कश्मीर में बना था कौन सा 'रोशनी एक्ट', जिसे कोर्ट ने अंधेर कहा

कश्मीर भूमि घोटाले में कई राज्य सरकारों पर आरोप हैं.

कश्मीर भूमि घोटाले में कई राज्य सरकारों पर आरोप हैं.

गैरकानूनी कानून (Illegal Act) बनाकर कैसे करोड़ों के वारे न्यारे किए जाते हैं, इसकी मिसाल बनी रोशनी स्कीम (Roshni Scheme of J&K) से जम्मू कश्मीर की कई सरकारों ने जेबें भरीं. कांग्रेस, एनसी, पीडीपी की जो भव्य इमारतें खड़ी हैं, क्या उनके नीचे से ज़मीन खिसक चुकी?

  • News18India
  • Last Updated: November 2, 2020, 8:25 AM IST
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'रोशनी एक्ट' या 'रोशनी स्कीम' जैसा नाम सुनकर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यह बिजली से जुड़ी कोई योजना होगी. जी नहीं, जम्मू कश्मीर में यह 'अंधेरगर्दी' से जुड़े एक घोटाले का नाम है. बेशक, रियल एस्टेट सेक्टर में सरकारी स्तर पर अरबों रुपये के घपले को अंजाम देने के लिए यह एक्ट लाया गया था. इस भूमि घोटाले के तहत हुए तमाम आवंटन और प्रक्रियाएं निरस्त कर दी गई हैं और हाई कोर्ट ने इसे पूरी तरह 'गैर कानूनी और असंवैधानिक' करार दे दिया है.

जम्मू कश्मीर के इतिहास में 25,000 करोड़ रुपये के सबसे बड़े घोटाले के तौर पर देखे जा रहे इस एक्ट को सिरे से खारिज कर दिया गया है और हाई कोर्ट ने इसकी सीबीआई जांच के आदेश दे दिए हैं. सियासी कद्दावरों और ब्यूरोक्रेटों को सीधे तौर पर फायदा पहुंचाने के लिए बनाई गई इस खुराफाती स्कीम के बारे में सब कुछ जानिए.

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क्या है ऐतिहासिक भूमि घोटाला?
इस स्कीम का आधिकारिक नाम जम्मू और कश्मीर राज्य भूमि एक्ट 2001 था, जिसे रोशनी स्कीम के नाम से भी जाना गया. इसके तहत राज्य सरकार ने मामूली कीमतें तय कर उन लोगों को उन ज़मीनों पर स्थायी कब्ज़े देने की बात कही, जिन्होंने सरकारी ज़मीन पर अतिक्रमण कर रखा था. यानी सरकारी ज़मीनों पर गैर कानूनी कब्ज़ों को कानूनी तौर पर मालिकाना हक देने की कवायद की गई.

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जम्मू कश्मीर राज्य का नक्शा ऐसा था, जब 2001 में रोशनी एक्ट बना था.

सीएम फारुक अब्दुल्ला सरकार द्वारा 2001 में लाई गई इस स्कीम के तहत 1990 से हुए अतिक्रमणों को इस एक्ट के दायरे में कट ऑफ सेट किया गया था. उस दौरान राज्य सरकार ने किसानों को मुफ्त में उन कृषि भूमियों के पट्टे दे दिए थे, जिन पर किसानों ने कब्ज़े किए हुए थे.



क्यों मिला 'रोशनी' नाम और कैसे हुआ अंधेर?

अब्दुल्ला सरकार ने इस एक्ट को बनाते समय कहा कि ज़मीनों के कब्ज़ों को कानूनी किए जाने से जो फंड जुटेगा, उससे राज्य में पावर प्रोजेक्टों का काम किया जाएगा, इसलिए इस एक्ट का नाम 'रोशनी' रखा गया, जो मार्च 2002 से लागू हुआ. 1 एकड़ में 8 कनाल होते हैं और इस लिहाज़ से ढाई लाख एकड़ से ज़्यादा अवैध कब्ज़े वाली ज़मीन को हस्तांतरित करने की योजना बनाई गई.

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अंधेर ये था कि ज़मीन को मार्केट वैल्यू के सिर्फ 20 फीसदी दर पर सरकार ने कब्ज़ेदारों को सौंपा. यानी कुल मिलाकर इससे 25 हज़ार करोड़ रुपये का घोटाला होने की बात सामने आई. अंधेर ये भी रहा कि अब्दुल्ला सरकार के बाद की सरकारों ने भी इसका फायदा उठाया. 2005 में सत्तारूढ़ मुफ्ती सरकार ने कट ऑफ को 2004 तक बढ़ा दिया था और फिर गुलाम नबी आज़ाद सरकार ने 2007 तक.

किसे मिलता रहा नाजायज़ फायदा?

इस विवादास्पद रोशनी एक्ट से किस किसको फायदा हुआ? इस बारे में आई रिपोर्ट्स में कहा गया कि 'स्थानीय स्तरों पर जो भी प्रभावशाली था या प्रभावशालियों के संपर्क में था', हर उस व्यक्ति को फायदा पहुंचा. मंत्रियों, कारोबारियों, नौकरशाहों और इन सबके रिश्तेदारों या करीबियों को ज़मीनें कौड़ियों के भाव मिलीं. हसीब दरबू, मेहबूब बेग, मुश्ताक अहमद चाया, कृशन अमला, खुर्शीद अहमद गनी और तनवीर जहान जैसे प्रभावशाली नाम इस लिस्ट में सामने आ चुके हैं.

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इस घोटाले की गहराई की अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि श्रीनगर शहर के बीचों बीच 'खिदमत ट्रस्ट' के नाम से कांग्रेस के पास कीमती ज़मीन का मालिकाना हक पहुंचा, तो नेशनल कॉन्फ्रेंस का भव्य मुख्यालय तक ऐसी ही ज़मीन पर बना हुआ है, जो इस भूमि घोटाले से तकरीबन मुफ्त के दाम ​हथियाई गई.

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एक्ट निरस्त होने का मतलब क्या है?

जम्मू और कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक की अगुवाई वाली राज्य प्रशासनिक परिषद यानी SAC ने 2018 में रोशनी एक्ट को रद्द किया, तो इसका शुरूआती मतलब यही था कि इस स्कीम में जो आवेदन या प्रक्रियाएं पेंडिंग थीं, उन्हीं को निरस्त माना जाए. लेकिन, बाद में इसे लेकर हलचल बढ़ी और हाई कोर्ट ने इसे गैरकानूनी, अन्यायपूर्ण, असंवैधानिक और असंगत करार दे दिया.

हाई कोर्ट ने जब इसे सिरे से खारिज किया तो इस एक्ट की शुरूआत से हुई तमाम प्रक्रियाएं और आवंटन गैर कानूनी हो गए. हाल में, जस्टिस गीता मित्तल व राजेश बिंदल की हाई कोर्ट बेंच ने सीबीआई जांच के आदेश देकर यह भी कहा कि हर आठ हफ्ते में केस की जांच के स्टेटस की रिपोर्ट दी जाती रहे.

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