Explained: आखिर आंसू कैसे और क्यों आते हैं?

रोने के पीछे पूरा विज्ञान काम करता है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

क्या प्याज काटने पर आने वाले आंसू और भावनाओं के उफान पर आए आंसू एक-से होते हैं? किसान नेता राकेश टिकैत (farmer leader Rakesh Tikait) के आंसुओं के बीच एक बार आंसुओं का विज्ञान समझते चलें.

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    लगभग दो महीने से दिल्ली बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन में बीते कुछ दिनों में कई नाटकीय घटनाएं हुईं. गणतंत्र दिवस पर मचे बवाल के बाद किसान एकाएक बैकफुट पर थे कि तभी किसान नेता राजेश टिकैत के आंसुओं ने पूरी तस्वीर बदल दी. अब आंदोलन नए सिरे से परवान चढ़ चुका है. इस बीच ये दिखता है कि चाहे वो स्थानीय नेता हों या फिर वर्ल्ड लीडर, सार्वजनिक तौर पर सभी बड़े नेता कई बार रो पड़े हैं.

    रोना क्यों आता है?
    रोने के पीछे पूरा विज्ञान काम करता है. आंसू केवल किसी दुख, परेशानी या बेहद खुशी के मौके पर ही नहीं आते, बल्कि ये किसी खास गंध या चेहरे पर तेज हवा के लगने जैसी घटनाओं पर भी आते हैं. जैसे प्याज काटने पर आंसुओं का आम है. ये आंसू बिल्कुल वही प्रॉपर्टी लिए होते हैं, जो दुख या किसी एक्सट्रीम इमोशन के समय आने वाले आंसू. लेकिन बगैर किसी भावना के आने वाले आंसुओं की श्रेणी अलग है. इसे लेक्रिमेशन कहते हैं यानी बगैर भावनात्मक दबाव के आंसू आना.

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    आंसुओं के जरिए हम बताते हैं कि हमें मदद की जरूरत है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


    आंसुओं का आना एक खास प्रक्रिया है
    इसके लिए लेक्रिमल ग्लैंड काम करती है, जो आईबॉल और आईलिड के बीच होती है. अगर आंसू बहुत तेजी से और ज्यादा देर तक आते रहें तो ग्लैंड ये दबाव बांट देती है. यही कारण है कि तेजी से रोने पर आंखों के साथ-साथ नाक भी बहने लगती है. ये भी आंसू ही होते हैं लेकिन नाक से गुजरने के कारण म्यूकस के कारण चिपचिपे लगने लगते हैं.

    कैटेगरी में बांटा गया
    वैसे वैज्ञानिक आंसुओं को कई श्रेणियों में रखते हैं लेकिन तीन मोटी श्रेणियां मानी जाती हैं. पहली श्रेणी है बेसल. ये नॉन-इमोशनल आंसू हैं, जो आंखों को सूखा होने से बचाते हैं और स्वस्थ रखते हैं. दूसरी श्रेणी में भी नॉन-इमोशनल आंसू ही आते हैं, जो किसी खास गंध पर प्रतिक्रिया से आते हैं. जैसे प्याज काटने या फिनाइल जैसी तेज गंध पर आने वाले आंसू.

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    क्यों रो पड़ते हैं
    आंसुओं की तीसरी श्रेणी ही वो है, जिसपर हमेशा चर्चा होती रही. इसे क्राइंग आंसू कहते हैं. ये भावनात्मक प्रतिक्रिया के तौर पर आते हैं. ये कैसे काम करता है, इसे थोड़ा समझते हैं. हमारे मस्तिष्क में एक लिंबिक सिस्टम होता है. ये वही हिस्सा है, जिसमें ब्रेन का हाइपोथैलेमस होता है. ये नर्वस सिस्टम से सीधे संपर्क में रहता है. इसी सिस्टम का न्यूरोट्रांसमिटर संकेत देता है और किसी भावना के एक्सट्रीम पर हम रो पड़ते हैं. ये केवल दुख ही नहीं, बल्कि गुस्सा या डर भी हो सकता है.

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    ये नॉन-इमोशनल आंसू हैं, जो आंखों को सूखा होने से बचाते हैं और स्वस्थ रखते हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)


    आखिर हमारा मस्तिष्क किसी खास समय पर रोने को क्यों कहता है?
    ये नॉन-वर्बल संवाद का एक तरीका है, जिसमें आंसुओं के जरिए हम बताते हैं कि हमें मदद की जरूरत है. मनोवैज्ञानिक इस बात पर भी लगातार जोर देते रहे हैं कि भावनाओं के उबाल में रोना अच्छा होता है. इससे आंखें ही नहीं, बल्कि हमारा मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है.

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    नॉन-वर्बल संवाद 
    बच्चे अक्सर अपने पेरेंट्स का ध्यान खींचने के लिए रोते हैं. तो इस तरह से ये तो साफ है कि रोना नॉन-वर्बल संवाद का एक रूप है. बच्चे जब भाषा नहीं जानते हैं तो इस तरह से अपनी जरूरतें जताते हैं. लेकिन एक सवाल ये भी आता है कि क्या पुरुषों-महिलाओं में महिलाएं ज्यादा रोती हैं? अगर हां तो ऐसा क्यों है?

    अमीर देशों की महिलाएं ज्यादा रोती हैं 
    इसपर साल 2011 में एक दिलचस्प स्टडी हुई. क्रॉस कल्चरल रिसर्च के तहत हुई इस स्टडी में 35 देश शामिल हुए. इनमें विकसित और विकासशील दोनों ही देश थे. इस दौरान देखा गया कि विकसित यानी अमीर मुल्कों की महिलाएं, जैसे अमेरिका, स्वीडन और फ्रांस की महिलाएं ज्यादा रोती हैं. वहीं गरीब देशों की महिलाएं कम रोती दिखीं. शोधकर्ताओं ने माना कि इसकी वजह अभिव्यक्ति की आजादी है. अमीर देशों में महिलाएं बोलने के अलावा संवाद के लिए नॉन-वर्बल तरीके भी खुलकर इस्तेमाल करती हैं, जबकि विकासशील देशों में औरतों के पास ये आजादी नहीं.

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    बच्चे जब भाषा नहीं जानते हैं तो रोकर अपनी जरूरतें जताते हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)


    दुनियाभर के नेता रोते आए हैं 
    रोने के साथ एक और बात ये भी है कि अब वर्ल्ड लीडर्स सार्वजनिक तौर पर खुलकर रोने लगे हैं. अमेरिका का वाइट हाउस जनता के सामने रो पड़ने वाले लीडरों का गढ़ साबित हो चुका है. भूतपूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अपने एक इंटरव्यू में माना था कि वे यहां आने के बाद से काफी रो चुके हैं. उन्होंने कहा था कि वे इतने आंसू गिरा चुके हैं, जो कोई गिन नहीं सकता. यही हाल वाइट हाउस के बहुत से लीडरों का है. जैसे पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को ही लें तो वे कई बार जनता के सामने रोए.

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    नेताओं के रोने को मनोवैज्ञानिक खास अच्छा नहीं मानते
    पेनसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की प्रोफेसर एलिशिया ग्रांडे कहती हैं कि हम सभी अपने नेता को आत्मविश्वास से भरा हुआ और मजबूत देखना चाहते हैं. ऐसे में जनता के सामने रो पड़ने पर उनकी छवि कमजोर इंसान की बन सकती है, जो उन्हीं के लिए बेहतर नहीं. इसी तरह से दफ्तरों में रोने को काफी बुरी नजर से देखा जाता रहा है. कोई शख्स काम के दौरान रो पड़े तो उसे सहकर्मियों से कमजोर माना जाता है.

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