जानिए, क्या है रीयूजेबल स्पेसक्राफ्ट, जो China के सीक्रेट मिशन का हिस्सा है

जानिए, क्या है रीयूजेबल स्पेसक्राफ्ट, जो China के सीक्रेट मिशन का हिस्सा है
चीन ने एक स्पेसक्राफ्ट लॉन्च किया, जो रीयूजेबल यानी दोबारा इस्तेमाल हो सकता है- सांकेतिक फोटो (Photo-pikist)

चीन ने गुपचुप तरीके से दोबारा उपयोग में लाया जाने वाला स्पेसक्राफ्ट लॉन्च (reusable spacecraft launch by China) किया. लॉन्च से जुड़े लोगों को इस बारे में किसी भी बातचीत की सख्त मनाही है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 6, 2020, 10:16 AM IST
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चीन लगातार खुद को सैन्य तरीके से मजबूत बना रहा है. इसी क्रम में उसने एक स्पेसक्राफ्ट लॉन्च किया, जो रीयूजेबल (reusable experimental spacecraft) यानी दोबारा इस्तेमाल हो सकता है. ये सब एक सीक्रेट मिशन के तहत किया गया. स्पेसक्राफ्ट की फोटो लेने या इसपर किसी भी तरह की चर्चा की सख्त मनाही की गई. चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक स्पेसक्राफ्ट को चीन स्थित जियुकुआन उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र से स्पेस भेजा गया. इसकी वापसी पर ये देखा जाएगा कि क्राफ्ट दोबारा इस्तेमाल कैसे हो सकता है. वैसे ये जानना दिलचस्प है कि आखिर क्या हैं रीयूजेबल स्पेसक्राफ्ट और चीन को इसकी क्या जरूरत आ पड़ी.

क्या खास है इस स्पेसक्राफ्ट में
रीयूजेबल स्पेसक्राफ्ट यानी जो अंतरिक्ष यान एक बार के बाद बेकार न हो, बल्कि लॉन्च में उसका बार-बार इस्तेमाल हो सके. पारंपरिक अंतरिक्ष यान एक बार के बाद गैर-उपयोगी हो जाते हैं. जैसे आरंभिक एयरक्राफ्ट एक बार ही प्रयोग हो पाया करते थे. शटल के ऊपर एक विशेष प्रकार की तापरोधी चादर होती है. यह चादर पृथ्वी की कक्षा में उसे घर्षण से पैदा होने वाली ऊष्मा से बचाती है. इसलिए इस चादर को बचाकर रखा जाता है. यदि यह चादर न हो या किसी कारणवश टूट जाए, तो पूरा यान मिनटों में जलकर खाक हो जाता है. चंद्रमा पर कदम रखने वाले अभियान के अलावा, ग्रहों की जानकारी एकत्र करने के लिए जितने भी स्पेसक्राफ्ट भेजे जाते है, वे रोबोट क्राफ्ट होते है. कंप्यूटर और रोबोट के द्वारा धरती से इनका ऑटोमेटिक ऑपरेशन होता है.

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कंप्यूटर और रोबोट के द्वारा धरती से इनका ऑटोमेटिक ऑपरेशन होता है- सांकेतिक फोटो (Photo-pikist)

कैसे करता है काम


इसके बाद रीयूजेबल स्पेसपक्राफ्ट की बात सोची गई. इसमें ऐसा मेकेनिज्म होता है कि ये धुरी से हटकर धरती के वातावरण में दोबारा लौट पाता है. जैसे नासा के स्पेस शटल में इसी तरह का इंतजाम है. स्पेसX ड्रैगन भी इसी तरह से काम करता है. ये इस तरह से काम करते हैं कि स्पेसक्राफ्ट डीऑर्बिट हो जाता है. इससे उसकी गति काफी कम हो जाती है और ये नीचे उतरने लगता है. धरती में वापस लौटने के दौरान स्पेसक्राफ्ट का तापमान ज्यादा न बढ़े, इसके लिए उसमें हीट-शील्डिंग की जाती है.

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हीट से बचाना काफी जरूरी
इस शील्डिंग /evr परत को मल्टी लेयर इंसुलेशन कहते हैं. ये एक तरह का इंसुलेटर होता है जो ढेर सारी पतली-पतली परतों से बना होता है. ये अपने भीतर किसी बाहरी एनर्जी को आने नहीं देता. इससे स्पेस क्राफ्ट किसी थर्मल रेडिएशन से सुरक्षित रहता है. इसी मल्टी लेयर इंसुलेशन को आम बोलचाल में गोल्ड प्लेटिंग कहा जाता है. bwms सोने की तरह दिखने वाली ये परतें सोने की नहीं होती हैं, बल्कि ये एक तरह का प्लास्टिक होती हैं, जिसे polyimide कहते हैं. इससे एयर क्राफ्ट का तापमान एक निश्चित डिग्री तक बना रहता है.

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इस्तेमाल की होती है लिमिट
हीट-शील्डिंग के लिए कई दूसरे मटेरियल का भी इस्तेमाल होता है. हालांकि वे उतने विश्वसनीय नहीं होते. ऐसे में धरती पर वापस लौटते हुए हीट के कारण स्पेसक्राफ्ट के नष्ट होने का खतरा रहता है. लैंडिंग के लिए पहले जमीन के बारे में सोचा गया लेकिन अब सुरक्षा को देखते हुए पैराशूट के जरिए जमीन की बजाए समुद्र में लैंडिंग कराई जाने लगी है. एक बार लैंड करने के बाद स्पेसक्राफ्ट को दोबारा इस्तेमाल के लिए तैयार करने में समय लगता है. ये लगभग एक साल तक भी जा सकता है. हालांकि कोई भी क्राफ्ट कितनी बार इस्तेमाल हो सकेगी, इसकी भी एक क्षमता होती है.

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स्पेसक्राफ्ट की हीट-शील्डिंग के लिए खास तकनीक होती है- सांकेतिक फोटो (Photo-pikist)


चीन ने किया गुपचुप लॉन्च
अब अगर चीन के शिन्हुआ की रिपोर्ट पर लौटें तो वो लिखता है कि Jiuquan Satellite Launch Center ये स्पेसक्राफ्ट छोड़ा गया है लेकिन इसके अलावा इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती. केवल इतना कहा जाता है कि ये तय वक्त में लौटेगा और फिर इसके रीयूजेबल होने की जांच की जाएगी और इस मुताबिक तैयार किया जाएगा. स्पेस न्यूज.कॉम के मुताबिक ये वही स्पेसक्राफ्ट हो सकता है, जो चीन ने साल 2017 में छोड़ा था. तब भी उसने रीयूजेबल तकनीक की बात की थी और कहा था कि वो 2020 में इसके लॉन्च की तैयारी कर रहा है.

माना जा रहा है कि चीन ये तकनीक अमेरिका से होड़ में दिखा रहा है. अमेरिका ने भी X-37B स्पेसक्राफ्ट बनाया, जिसे एयर फोर्स प्रोजेक्ट के तहत ही अब तक 4 बार स्पेस में भेजा जा चुका है. नासा का स्पेस शटल प्रोग्राम भी काफी सफल रहा. इसके तहत साल 1981 से लेकर 2011 तक 135 मिशन कामयाब हुए. तत्कालीन सोवियत संघ (अब रूस) ने भी साल 1988 में एक प्रोग्राम लॉन्च किया था. Buran नाम का ये रीयूजेबल स्पेसक्राफ्ट बनाने का प्रोग्राम अब बंद हो चुका कहा जा रहा है.
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