुद अक्सर चर्चा करते हैं.
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