Explained: क्यों शाही स्नान को लेकर साधुओं के बीच झड़प की नौबत आ जाती है?

कुंभ मेले में आने वाले लोगों के लिए कोरोना टेस्ट रिपोर्ट अनिवार्य कर दी गई है. (File)

कुंभ मेले में आने वाले लोगों के लिए कोरोना टेस्ट रिपोर्ट अनिवार्य कर दी गई है. (File)

Kumbh Mela 2021: कुंभ मेले में विभिन्न अखाड़ों के साधुओं का वैभव राजाओं जैसा होता था, जिसकी वजह से इसे शाही स्नान (Shahi Snan) कहा गया. वक्त के साथ स्नान को लेकर अखाड़ों में झगड़े होने लगे.

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हरिद्वार में कुंभ मेले की शुरुआत हो चुकी है. 11 मार्च को महाशिवरात्रि के मौके पर यहां पहला शाही स्नान होने जा रहा है. इसके बाद के तीन शाही स्नानों की तारीखें और वक्त घोषित किया जा चुका है. शाही स्नान शांति से निपटे, इसके लिए अखाड़ों का क्रम और स्नान के लिए जगह भी तय कर दी जाती है, नहीं तो पहले शाही स्नान के दौरान साधुओं में झगड़ा भी हो जाता था. क्या है ये शाही स्नान और वैराग्य ले चुके साधुओं का इससे क्या वास्ता है, यहां समझिए.

शाही स्नान की शुरुआत
सदियों से ये स्नान चला आ रहा है, जिसमें 13 अखाड़े शामिल होते हैं. ये कोई वैदिक परंपरा नहीं. माना जाता है कि इसकी शुरुआत 14वीं से 16वीं सदी के बीच हुई, तब देश पर मुगल शासकों के आक्रमण की शुरुआत हो गई थी. धर्म और परंपरा को मुगल आक्रांताओं से बचाने के लिए हिंदू शासकों ने अखाड़े के साधुओं और खासकर नागा साधुओं से मदद ली.

वक्त के साथ शाही स्नान को लेकर विभिन्न अखाड़ों में संघर्ष होने लगा (Photo- news18 English via PTI)

नागा साधु धीरे-धीरे आक्रामक होने लगे और धर्म को राष्ट्र से ऊपर देखने लगे. ऐसे में मध्यकालीन हिंदू शासकों ने नागा साधुओं के प्रतिनिधि मंडल के साथ बैठक कर राष्ट्र और धर्म के झंडे और साधुओं और शासकों से काम का बंटवारा किया. साधु खुद को खास महसूस कर सकें, इसके लिए कुंभ स्नान का सबसे पहले लाभ उन्हें देने की व्यवस्था हुई. इसमें साधुओं का वैभव राजाओं जैसा होता था, जिसकी वजह से इसे शाही स्नान कहा गया. इसके बाद से शाही स्नान की परंपरा चली आ रही है.



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वक्त के साथ शाही स्नान को लेकर विभिन्न अखाड़ों में संघर्ष होने लगा. साधु इसे अपने सम्मान से जोड़ने लगे. उल्लेख मिलता है कि साल 1310 में महानिर्वाणी अखाड़े और रामानंद वैष्णव अखाड़े के बीच खूनी संघर्ष हुआ. दोनों ओर से हथियार निकल गए और पूरी नदी ने खूनी रंग ले लिया. साल 1760 में शैव और वैष्णवों के बीच स्नान को लेकर ठन गई. ब्रिटिश इंडिया में स्नान के लिए विभिन्न अखाड़ों का एक क्रम तय हुआ जो अब तक चला आ रहा है.

अखाड़ों से ताल्लुक रखने वाले साधु-संत सोने-चांदी की पालकियों, हाथी-घोड़े पर बैठकर स्नान के लिए पहुंचते हैं (Photo- news18 English via PTI)


शाही स्नान में क्या होता है
इसमें विभिन्न अखाड़ों से ताल्लुक रखने वाले साधु-संत सोने-चांदी की पालकियों, हाथी-घोड़े पर बैठकर स्नान के लिए पहुंचते हैं. सब अपनी-अपनी शक्ति और वैभव का प्रदर्शन करते हैं. इसे राजयोग स्नान भी कहा जाता है, जिसमें साधु और उनके अनुयायी पवित्र नदी में तय वक्त पर डुबकी लगाते हैं. माना जाता है कि शुभ मुहूर्त में डुबकी लगाने से अमरता का वरदान मिल जाता है. यही वजह है कि ये कुंभ मेले का अहम हिस्सा है और सुर्खियों में रहता है. शाही स्नान के बाद ही आम लोगों को नदी में डुबकी लगाने की इजाजत होती है.

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ये स्नान तय दिन पर सुबह 4 बजे से शुरू हो जाता है. इस वक्त से पहले अखाड़ों के साध-संतों का जमावड़ा घाट पर हो जाता है. वे अपने हाथों में पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र लिए होते हैं, शरीर पर भभूत होती है और वे लगातार नारे लगाते रहते हैं. मुहूर्त में साधु न्यूनतम कपड़ों में या फिर निर्वस्त्र ही डुबकी लगाते हैं. इसके बाद ही आम जनता को स्नान की इजाजत मिलती है.

मेले में अखाड़ों के शाही स्नान का एक विशेष क्रम होता है (Photo- news18 English via PTI)


मेले में अखाड़ों के शाही स्नान का एक विशेष क्रम होता है. शाही स्नान में सबसे पहले जूना, आह्वान और अग्नि अखाड़ा स्नान करेंगे. उसके बाद निरंजनी और आनंद अखाड़ा गंगा में आस्था की डुबकी लगाएंगे. इसके बाद महानिर्वाणी और अटल अखाड़े के साधु-संत हरकी पैड़ी के ब्रह्मकुंड पर कुंभ स्नान करेंगे.

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कोरोना संक्रमण के चलते इस बार स्थानीय प्रशासन ने खास गाइडलाइन जारी की है, जिसका पालन आम लोगों से लेकर साधु-संत भी करेंगे ताकि महामारी का ग्राफ ऊपर न जाए. पहले सभी श्रद्धालुओं से कोविड-19 निगेटिव का सर्टिफिकेट लाने को कहा गया था, हालांकि कई मीटिंग्स के बाद ये नियम हटा दिया गया लेकिन दूसरे नियमों में कोई ढील नहीं दी जाएगी.
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