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Explained: अंतरिक्ष का रेडिएशन कितना खतरनाक है, क्या बदलता है शरीर में?

अंतरिक्ष की विकिरणों पर नासा का ह्यूमन रिसर्च प्रोग्राम (HRP) लगातार शोध कर रहा है- सांकेतिक फोटो (pixabay)
अंतरिक्ष की विकिरणों पर नासा का ह्यूमन रिसर्च प्रोग्राम (HRP) लगातार शोध कर रहा है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

अंतरिक्ष में हर समय खतरनाक विकिरणें (space radiation) निकलती रहती हैं, जिससे वहां का तापमान -200 से लेकर +300 डिग्री फैरनहाइट तक चला जाता है. इसका सीधा संपर्क बेहद घातक है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 19, 2021, 4:07 PM IST
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कई बार सूर्यग्रहण के दौरान चेतावनी आती है कि सूरज की तरफ सीधा देखना टालें वरना इसकी रेडिएशन आंखों पर असर डाल सकती है. सूरज से दूर अपने ग्रह में होने के बाद भी उसका असर खतरनाक माना जाता है तो कभी सोचा है कि अंतरिक्ष की रेडिएशन अंतरिक्ष यात्रियों पर क्या असर डालती होगी! बेहद घातक इन विकिरणों पर नासा (NASA) का ह्यूमन रिसर्च प्रोग्राम (HRP) लगातार शोध कर रहा है.

क्या हुआ बीते साल में
साल 2020 स्पेस साइंस के क्षेत्र में कई उपलब्धियां लेकर आया. इसी दौरान नासा और एलन मस्क की स्पेस कंपनी ने मिलकर चांद पर जीवन की तलाश में कई खोजों कीं. इधर चीन भी कहां पीछे रहने वाला था. उसने चांद की सतह का नमूना लाने में सफलता पाई. हालांकि ये सैंपल धरती पर लाना खतरे से खाली नहीं था. सैंपल में रेडिएशन से लेकर वायरस कुछ भी हो सकता है.

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होता है सेफ्टी प्रोटोकॉल 


इसे ही देखते हुए नासा के एक पूर्व वैज्ञानिक ने चीन को चेताते हुए कहा था कि सैंपल लाने के बाद उसे क्वारंटाइन करना चाहिए, वरना किसी भयानक बीमारी का खतरा हो सकता है. इन्हीं खतरों को देखते हुए अंतरिक्ष में जाने और वहां से कुछ लेकर लौटने का एक खास सेफ्टी प्रोटोकॉल होता है.

space radiation
स्पेस में पाए जाने वाली तमाम चीजों, जैसे ग्रहों, स्टेरॉइ़ड, सैटेलाइट से मिलकर इसका तापमान बनता है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


ये नियम बनाया गया
साल 1967 में Outer Space Treaty के तहत ये फैसला लिया गया था कि स्पेस से कोई भी चीज नहीं लाई जाएगी जिससे धरती में किसी गड़बड़ी का खतरा हो. यही वजह है कि साल 1969 में चंद्रमा से आए सभी 11 अंतरिक्ष यात्रियों को तुरंत ही डीकंटेमिनेशन चैंबर में बंद कर दिया गया, जहां वे तीन हफ्तों तक रहे. इसका मकसद ये पता लगाना था कि कहीं उनपर किसी रेडिएशन का असर तो नहीं हो गया.

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अंतरिक्ष यात्री कैसे करते हैं बचाव
स्पेस रेडिएशन को लेकर ये डर तब है जबकि अंतरिक्ष यात्री इससे बचने की हरसंभव तैयारी के साथ होते हैं. अगर आपने ध्यान दिया हो तो पाएंगे कि स्पेस भेजे जा रहे सैटेलाइट हमेशा सोने में लिपटे हुए दिखते हैं. कई बार इसपर चांदी की परत भी दिखाई देती है. इसके पीछे एक खास मकसद होता है. दरअसल सोने की परत सैटेलाइट को अंतरिक्ष में होने वाले बेहद खतरनाक रेडिएशन से बचाती है.

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अंतरिक्ष यात्री अपनी तरफ से इससे बचने की हरसंभव तैयारी के साथ होते हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)


क्यों निकलती रहती हैं विकिरणें
असल में स्पेस का अपना कोई तापमान नहीं है. ये न तो ठंडा है और न ही गर्म, बल्कि इसमें पाए जाने वाली तमाम चीजों, जैसे ग्रहों, स्टेरॉइ़ड, सैटेलाइट से मिलकर इसका तापमान बनता है. इसी वजह से स्पेस में हर वक्त खतरनाक रेडिएशन निकलती रहती हैं. ये रेडिएशन स्पेस में तापमान को -200 फैरनहाइट से लेकर +300 डिग्री फैरनहाइट तक ले जाता है. ऐसे में अगर इंसान इसके संपर्क में आए तो उसकी जान जाने में कुछ ही पल लगेंगे. सैटेलाइट भी रेडिएशन के असर से खत्म हो सकते हैं. यही कारण है कि उसकी सतह पर सोने की परत होती है.

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कैसे तैयार होती है शील्ड
ये एक तरह का इंसुलेटर होता है जो ढेर सारी पतली-पतली परतों से बना होता है. ये अपने भीतर किसी बाहरी एनर्जी को आने नहीं देता. इससे स्पेस क्राफ्ट किसी थर्मल रेडिएशन से सुरक्षित रहता है. हालांकि सोने की तरह दिखने वाली ये परतें सोने की नहीं होती हैं, बल्कि ये एक तरह का प्लास्टिक होती हैं, जिसे polyimide कहते हैं. इसकी कई परतें मिलकर सैटेलाइट और अंतरिक्ष यात्रियों दोनों को थर्मल रेडिएशन से सुरक्षित रखती हैं. इसके अलावा पॉलीएथिलिन (polyethylene) की शील्ड भी इस्तेमाल होती है, जो विकिरणों से बचाती है.

space radiation astronaut
इन विकिरणों का असर शरीर में DNA में बदलाव लाता है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


क्या बदलता है शरीर में 
इस सारी सुरक्षा के बाद भी रेडिएशन का हल्का-फुल्का असर हो सकता है. डरावनी बात ये है कि स्पेस का हल्का-फुल्का रेडिएशन भी कई गंभीर बीमारियां ला सकता है. जैसे इन विकिरणों का असर शरीर में DNA में बदलाव लाता है, जिससे कैंसर जैसी बीमारियां हो सकती हैं. दिल की बीमारियां भी हो सकती हैं. विकिरणों के कारण न्यूरोजेनेसिस की प्रक्रिया में रुकावट आती है. इससे शख्स के दिमाग में नई कोशिकाएं बननी बंद हो जाती हैं. इससे याददाश्त भी जा सकती है या मस्तिष्क से जुड़ी बीमारियों का खतरा रहता है.

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ये जीव स्पेस रेडिएशन को सह पाता है
वैसे मजेदार बात ये है कि एक जीव स्पेस के रेडिएशन को भी सह जाता है. इस जीव को वॉटर बीयर या टार्डिग्रेड्स भी कहते हैं. टार्डिग्रेड्स इतने मजबूत होते हैं कि अंतरिक्ष की जानलेवा रेडिएशन भी इनपर बेअसर होती है. ये अंतरिक्ष के वैक्यूम, जहां हवा न होने और कॉस्मिक किरणों के कारण कोई भी जिंदा नहीं रह पाता, वहां भी सर्वाइव कर जाते हैं. ये बात यूरोपियन स्पेस एजेंसी (European Space Agency) के प्रयोग में निकलकर आई. टार्डिग्रेड को अब मेडिकल साइंस में भी आजमाने की बात हो रही है. हो सकता है कि इसकी मदद से से कोई नई खोज की जा सके.
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