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Explained : क्या है सिस्टर अभया केस और क्यों फैसले में लग गए 28 साल?

Kanpur news: कानपुर में इस साल हत्‍या की 91 घटनाएं हुई हैं. (न्यूज़18 कार्टून)

Kanpur news: कानपुर में इस साल हत्‍या की 91 घटनाएं हुई हैं. (न्यूज़18 कार्टून)

​बतौर चश्मदीद गवाह (Eye-Witness) एक चोर की गवाही को बड़ा आधार मानकर सीबीआई कोर्ट (CBI Court) ने 1992 के उस हत्याकांड मे ...अधिक पढ़ें

    केरल के कोट्टयम में 27 मार्च 1992 को सेंट पायस कॉन्वेंट के कुएं से एक कैथोलिक नन अभया की लाश (Sister Abhaya Case) मिली थी. शुरूआती जांच के बाद इसे आत्महत्या करार देकर स्थानीय पुलिस ने मामला रफा दफा करने की खानापूरी की. लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट (Post-Mortem Report) में लाश पर घाव के निशानों और प्रमाणों की पुष्टि हुई तो बाद में केस में दलीलों और सबूतों के खुलासे के साथ सीबीआई जांच (CBI Investigation) में हत्या की थ्योरी सामने आई. केरल में सबसे लंबे चलने वाले मर्डर केस में 28 साल बाद फैसला आया, तो केस फिर चर्चा में है.

    केरल की स्पेशल सीबीआई कोर्ट (CBI Court) ने 28 साल पुराने सिस्टर अभया मर्डर केस (Abhaya Murder Case) में हत्या के दोषी एक पादरी फादर थॉमस कोट्टूर और एक नन सिस्टर सेफी को उम्रकैद की सज़ा सुनाई. क्या 28 साल बाद आरोपी को सज़ा देना न्याय माना जाए? यह एक अलग बहस है, फिलहाल हम आपको इस केस और फैसला आने में लगे इतने लंबे समय के बारे में बताते हैं.

    यहां पढ़ें :- सिस्टर अभया केस की पूरी कहानी

    कौन थी अभया और क्यों मारी गई?
    अभया 19 साल की लड़की थी जो प्री डिग्री कोर्स के लिए कोट्टयम के सेंट पायस कॉन्वेंट में रह रही थी. जब 1992 में उसकी लाश कुएं से मिली तो लोकल पुलिस और केरल की क्राइम ब्रांच ने इसे खुदकुशी बताकर केस फाइल बंद कर दी. लेकिन जोमोन पुथेनपुरक्कल समेत कई एक्टिविस्ट और लोग इस केस में हुई खानापूरी के खिलाफ न्याय की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन पर उतरे.

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    अभया केस में आरोपी फादर कोट्टूर और सिस्टर सेफी को अदालत ने सज़ा सुनाई.


    सीबीआई जांच 1993 में शुरू हुई और 15 साल तक जांच चलती रही. सीबीआई अफसरों के 13 बैचों ने इस केस की जांच की. समय के साथ कई तरह की थ्योरियां इस केस में सामने आती रहीं. लेकिन अभया के मारे जाने की वजह की सबसे चर्चित थ्योरी यह रही कि उसने पादरी और नन को आपत्तिजनक हालत में देख लिया था, जिसके चलते उसकी जान ले ली गई और सबूत मिटाने की कोशिश कर केस का रुख मोड़ने की कोशिश की गई.

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    सीबीआई जांच के 27 साल
    साल 1993 में सीबीआई जांच की शुरूआत हुई थी. पहली 3 रिपोर्टों में कहा गया कि हत्यारों को पहचान पाना मुमकिन नहीं है क्योंकि सारे सबूत मिटा दिए गए. कोर्ट ने इन रिपोर्टों को खारिज कर फिर सीबीआई की केरल ब्रांच से जांच करवाई. आखिरकार वो चार्जशीट सामने आई, जिसमें हत्या और सबूत मिटाने के आरोपियों के तौर पर फादर कोट्टूर, फादर जोस और सिस्टर सेफी का नाम लिया गया. इनकी गिरफ्तारी भी 2008 में हुई थी.

    चार्जशीट के मुताबिक जब अभया ने तीनों आरोपियों को सुबह 4 बजे आपत्तिजनक हालत में देखा था, तब कोट्टूर ने अभया का गला घोंटा, सेफी ने कुल्हाड़ी से हमला किया और फिर तीनों ने मिलकर अभया को कुएं में फेंक दिया. इसके बाद सबूत मिटाने की पूरी खिचड़ी पकाई गई. यही नहीं, सबूत मिटाने में 1992 में केस के जांच अधिकारी रहे क्राइम ब्रांच के एसपी केटी माइकल का नाम भी आया.

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    साल 2009 में सीबीआई ने 177 गवाहों के नाम बताए, तीनों आरोपियों के नार्को टेस्ट भी हुए, लेकिन उस वक्त नार्को टेस्ट की रिपोर्ट कोर्ट में बतौर सबूत पेश नहीं की जा सकती थी. यहां से केस के जज के नज़रिये पर भी सवाल खड़े हुए और दूसरी अदालत में सुनवाई की मांग भी हुई. इस पूरी कार्यवाही में वक्त बीतता चला गया.

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    प्रतीकात्मक तस्वीर


    फैसले में सालों लगने के पीछे ये रहीं वजहें
    आखिरकार 2018 में माइकल को भी चार्जशीट में आरोपी बनाया गया और उसी साल ट्रायल कोर्ट ने फादर जोस को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया. 2019 में सीबीआई कोर्ट में ट्रायल शुरू हुआ और अब 2020 में इस केस में फैसला आया.

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    इस पूरे समय में सीबीआई के 177 गवाहों में से कई की या तो मौत हो गई या वो बयान से पलट गए. उदाहरण के तौर पर अभया के माता और पिता का निधन 2016 में हुआ. केस की प्रमुख गवाह और कॉन्वेंट की प्रमुख मदर सिस्टर लीजियक्स की मौत भी हो गई. इसी तरह मौका ए वारदात के पास चौकीदार रहे एस दास की भी मौत हुई. वहीं, करीब 9 गवाहों के बयान से मुकरने की बात भी सामने आई.

    दूसरी तरफ, यह केस सीबीआई की कई टीमों, पुलिस और क्राइम ब्रांच के आपसी टकराव में भी घिरा रहा. यही नहीं, चर्च के दबाव संबंधी खबरें भी रहीं और जज व सीबीआई जांच टीम के बीच भी गतिरोध आते रहे. इन तमाम वजहों से केस में फैसला आने में 28 सालों का वक्त लगा. एक बड़ा वर्ग "Justice Delayed is Justice Denied" के सिद्धांत को मानता है, जिस पर विचार किया जाना ज़रूरी है.

    Tags: Brutal Murder, CBI investigation, Kerala

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