जमात-ए-इस्लामी क्या है और भारत सरकार इस पर क्यों कर रही कड़ी कार्रवाई

कई बार यह संगठन चुनावों में भी भाग ले चुका है लेकिन इसे कोई खास सफलता नहीं मिली थी.

News18Hindi
Updated: February 25, 2019, 7:03 PM IST
जमात-ए-इस्लामी क्या है और भारत सरकार इस पर क्यों कर रही कड़ी कार्रवाई
प्रतीकात्मक तस्वीर
News18Hindi
Updated: February 25, 2019, 7:03 PM IST
आकाश हसन

जमात-ए-इस्लामी ऐसा पहला संगठन है जिसने इस्लाम की आधुनिक संकल्पना के आधार पर एक विचारधारा को तैयार किया. पुलवामा में 19 साल के कश्मीरी लड़के आदिल डार ने अपनी गाड़ी को सीआरपीएफ के काफिले में घुसाकर उड़ा दिया था. इस हमले में पैरामिलिट्री के 40 जवान शहीद हो गए थे. इसके करीब एक हफ्ते बाद भारत सरकार ने कश्मीर में अलगाववादियों और जमात-ए-इस्लामी पर कड़ी कार्रवाई की है.

पिछले दो दिनों में रात को अचानक की गई रेड्स में करीब 150 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. जिनमें से ज्यादातर जमात के लोग हैं और इनमें से कई उनके बड़े नेता हैं. पुलिस इन गिरफ्तारियों को आने वाले चुनावों की 'तैयारियां' बता रही है.

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जमात ने आतंक को बढ़ावा देने में सक्रिय भूमिका निभाई है. दिलचस्प बात यह है कि जमात लोकसभा और विधानसभा के चुनाव भी लड़ चुकी है और आधिकारिक रूप से किसी भी सशस्त्र विद्रोह से दूरी बनाकर रखती है.

कश्मीर में तेजी से बदलते माहौल में इस बड़े कदम को समझने के लिए, News18 इस संगठन की शुरुआत और इन गिरफ्तारियों के प्रभाव को समझाने की कोशिश कर रहा है.

जमात ए इस्लामी क्या है और कश्मीर में इसकी जड़ें कैसे जमीं?
जमात-ए-इस्लामी की स्थापना एक इस्लामिक-राजनीतिक संगठन और सामाजिक रूढिवादी आंदोलन के तौर पर ब्रिटिश भारत में 1941 में की गई थी. इसकी स्थापना अबुल अला मौदूदी ने की थी जो कि एक इस्लामिक आलिम (धर्मशात्री) और सामाजिक-राजनीतिक दार्शनिक थे. मुस्लिम ब्रदरहुड (इख्वान-अल-मुसलमीन, जिसकी स्थापना 1928 में मिस्त्र में हुई थी) के साथ जमात-ए-इस्लामी अपनी तरह का पहला संगठन था जिसने इस्लाम की आधुनिक संकल्पना के आधार पर एक विचारधारा को तैयार किया.
Loading...

मौदूदी इस बात का समर्थक था कि इस्लाम राजनीति के लिए अनिवार्य है. उनकी समझ में धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रवाद और समाजवाद पश्चिमी साम्राज्यवाद का प्रभाव थे. वे शरिया (इस्लामिक कानून) और इस्लामिक संस्कृति की रक्षा जरूरी है.

1947 में हुए भारत के विभाजन के बाद जमात भारत और पाकिस्तान में दो अलग और स्वतंत्र संगठनों में बंट गया. इनके नाम क्रमश: जमात-ए-इस्लामी हिंद और जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान रखे गए.

1947 से 1952 तक कई पढ़े-लिखे नौजवान और निचली और मध्यम स्तरीय सरकारी नौकरियों से जुड़े लोग जमात के कश्मीरी नेतृत्व की ओर आकर्षित हुए, जो कश्मीर में पाकिस्तान के विलय के समर्थक थे.

हालांकि 1952 में कश्मीर विवाद के चलते जमात-ए-इस्लामी हिंद का एक धड़ा उससे अलग हो गया. मौलाना अहरार और गुलाम रसूल अब्दुल्लाह, कश्मीर में जमात के दो बड़े नेता थे, जिन्होंने इसके संविधान का मसौदा तैयार किया.

नवंबर, 1953 में इस मसौदे को स्वीकार कर लिया गया. एक साल बाद अक्टूबर, 1954 में श्रीनगर के रहने वाले सादुद्दीन तरबली को संगठन का प्रमुख या अमीर चुना गया. तरबली जो इसी पद पर 1985 तक रहा, उसने अपने भाषणों के जरिए जमात की विचारधारा को पहले दक्षिणी कश्मीर के शोपियां और इसके बाद आस-पास के दूसरे इलाकों में फैलाना शुरू किया.

आरएसएस की तरह ही जमात एक कैडर आधारित संगठन है, जिसकी जड़ें कश्मीर में गहरी धंसी हुई हैं.

तो क्या जमात कभी राजनीति की तरफ भी झुका रहा है?
तरबली के वक्त में, जमात ने कई सारे स्कूलों, धार्मिक ट्रस्टों का निर्माण कराया था ताकि वे अपनी गतिविधियों का विस्तार कर सकें और इलाके की एक बड़ी राजनीतिक शक्ति के तौर पर उभर सकें.

1971 के आम चुनावों में जमात ने यह सोचकर भाग लिया था कि चुनावों के माध्यम से अपनी विचारधारा को फैलाने में उन्हें आसानी होगी और कानून के जरिए वे अपनी मांगों को लेकर ज्यादा दबाव बना सकेंगे.

लेकिन यह एक भी सीट नहीं जीत सकी थी, जिसके बाद जमात की ओर से चुनावों में भारी हेराफेरी किए जाने के आरोप लगाए गए थे.

1972 में जमात ने इस विचार को टक्कर देने के लिए विधासभा चुनावों में हिस्सा लिया कि राजनीति और धर्म अलग-अलग होते हैं और जिन 22 सीटों पर इसने चुनाव लड़ा था, उसमें से 5 सीटें जीतने में सफल रही. फिर से जमात की ओर से बड़े स्तर पर हेराफेरी के आरोप लगाए गए और यह आरोप भी लगाया गया कि इलेक्शन के दौरान उसके कई सारे प्रत्याशियों को सताया भी गया.

1975 में इंदिरा-शेख संधि के बाद जब शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने और उन्होंने जम्मू-कश्मीर के लोगों को स्वायत्तता देने की अपनी मांग छोड़ दी, जमात उस दौर में अपने शेख विरोधी रुख के चलते और भी ज्यादा लोकप्रिय बना.

एक कश्मीरी रिसर्च स्कॉलर ईमन माजिद कहते हैं, इसके बाद जमात के अलावा कोई और बड़ा संगठन कश्मीर की स्वायत्तता की बात नहीं कर रहा था, जिसके बाद शेख ने इसे नियंत्रित करने का प्रयास किया था.

इन गिरफ्तारियों से क्या फायदा होगा?
हालांकि जमात सीधे सशस्त्र विद्रोह से हमेशा दूर रहता है लेकिन सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि जमात की संरचना का प्रयोग कश्मीर में पाकिस्तान के पक्ष में और आंतकी गतिविधियों के लिए किया जाता है.

जम्मू और कश्मीर पुलिस के पूर्व डायरेक्टर जनरल के राजेंद्र मानते हैं, "उनके अंदर राष्ट्रविरोधी भावनाएं हैं और यही कश्मीर की समस्याओं की जड़ है."

राजेंद्र ने न्यूज18 को बताया, "उनके (जमात के) खिलाफ एक्शन तो लिए गए थे लेकिन सरकार इसे लेकर गंभीर नहीं थी और इसके लिए किए गए प्रयास भी पूरे मन से नहीं किए गए थे."

कश्मीर पुलिस के अधिकारियों ने न्यूज18 को बताया सुरक्षा व्यवस्था के ज्यादातर लोगों का मनाना है कि ज्यादातर आतंकी जमात की विचारधारा से ही प्रभावित होते हैं और कश्मीर में होने वाले गुस्साई भीड़ के प्रदर्शनों के लिए भी ज्यादातर ये नेता ही जिम्मेदार होते हैं.

एक बड़े पुलिस अधिकारी ने अपना नाम न छापने की शर्त पर न्यूज18 को बताया, "ये लोग (जमात के नेता) आतंकियों के अंतिम संस्कार में जाते हैं और लोगों को संबोधित करते हैं. जमात के लोग असल में जमीनी स्तर पर लोगों में आतंकी विचारों को भरने के लिए प्लान बनाते हैं."

लेकिन कश्मीरी विद्वान डॉ शेख शौकत कहते हैं कि इतने बड़े स्तर पर जमात के लोगों की गिरफ्तारी व्यर्थ ही जाएगी.

वे कहते हैं, "ऐसी कड़ी कार्रवाईयां पहले भी हो चुकी हैं लेकिन इसके बावजूद भी यह बचने में कामयाब रहा है. दरअसल हर बार जब इसपर शिकंजा कसा गया है, यह और भी ज्यादा प्रभाव के साथ बढ़ा है."

उन्होंने नेताओं को उठाया है लेकिन जमात की संरचना बहुत बड़ी है. यह बहुत मजबूत है और वह ऐसी परिस्थितियों में काम करने का अभ्यस्त है. यह एक कैडर आधारित संगठन है और यह कभी भी बिना नेतृत्व के नहीं रहता. इसका एक वरीयता क्रम बना हुआ है, जो अपने आप रिक्त स्थान को भर देता है."

डॉ शौकत मानते हैं कि जमात पर इस कार्रवाई ने परिस्थितियों को और भी खराब बना दिया है. संभव है कि यह कदम उल्टा साबित हो जाए. इससे बड़ी संख्या में कश्मीरियों के अंदर जमात के लिए सहानुभूति पैदा हो सकती है और राजनीतिक नेताओं के प्रति उनका अविश्वास और बढ़ सकता है.

यह भी पढ़ें: आर्टिकल 35A पर आखिर क्यों मचा है हंगामा? जानें पूरा मामला

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए देश से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: February 25, 2019, 5:56 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...