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क्या है वर्चुअल वाटर ट्रेड, क्यों आने वाले समय में ये टर्म ज्यादा सुनाई पड़ेगा

वर्चुअल वाटर एक खास टर्म है, जो बहुत से उत्पादकों के लिए आंखें खोलने वाला भी है.

वर्चुअल वाटर एक खास टर्म है, जो बहुत से उत्पादकों के लिए आंखें खोलने वाला भी है.

वर्ल्ड वाटर डे पर आमतौर पर हम पानी के स्रोतों की बचत और पानी की बर्बादी की बात करते हैं. लेकिन कुछ देश इस मामले में कई ...अधिक पढ़ें

वर्ल्ड वाटर डे पर पानी के संकट और भविष्य में इसके कम होते जाने की चर्चाएं तो आम हैं लेकिन पिछले कुछ सालों से पानी को ही लेकर एक खास टर्म सुनाई दे रहा है, जिसे वर्चुअल वाटर कहा जा रहा है. कुछ देशों के पास पानी है लेकिन वो अब इसको बचा रहे हैं. पानी बचाने की चालाकी और दूसरे देशों के पानी को खर्च कराने की रणनीति से ही उपजा है वर्चुअल वाटर.

वर्चुअल वाटर शब्द सुनने में अजीब लग सकता है. डिजिटल दुनिया में हमने वर्चुअल शब्द खूब सुना है. लेकिन वर्चुअल वाटर करीब 30 साल पहले चर्चा में आया. इस शब्द ने दरअसल पानी को लेकर लोगों की आंखें खोलीं. पानी और किसी उत्पाद में उसके उपयोग को लेकर एक संबंध बताया. ये संबंध आंखें खोलने वाला था, खासकर उन देशों के लिए जो बेशुमार पानी लगाकर बड़े पैमाने पर उपज की पैदावार कर रहे थे. मीट और दुग्ध उत्पादन कर रहे थे, इन्हें कौड़ियों के मोल दूसरे देशों को बेच रहे थे. उसमें हमारा देश भी है.

कई देशों ने क्यों खुद अनाज उगाना बंद कर दिया
दरअसल 90 के दशक के बाद दुनिया के बहुत से देशों ने जिनके पास बेशुमार पानी भी था और उपजाऊ जमीन भी, उन्होंने अचानक एक नीति तैयार की और अपने पानी को बचाने के लिए उन अनाज और उत्पादों का उत्पादन बंद कर दिया, जो बहुत पानी लेते थे. इसे उन्होंने दूसरे देशों से खरीदना शुरू कर दिया. इसमें अब एक नई चीज वाटर बॉटल्स भी जुड़ गई हैं.

ब्रिटिश एलेन ने बताई आंखें खोलने वाली ये बात
ब्रिटिश भूगोलवेत्ता जॉन एंथनी एलेन ने 1993 में वर्चुअल वाटर का टर्म बताया, जो आंखें खोलने वाला था. उन्होंने कहा कि जब भी कोई सामान, उत्पाद, उपज, खाद्य सामग्री या सेवा किसी को बेची या दी जाती है तो उसके साथ ये भी देखना चाहिए कि इसे तैयार करने में कितने पानी का खर्चा हुआ. ये बात नई जरूर थी लेकिन समझ में आने वाली थी.

इस पर विवाद भी हुआ
हालांकि इसे लेकर विवाद भी हुआ और अब भी होता रहता है लेकिन दुनिया को एलेन की बात समझ में आई. वहां से वर्चुअल वाटर ट्रेड टर्म ने जोर पकड़ा. बाद में वर्ष 2008 में एलेन को स्टाकहोम वाटर प्राइस भी दिया गया. अब वर्चुअल वाटर ट्रेड टर्म का इस्तेमाल ही नहीं होने लगा है बल्कि विक्रेता देश भी अपनी उपज बेचते समय ये बात भी करते हैं कि इसके उत्पादन में उन्हें कितना पानी खर्च करना पड़ रहा है.

विश्व जल दिवस (World Water Day) हर साल एक थीम के साथ मनाया जाता है.

वर्चुअल वाटर का मतलब है कि ये देखें कि किस उपज या उत्पाद या सेवा को बनाने में कितना पानी वास्तव में खर्च हुआ. (फोटो-canva.com)

अनाज उत्पादन और पानी की खपत का असमान रिश्ता
मसलन कोई देश अगर एक टन गेहूं का आयात करता है, तो गेहूं खरीदने के साथ उसके उत्पादन में लगने वाले 1300 क्यूबिक मीटर पानी की भी बचत करता है, जो मौजूदा विश्व में बहुत कीमती होता जा रहा है.
तमाम कृषि उत्पाद और उपज ऐसी हैं, जो बहुत पानी लेती हैं यानि उनके ऊपर बेतहाशा पानी खर्च होता है. इसी तरह दुग्ध उत्पादनों और फलों के साथ अन्य चीजों पर भी होता है. किसी पर कम और किसी पर ज्यादा.

क्या कर रहे हैं जापान और अमेरिका जैसे देश
जापान, मिस्र और चीन ही नहीं अमेरिका जैसे देश भी अब तमाम कृषि उपजों को खुद उगाने की जगह उसे दूसरे देशों से लेने की पॉलिसी पर आ चुके हैं या कुछ हद तक ये काम कर रहे हैं. कुछ देशों ने ऐसी तकनीक विकसित कर ली है कि कृषि उपज और फलों के साथ दुग्ध या मीट उत्पादन में किस तरह कम से कम पानी खर्च करें.

कुछ देश विकसित कर चुके हैं कम पानी में ज्यादा पैदावार
मसलन गेंहूं, चावल, कपास, दलहन, तिलहन आदि की उपज लेने में हर देश की पानी खर्च करने की मात्रा भिन्न है. आमतौर पर अमेरिका, चीन, आस्ट्रेलिया जिन उपजों या उत्पादनों को अब बहुत कम पानी में तैयार करने की तकनीक विकसित कर चुके हैं, वही भारत, मैक्सिको या कई अन्य देशों में दोगुने से तिगुने पानी में होती है. कपास, कॉफी, सोयाबीन, चावल और नारियल सबसे ज्यादा पानी लेकर तैयार होने वाले उत्पाद हैं.

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तमाम देश जिनके पास प्रचुर पानी है और उपजाऊ जमीन भी, पिछले कुछ सालों में उन्होंने भी बाहर से अनाज खरीदने की नीति अपना ली है.

मिस्र और चीन का मामला
मिस्र के पास दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी नदी नील और उसका बेशुमार पानी है और इफरात में उपजाऊ जमीन. कुछ दशक पहले तक मिस्र अपनी उपज खुद पैदा करता था लेकिन अब उसने कई वो फसलें उगानी बंद कर दी हैं जो बहुत पानी लेती थीं. इसके बदले वो उन्हें बाहर से मंगाने लगा है. इसी तरह चीन का मामला है, जिसके बाद दुनिया की तीसरी बड़ी नदी यांग्शी है, लेकिन वो भी कई मामलों में ऐसा ही कर रहा है. साथ ही उसने कई ऐसी फसलें विकसित की हैं, जो कम पानी में कई गुना ज्यादा पैदावार देने लगी हैं.

चीन तो बाहर खेती की जमीनें खरीद रहा है
फिर चीन अब खेती के लिए अफ्रीकी देशों की ओर जा रहा है. वहां उसने बेशुमार खेती की जमीन खरीदनी और फसलें उगानी शुरू की हैं. ऐसा करते हुए अब वो अपने पानी और मिट्टी की बचत कर रहा है और अफ्रीकी देशों के प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर उपभोग.

वो फसलें जो बेशुमार पानी लेती हैं
अब यहां हम उन कुछ फसलों के बारे में बताते हैं जो बेशुमार पानी लेती हैं. इसे लेकर भारत का योजना आयोग भी चिंता जाहिर कर चुका है.

धान- यह ऐसी ही एक फसल है. भारत में धान का उत्पादन काफी ज्यादा है. यहां तक कि धान दूसरे देशों में भी भेजा जाता है. ये फसल काफी ज्यादा पानी लेती है. एक किलो धान की उपज के लिए 3 से 5 हजार लीटर पानी की जरूरत होती है. फिलहाल पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, पंजाब, बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, असम, तमिलनाडु और हरियाणा में इसकी पैदावार हो रही है.

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पानी की बात करें तो 1 किलोग्राम रुई उपजाने में लगभग 22 हजार लीटर पानी लगता है. हैरानी की बात ये है कि रुई की अधिकतर फसल देश के सूखाग्रस्त इलाकों में आ रही है.

रुई- इसे व्हाइट गोल्ड के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इसकी पैदावार से काफी फायदा होता है. ये खरीफ की फसल में आता है. भारत रुई की पैदावार में भी दूसरे देशों से काफी आगे है. पानी की बात करें तो 1 किलोग्राम रुई उपजाने में लगभग 22 हजार लीटर पानी लगता है. हैरानी की बात ये है कि रुई की अधिकतर फसल देश के सूखाग्रस्त इलाकों में आ रही है. इनमें गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, हरियाणा. मध्यप्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड मुख्य हैं.

सोया- 12 मिलियन टन उत्पादन के साथ सोया एक ऐसी फसल है, जिसका उत्पादन देश में लगातार बढ़ रहा है. यहां की मिट्टी सोया की फसल के लिए मुफीद मानी जाती है. प्रोटीन, वेजिटेबल ऑइल और जानवरों के खाने के लिए उपजाई जाने वाली ये फसल हालांकि काफी पानी लेती है. 1 किलोग्राम सोया की पैदावार में लगभग 900 लीटर पानी लग जाता है. ये फसल सूखे से जूझ रहे महाराष्ट्र के अलावा मध्यप्रदेश और राजस्थान में उपजाई जाती है.

गन्ना- देश गन्ना उत्पादक देशों में दूसरे नंबर पर है. आमतौर पर फसलों के लिए 300 से 500 मिलीमीटर पानी लगता है, वहीं गन्ने की फसल के लिए 1500 से 2500 मिलीमीटर पानी की जरूरत पड़ती है. यानी एक किलोग्राम गन्ने को 1500 से 3000 लीटर तक पानी चाहिए होता है. सूखे से परेशान कई राज्यों जैसे महाराष्ट्र, यूपी, कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात और बिहार में इसका उत्पादन हो रहा है. इनमें पंजाब और उत्तराखंड भी शामिल हैं.

अगर हम ये ऊपर की बात पढ़ चुके हैं तो जाहिर है कि फसल उत्पादन और पानी की खपत को लेकर ना केवल नीति की जरूरत है बल्कि चीन की तरह ऐसी तकनीक भी कृषि में विकसित करनी जरूरी हो चुकी है, जिसमें कम पानी में ज्यादा पैदावार ले सकें.

अपना पानी बचाओ और दूसरे देशों से खरीदो
ये तो कृषि की बात हुई. बहुत से देश अपने पानी के स्रोत को बचाकर रखकर दूसरे देशों से बॉटल्ड फ्रेश वाटर खरीद रहे हैं. इसमें सबसे ऊपर अमेरिका का नंबर है, जो इटली से लेकर कनाडा तक एक दर्जन से ज्यादा देशों से बड़े पैमाने पर ताजा पानी बोतलों में लेता है. वैसे ये काम चीन भी करता है.

भारत भी बड़े पैमाने पर पानी को बेचने वाला देश
पिछले साल लोकसभा में कामर्स स्टेट मिनिस्टर ने बताया था कि भारत ने वर्ष 2015-16 से 2020-21 के बीच 3,850,431लीटर्स ताजा पानी विदेशों को बेचा. ये पानी तीन कैटेगरी में निर्यात हुआ- मिनिरल, एरेटेड और नेचुरल व अन्य तरह का पानी. इसमें सबसे ज्यादा पानी 2019-20 में चीन को भेजा गया. इसके अलावा भारत से मालदीव, संयुक्त अरब अमीरात, कनाडा, सिंगापुर, अमेरिका, कतर और सऊदी अरब को पानी बेचा जाता है. मजे कि बात है कि भारत में बारिश का पानी चीन से ज्यादा होता है लेकिन भारत उसे बचा नहीं पाता और चीन में भारत से ज्यादा जल भंडार हैं.

किस देश में पानी का कितना भंडार
वैसे चलते चलते आपको आखिर में बता दूं कि पेयजल स्रोतों के मामले में ब्राजील नंबर पर है. ब्राजील में 20 करोड़ आबादी के लिए 8233 घन किलोमीटर ताजा पानी का भंडार मौजूद है. भारत इस मामले में दसवें नंबर पर है. प्राकृतिक पेयजल स्रोतों के मामले में दूसरे नंबर पर रूस, तीसरे पर संयुक्त राज्य अमेरिका, चौथा कनाडा, पांचवा चीन, छठवां कोलंबिया, सातवां यूरोपीय संघ, आठवां इंडोनेशिया और नौवें नंबर पर पेरु है.

Tags: Clean water, Drinking water crisis, Water, World Water Day

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