Coronavirus : क्या है R रेट, जिसका 1 से ऊपर जाना ख़तरनाक हो सकता है?

Coronavirus : क्या है R रेट, जिसका 1 से ऊपर जाना ख़तरनाक हो सकता है?
कोरोनावायरस के खतरे को समझने के लिए एक्सपर्ट R रेट पर ध्यान दे रहे हैं (Photo-pixabay)

कोरोना वायरस (coronavirus) के खतरे को समझने के लिए एक्सपर्ट R रेट पर ध्यान दे रहे हैं. R रेट का मतलब है रिप्रोडक्टिव रेट (reproductive rate) यानी वायरस कितनी तेजी से शरीर के भीतर या एक से दूसरे में पहुंचता है.

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दुनिया में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा लगभग 55 लाख हो चुका है. मौतों का आंकड़ा भी 34 लाख पार कर चुका है. फिलहाल अब तक हमारे पास कोई टीका भी नहीं. ऐसे में वैज्ञानिकों ने वायरस से निपटने के लिए हाल ही में नया तरीका सोचा है. वे इसके R रेट को देखकर ये समझने की कोशिश कर रहे हैं कि वायरस कितनी तेजी से बढ़ता है. इसी के हिसाब से लॉकडाउन में भी ढील दी जाएगी.

क्या है R रेट
इसे R नॉट भी कहते हैं, जिसका मतलब है रिप्रोडक्टिव रेट. इसे इस बात की जांच के लिए इस्तेमाल किया जाता है कि एक कोरोना मरीज अपनी बीमारी कितने लोगों तक फैला सकता है. एक्सपर्ट इसकी मदद से ये समझना चाह रहे हैं कि कोरोना संक्रमण कितनी तेजी से और कितनी दूर तक पहुंच सकता है. इसकी मदद से ही लॉकडाउन के नए नियम तय हो सकते हैं या फिर उसमें ज्यादा सख्ती या ढिलाई दी जा सकती है. जैसे अगर किसी वायरस का R रेट तीन है तो इसका मतलब है कि मरीज इसे तीन लोगों तक फैलाएगा. हालांकि R रेट से ये पता नहीं लगता है कि ये कितना घातक हो सकता है.

इसकी मदद से ही लॉकडाउन के नए नियम तय हो सकते हैं या फिर उसमें ज्यादा सख्ती या ढिलाई दी जा सकती है (Photo-pixabay)

चीन के वुहान में, जहां कोरोना वायरस संक्रमण की शुरुआत हुई, वहां जनवरी में R वैल्यू 2.35 थी. यही वजह है कि संक्रमण तेजी से फैला. हालांकि सख्त लॉकडाउन के कारण यही वैल्यू घटकर 1.05 हो गई. वुहान पर ये स्टडी मेडिकल जर्नल Lancet में आई है. इससे पता चलता है कि जितने कम से कम लोग आपस में मिलें, वायरस की ग्रोथ रेट उतनी कम होती चली जाती है और आखिरकार ये 1 से कम हो जाती है. वैज्ञानिक मान रहे हैं कि वायरस की आर वैल्यू 0.6 और 0.75 के बीच रहे तो सबसे बेहतर होगा. इससे ज्यादा होने पर वायरस तेजी से फैलता है और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग लगभग नामुमकिन हो जाती है.



हर देश और यहां तक कि प्रदेश के लिए भी R वैल्यू अलग-अलग हो सकती है. जैसे लंदन को ही लें तो इसकी R रेट फिलहाल 0.4 आंकी जा रही है. यानी कोरोना के 10 मरीज ये बीमारी सिर्फ 4 लोगों तक फैला सकेंगे. इतनी कम R वैल्यू से भी ये भी अंदाजा लगाया जा रहा है कि लंदन में अगर लॉकडाउन का सख्ती से पालन हो सका, तो मई के अंत तक वायरस यहां खत्म हो जाएगा.

हर वायरस की R वैल्यू अलग-अलग होती है. जैसे मौसमी फ्लू की वैल्यू 1.3 है, वहीं मीजल्स के वायरस की रेट 12 से 18 प्रतिशत होती है. यानी ये बीमारी बहुत ज्यादा संक्रामक होती है. कोरोना के बारे में World Health Organisation (WHO) ने औसत निकालने हुए मार्च में ही कहा था कि इसकी वैल्यू 2 से 2.5 के बीच होगी. हालांकि फिलहाल R वैल्यू निकालना मुश्किल हो रहा है क्योंकि ये नहीं पता है कि कितने लोग कोरोना संक्रमित हैं.

हर वायरस की R वैल्यू अलग-अलग होती है, जैसे मौसमी फ्लू की वैल्यू 1.3 है (Photo-pixabay)


वैसे ब्रिटेन में R वैल्यू को लेकर लोग काफी सतर्क हैं. हाल ही में कोरोना से बाहर निकले बोरिस जॉनसन ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा था कि हमें R वैल्यू को कम से कम करने की कोशिश करनी है. वायरस के संक्रमण की रफ्तार को ट्रैक करने के लिए वहां का Joint Biosecurity Centre एक कोविड अलर्ट बनाने की कोशिश कर रहा है ताकि ये समझा जा सके कि एक मरीज से कितने लोगों तक संक्रमण फैल सकता है. इससे लॉकडाउन को लेकर नए नियम बनाए जा सकेंगे ताकि वायरस संक्रमण कम से कम किया जा सके. यानी R वैल्यू जितनी बढ़ी होगी, लॉकडाउन के तरीके उतने ही सख्त होंगे. माना जा रहा है कि अगर ये 1 से ज्यादा रहता है तो सोशल डिस्टेंसिंग लंबे वक्त तक बनाई रखनी हो सकती है.

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