आपकी जेब से मानसून का क्या है कनेक्शन?

जून-सितंबर के मानसून से देश को वार्षिक वर्षा का लगभग 70 फीसदी हिस्सा मिलता है, इसका फायदा 26 करोड़ किसानों को मिलता है.

News18Hindi
Updated: April 17, 2018, 3:16 PM IST
आपकी जेब से मानसून का क्या है कनेक्शन?
जून-सितंबर के मानसून से देश को वार्षिक वर्षा का लगभग 70 फीसदी हिस्सा मिलता है, इसका फायदा 26 करोड़ किसानों को मिलता है.
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Updated: April 17, 2018, 3:16 PM IST
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) का का कहना है कि 2018 दक्षिण पश्चिम मानसून के 'सामान्य' होने की उम्मीद है. आईएमडी का ये भी मानना है कि सामान्य मानसून से हाल के दिनों में खेती में जो उतार-चढ़ाव आए हैं, उनसे उबरा जा सकेगा.

2017 में बारिश सामान्य से नीचे हुई थी, हालांकि मौसम विभाग ने पिछले साल भी सामान्य मानसून का अनुमान लगाया था.

दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून के लिए अपना पहला पूर्वानुमान जारी करते हुए, भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने कहा है कि जून-सितंबर में लंबी अवधि के लिए औसत मानसून 97 फीसदी एलपीए अनुमानित किया गया है.

क्या होता है एलपीए

एलपीए 1951 से 2000 तक देशभर में औसत बारिश है, एलपीए का 96-104 प्रतिशत तक होना सामान्य मानसून का सूचक होता है.
सामान्य मानसून न केवल कृषि क्षेत्र में विकास में सहायता करेगा, लेकिन महत्वपूर्ण राज्य चुनावों से पहले ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है जिसके बाद 2019 में आम चुनाव होने हैं.

अर्थव्यवस्था के लिए क्यों ज़रूरी है मानसून?
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- भारत की कृषि निर्भर दो खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था के लिए बारिश किसी अमृत से काम नहीं है. देश में आधी से ज़्यादा खेती बारिश पर निर्भर रहती है. जून-सितंबर के मानसून से देश को वार्षिक वर्षा का लगभग 70 फीसदी हिस्सा मिलता है, इसका फायदा 26 करोड़ किसानों को मिलता है.
- लगभग 80 करोड़ लोग गांवों में रहते हैं. पूरी तरह से कृषि या इससे जुड़े कामों पर निर्भर हैं. ये भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 15 फीसदी है. खराब मानसून से देश के विकास और अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव पड़ता है.
- सामान्य और अच्छी तरह से वितरित मानसून कृषि उत्पादन और किसानों की आय को बढ़ा देता है. इससे ग्रामीण बाजारों में औज़ारों और मोटर वाहन उत्पादों की मांग बढ़ जाती है.
- इसका असर देश की अर्थव्यवस्था की सेहत पर भी पड़ता है. अच्छी अर्थव्यवस्था का मतलब है देश में खुशहाली और विकास की गाड़ी का पटरी पर दौड़ना.
- जलाशय भर जाते हैं
- पर्याप्त जलाशयों और बांधों में पानी होने से बिजली उत्पादन पर सकारात्मक असर पड़ता है. जल विद्युत परियोजनाओं पर भी बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है.

हर फसल के लिए जरूरी है मानसून
रबी सीजन (नवंबर-फरवरी) की तुलना में खरीफ सीजन (जून से सितंबर) तक भारत को अपने कृषि उत्पादों का करीब 53 फीसदी हिस्सा खरीदता है, जहां उत्पादन लगभग 47 फीसदी है. भारत को अपने कृषि उत्पादों का करीब 53 फीसदी हिस्सा खरीफ फसलों से मिलता है जबकि 47 फ़ीसदी रबी की फसलों से. रबी फसलों के लिए भी मानसून उतना ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका भूजल पर प्रभाव पड़ता है और जलाशय रबी की फसल की सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण हैं.

हाल के रुझान क्या दर्शाते हैं ?
भारत में 2016 में सामान्य मानसून आया लेकिन 2014 और 2015 में दो लगातार खराब मानसून के बाद ही देश का समग्र विकास प्रभावित हुआ.

खराब मानसून से क्या होता है?
- मानसून का देश के कृषि जीडीपी पर सीधा प्रभाव पड़ता है. प्रमुख खरीफ या गर्मियों में रोपे जाने वाले चावल, गन्ना, दालों और तिलहन जैसे फसलों की शुरुआत जून में मानसून के आने से होती है.
- ग्रीष्मकालीन फसलों से पूरे भारत के लिए लगभग आधा भोजन उत्पादन होता है. देरी या खराब मानसून का मतलब है देश में पर्याप्त खाद्य आपूर्ति नहीं होगी और दाम बढ़ेंगे.
- खाद्य मुद्रास्फीति में तेजी आएगी.
- पूरी सप्लाई चैन बिखर जाती है.
- खाद्य मुद्रास्फीति में तेजी रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया की ब्याज दरों को प्रभावित करती है.
- सूखे जैसी स्थिति पैदा होती है, जिससे ग्रामीण घरेलू आय, खपत और आर्थिक विकास प्रभावित होता है.
- खराब मानसून से उपभोक्ता वस्तुओं, दोपहिया वाहनों, ट्रैक्टरों और ग्रामीण आवास क्षेत्रों की मांग कमजोर पड़ जाती है. इससे आवश्यक दालें और खाने की बहुत सी चीजों का आयात बढ़ जाता है.
- ये स्थिति सरकार को कृषि ऋण छूट जैसे उपाय के लिए मजबूर करती है, इससे वित्तीय दबाव बढ़ता है.

अच्छे मानसून से बाढ़ का भी ख़तरा
बाढ़ का प्रभाव सबसे ज्यादा किसानों पर होता है क्योंकि फसल पूरी तरह बर्बाद हो जाती है. फसल तबाह होने से किसान बैंकों से लिया कर्जा चुका नहीं पाते और आत्महत्या का प्रयास करते हैं. खेतों में मिट्टी के कटाव से जमीन बंजर हो जाती है जिससे किसान भविष्य में उस जमीन पर खेती नहीं कर पाते. भयंकर बाढ़ आने से सरकार का भी खजाना खाली हो जाता है क्योंकि राहत कार्य चलाने के लिए सरकार को मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है. बाढ़ के कारण सड़क एवं सरकारी संपत्तियों का भी भारी नुकसान होता है. बार बाढ़ आने से विकास भी बुरी तरह प्रभावित होता है.
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