क्या है शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन, क्यों इसकी बैठक में बिश्‍केक गए हैं पीएम नरेंद्र मोदी

एससीओ की स्थापना के पीछे चीन के प्रयास ज्यादा रहे हैं. भारत को वर्ष 2017 में इस संगठन में पूर्ण सदस्य बनाया गया. इसकी एक मीटिंग इस साल के शुरू में भारत में भी हो चुकी है. वैसे इसका सदस्य पाकिस्तान भी है. इसे नाटो का जवाब भी माना जाता है

News18Hindi
Updated: June 14, 2019, 1:14 PM IST
क्या है शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन, क्यों इसकी बैठक में बिश्‍केक गए हैं पीएम नरेंद्र मोदी
शंघाई सहयोग संघ की मीटिंग में प्रधानमंत्री अन्य राष्ट्राध्यक्षों के साथ
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Updated: June 14, 2019, 1:14 PM IST
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एससीओ यानी शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन की बैठक में हिस्सा ले रहे हैं. ये बैठक किर्गिस्‍तान की राजधानी बिश्‍केक में हो रही है. ये उत्सुकता स्वाभाविक है कि आखिर एससीओ है क्या और भारत को इससे क्या हासिल होगा.

एससीओ की स्थापना 23 साल पहले चीन की पहल पर हुई थी. शंघाई में हुई इसकी पहली बैठक में इसका गठन हुआ. उस समय इसमें पांच देश शामिल थे. इसलिए शुरुआत में इसे शंघाई फाइव के नाम से जाता था. ये पांच देश थे चीन, रूस, कज़ाकस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान. इसका गठन आपसी सहयोगी और नस्लीय और धार्मिक तनाव से निपटने के लिए हुआ था. एससीओ को इस समय दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन माना जाता है.



हालांकि शुरुआती तौर पर इसका मकसद मध्य एशिया के नए आज़ाद हुए देशों के साथ लगती रूस और चीन की सीमाओं पर तनाव को रोकना था. तीन सालों में इसने काफी अच्छा काम किया. फिर इसे नया स्वरूप दिया गया, जिसे शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन कहा गया.

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क्या था शुरुआती उद्देश्य
1996 में जब शंघाई इनीशिएटिव के तौर पर इसकी शुरुआत हुई थी तब सिर्फ़ ये ही उद्देश्य था कि मध्य एशिया के नए आज़ाद हुए देशों के साथ लगती रूस और चीन की सीमाओं पर कैसे तनाव रोका जाए और धीरे-धीरे किस तरह से उन सीमाओं को सुधारा जाए और उनका निर्धारण किया जाए.

एससीओ का बिश्केक में आयोजन स्थल

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ये मक़सद सिर्फ़ तीन साल में ही हासिल कर लिया गया. इसकी वजह से ही इसे काफ़ी प्रभावी संगठन माना जाता है. अपने उद्देश्य पूरे करने के बाद उज़्बेकिस्तान को संगठन में जोड़ा गया और 2001 से एक नई संस्था के तौर पर शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन का गठन हुआ.

फिर इसका नया स्वरूप क्या हुआ
इस नए संगठन में उजबेकिस्तान को भी जोड़ लिया गया. अब उसमें आर्थिक सहयोग और व्यापार बढ़ाने पर भी जोर दिया गया. तब ये माना गया कि चीन और रूस ने एक तरह से अमेरिकी प्रभुत्व वाले नाटो के जवाब में ये संगठन बनाया है. एससीओ के नए उद्देश्यों में ऊर्जा पूर्ति से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना और आतंकवाद से लड़ना भी शामिल हो गए हैं.

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भारत और पाकिस्तान 2017 में पूर्ण सदस्य बने
आने वाले समय में जब एससीओ का और विस्तार हुआ तो भारत के साथ कई अन्य देश भी इसमें शामिल हो गए. भारत साल 2017 में एससीओ का पूर्णकालिक सदस्य बना. 2005 से इसमें पर्यवेक्षक देश का दर्जा हासिल था.

एससीओ की मीटिंग में प्रधानमंत्री मोदी


2017 में एससीओ की 17वीं शिखर बैठक में इस संगठन के विस्तार की प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण चरण के तहत भारत और पाकिस्तान को सदस्य देश का दर्जा दिया गया. अब इसके सदस्यों की संख्या आठ हो चुकी है. अब एससीओ में चीन और रूस के बाद भारत तीसरा सबसे बड़ा देश है. भारत का कद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रहा है. इस साल के शुरू में एससीओ की मीटिंग भारत में भी हो चुकी है.

एससीओ में सदस्य और सहयोगी देशों की स्थिति
फिलहाल एससीओ के आठ सदस्य चीन, कज़ाकस्तान, किर्गिस्तान, रूस, तज़ाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, भारत और पाकिस्तान हैं. इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान, बेलारूस, ईरान और मंगोलिया इसके आब्जर्वर सदस्य हैं. छह डायलॉग सहयोगी आर्मेनिया, अज़रबैजान, कंबोडिया, नेपाल, श्रीलंका और तुर्की हैं. एससीओ का मुख्यालय चीन की राजधानी बीजिंग में है.

भारत को क्या फायदा होगा
भारतीय हितों की जो चुनौतियां हैं, चाहे वो आतंकवाद हों, ऊर्जा की आपूर्ति या प्रवासियों का मुद्दा हो. ये मुद्दे भारत और एससीओ दोनों के लिए अहम हैं और इन चुनौतियों के समाधान की कोशिश हो रही है. ऐसे में भारत के जुड़ने से एससीओ और भारत दोनों को परस्पर फ़ायदा होगा. भारत ने आतंकवाद को लेकर अपना कड़ा रुख़ बरकरार रखा है.

प्रधानमंत्री मोदी की कोशिश होगी कि आतंकवाद को लेकर उनके कड़े रुख़ को शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ के सभी नेताओं का समर्थन मिले. इसलिए ये शिखर सम्मेलन भारत के लिए काफ़ी अहम है.

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