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ट्रंप तो चले जाएंगे, लेकिन रह जाएगी ‘ट्रंपियत’! क्या है ये बला?

न्यूज़18 कार्टून
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कहते हैं कि आप लोगों को बेहतर नहीं कर सकते, बस उन्हें बेहतर फील करवा सकते हैं. यहीं से आप लोगों के मन में धर्म, संस्कृति से जुड़ी भावनाएं इंजेक्ट करते हैं. जानकार मान रहे हैं कि बाइडन (Joe Biden) के सामने कई परतों वाली ‘ट्रंपियत’ बड़ा संकट खड़ा करने वाली है.

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  • Last Updated: January 20, 2021, 10:42 AM IST
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अमेरिका में 20 जनवरी ऐतिहासिक तारीख साबित होगी, जब विवादास्पद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Going President Donald Trump) व्हाइट हाउस से विदा होंगे और डेमोक्रेट पार्टी के नेता जो बाइडन राष्ट्रपति (President Joe Biden) का पद संभालेंगे. बीते चार सालों के कार्यकाल में ट्रंप ने जिस तरह की कार्यशैली विकसित की, उसे ‘ट्रंपियत’ या अंग्रेज़ी में ‘ट्रंपिज़्म’ के नाम से पुकारा जा रहा है. इस शैली की आलोचना तो खैर हो ही रही है, लेकिन ज़्यादा अहम है कि इसे कैसे समझा जाए. बड़ा सवाल यह भी है कि ट्रंप के जाने के बाद भी किस तरह ट्रंपियत अमेरिका (Trumpism in America) में बरकरार रहने वाली है और इसके क्या मायने होंगे.

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे जब सामने आए थे, तबसे ही इस बात को लेकर चर्चा रही कि ट्रंपियत का क्या होगा. यह भी कहा गया कि यह अमेरिका के लिए भविष्य में खतरा होगी और चूंकि कई और देशों तक यह स्टाइल फैल चुका है इसलिए जोखिम तो कई जगह होगा. अब जब ट्रंप की विदाई का काउंटडाउन चल रहा है, तब फिर यह सवाल अहम हो जाता है.

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आखिर क्या बला है ट्रंपियत?
अगर आप फ्लैशबैक में जाएं और ट्रंप के चार सालों के एक्शनों और शब्दों को याद करें तो आपको इसका मतलब समझने में आसानी होगी. सामान्य शब्दों में कहा जाए तो यह एक ऐसी राजनीतिक विचारधारा के लिए शब्द बन गया है जो अमेरिका में कट्टर दक्षिणपंथी सोच फैला चुकी है. इसे लोकलुभावन राष्ट्रवाद को भुनाने वाली विचारधारा के तौर पर भी समझा जाता है. हालांकि इसके कई पहलू है, जिनके बारे में ठीक से समझना चाहिए.

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इस विचार की शुरूआत 2016 से तब हुई थी जब ट्रंप राष्ट्रपति चुनाव के लिए कैंपेन शुरू कर रहे थे. तब राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक मुद्दों पर हर सवाल के जवाब में ट्रंप के पास ‘राष्ट्रवादी रुझान’ था. यानी हर मुद्दे का रुख मोड़कर उसे नस्ल और धर्म से जोड़ देने का तरीका. इमिग्रेशन पाबंदियां, व्यापार को लेकर संरक्षणवाद, अन्य देशों के मुद्दों से दूरी और अधिकार संबंधी सुधारों का विरोध, ट्रंपियत के प्रमुख लक्षणों के तौर पर सामने आते रहे.

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ट्रंपियत का मतलब यही है कि किसी खास दिन या किसी खास समय पर किसी मुद्दे पर राष्ट्रपति क्या सोच रहा है. यानी सोमवार को वो क्लाइमेट चेंज नीति के विरोध में हो सकता है, मंगलवार को उसके पक्ष में और बुधवार को फिर पुराने स्टैंड पर जा सकता है.


बीबीसी के उत्तर अमेरिका एडिटर जोन सॉपेल के लेख में ट्रंपियत की यह परिभाषा तकरीबन साफ बता देती है कि यह क्या बला है. यह इशारा भी कर देती है कि यह कितनी खतरनाक चीज़ है.

क्यों और कैसी होती है ट्रंपियत?
वास्तव में इस तरह के नज़रिये को मिल्टन फ्रीडमैन के मुद्रावादी सिद्धांत के सप्लाई पक्ष से प्रेरित बताया जाता है. इसे आसानी से ऐसे समझा जाता है कि अगर आप अमीरों पर कम टैक्स लगाएं तो शाही खज़ाने में ज़्यादा पैसा आता है. इसी तरह, आपकी विदेश नीति यही हो सकती है कि हर चीज़ को आप शीतयुद्ध के नज़रिये से ही देखें और घोषित कर दें.

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सॉपेल ने लिखा था कि अमेरिका फर्स्ट जैसे नारे ट्रंपियत विचार की ही पैदाइश होते हैं जो एक तरह का कट्टरवाद फैलाते हैं. इस तरह की व्यवस्था में प्रेस पर नियंत्रण होता है और सिर्फ सरकार या राष्ट्रपति के बारे में वही बातें सूचनाओं के तौर पर सामने आती रहती हैं, जो या तो उन्हें महान साबित करती हैं या फिर उनके नज़रिये का ही प्रचार करती हैं.

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पिछले प्रेसिडेंटों से कितनी अलग है ट्रंपियत?
ट्रंप के एडवाइज़र रह चुके जॉन बॉल्टन भी मानते हैं कि ट्रंपियत का मतलब एक ऐसा व्यक्ति होना है जिसकी कोई फिलॉसफी न हो. लोग उसे उसकी बातों से समझने की कोशिश करें तो सही मतलब समझ ही न सकें. ऐसा पहले के राष्ट्रपतियों के समय न के बराबर देखने को मिला. अमेरिका के इतिहास में सबसे महान राष्ट्रपति माने जाने वाले अब्राहम लिंकन की बात की जाए तो वो मुक्त व्यापार, खुले इमिग्रेशन, समानता, संघीय सरकार की अच्छाई बुराई को परखने और धर्म व देश को अलग रखने के हामी रहे थे.

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बर्लिन सोशल साइंस सेंटर के पीटर कैटज़ेंस्टीन मानते हैं कि लिंकन के सिद्धांतों से बहुत दूर ट्रंपियत के तीन ही मुख्य आधार हैं - राष्ट्रवाद, धर्म और नस्ल. तकरीबन सभी जानकार और विशेषज्ञ कहते हैं कि ट्रंप ने जिस तरह ‘ओबामाकेयर’ को पलट दिया और समाज के भीतर एक ऐसी हिंसात्मक प्रवृत्ति को पैदा कर दिया , जिसकी ज़रूरत ही नहीं थी, वह ट्रंपियत का एक जोखिम भरा पहलू है, जो आने वाले समय में भी मुश्किलें खड़ी करेगा.

कैसे खतरा बनेगी ट्रंपियत?
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस के लेख में कहा गया कि यह लोकलुभावन राष्ट्रवाद कई देशों में फैल चुका है. 2010 के दशक के आखिर में फैले इस नज़रिये ने संकुचित मानसिकता और अतार्किक सोच को बढ़ावा दिया. वॉक्स का हालिया लेख इस बात पर चर्चा करता है कि क्या ट्रंप फासीवादी हैं? ये तमाम सबूत हैं कि ट्रंपियत सिर्फ अमेरिका के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के लिए कितना बड़ा संकट बन गई है. इस तरह के लेख भी कम नहीं हैं, जिनमें फिर से अमेरिका को महान बनाने के बारे में चर्चा की गई है.

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दूसरी ओर, द हिंदू की मैगज़ीन फ्रंटलाइन के एक लेख में बताया गया है कि ट्रंप के जाने के बाद भी कैसे ट्रंपियत जारी रहेगी और कितना कहर बरपाएगी. इस लेख के मुताबिक ट्रंप का नस्लवाद अमेरिकी समाज के भीतर गहरे पैठ गया है, जिसके असामाजिक नतीजे पिछले दिनों कैपिटल हिल हिंसा के रूप में भी दिखे. यह आशंका भी जताई गई है कि जनवरी 2021 के बाद अमेरिका में और भी ऐसी हिंसक वारदातें हो सकती हैं. इस ज़िद्दी, दकियानूसी और हिंसक सोच से निपटना बाइडन के लिए अच्छी खासी चुनौती होगी. सभी जानकार मान रहे हैं कि बाइडन प्रशासन के लिए अमेरिका का ताज कांटों भरा ही है.
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