कैसे अपने पिता की आत्मा की शांति चाहती हैं नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बेटी

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: August 26, 2019, 9:08 PM IST

सुभाष चंद्र बोस की बेटी अनीता बोस फाफ 77 साल की हैं. वो कई सालों से लगातार पिता की तोक्यो मंदिर में रखी अस्थियों के डीएनए जांच की मांग करती रही हैं. वो चाहती हैं कि हिंदू धर्म के अनुसार उनके पिता की आत्मा को शांति देने का समय आ गया है

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस की एकमात्र बेटी अनीता बोस फाफ हर साल भारत सरकार से मांग करती रही हैं कि जापान के जिस मंदिर में उनके पिता की अस्थियां रखी हैं, उसका डीएनए टेस्ट कराकर उन्हें भारत लाया जाए. वो दो ऐसी बातें करती हैं, जिससे उनके पिता की आत्मा को शांति मिलेगी. आखिर वो दो बातें हैं क्या.

अनीता तब चार साल की थीं, जब सुभाष का निधन 18 अगस्त 1945 को तायहोकू में एक विमान हादसे में बताया गया. उसके बाद से सुभाष के जिंदा होने को लेकर खबरें तो खूब उड़ीं लेकिन वो कभी सामने नहीं आए. उनकी मां ने कठिन स्थितियों में उन्हें पाला और बड़ा किया. बाहरी दुनिया में ये किसी को नहीं मालूम था कि सुभाष ने शादी कर ली थी और उनके एक बेटी भी है.

आजादी के बाद ये सच्चाई सामने आई. शायद जवाहर लाल नेहरू इस सच्चाई से रू-ब-रू थे. उन्होंने बोस की विधवा एमिली के लिए एक आर्थिक मदद भारत सरकार की ओर से भेजनी शुरू की थी. ये बाद के बरसों में लगातार उन्हें मिलती रही. अनीता जब 18 साल की उम्र में साठ के दशक में भारत आईं तो उन्हें एक नायक की बेटी जैसा राष्ट्रसम्मान हर उस जगह दिया गया, जहां भी वो गईं. उसके बाद वो कई बार भारत आईं.

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अनीता अब 77 साल की हो चुकी हैं. एमिली शेंकल का 1996 में 85 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. अनीता जर्मनी में रहती हैं. वो वहां की जानी मानी अर्थशास्त्री के तौर पर जानी जाती हैं. वो जर्मनी की आगसबर्ग यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर भी रहीं. इसके अलावा उन्होंने वहां सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ जर्मनी की ओर से राजनीति में कदम रखा. वो जर्मनी में एक कस्बे की मेयर भी चुनी गईं.

सुभाष चंद्र बोस की बेटी अनीता बोस फोफ अब 77 साल की हैं. जर्मनी में रहती हैं


सुभाष के निधन पर बंटा रहा है परिवार 
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सुभाष चंद्र बोस के निधन को लेकर उनका कोलकाता स्थित भाई-बहनों और बाद की पीढ़ियों का परिवार हमेशा बंटा रहा है. एक हिस्सा जहां हमेशा मानता आया कि सुभाष की मृत्यु 18 अगस्त को हवाई हादसे में हो गई थी तो दूसरे हिस्से ने कभी ये बात स्वीकार नहीं की. लिहाजा तोक्यो में रैंकोजी मंदिर में रखी नेताजी की अस्थियों को लेकर भी हमेशा विवाद की स्थिति बनी रही है. एक हिस्से ने हमेशा इस पर संदेह किया है कि ये नेताजी की अस्थियां हैं.

इस तरह देना चाहती हैं आत्मा को शांति 
जहां तक नेताजी की बेटी की बात है कि तो उन्होंने पिछले कुछ सालों में यही कहा है कि उनका पिता की मृत्यु हवाई हादसे में हुई थी. इसको मानने के लिए वो इस पूरे मामले की तह में गईं. कुछ उन लोगों से बात की, जो इस हादसे के प्रत्यक्षदर्शी थे. पिछले कुछ सालों से अनीता भारत सरकार से यही मांग कर रही हैं कि नेताजी की अस्थियों को भारत लाया जाए. दो बातें उनके पिता की आत्मा को शांति देंगी.

अनीता कई सालों से मांग कर रही हैं कि तोक्यो में नेताजी की जो अस्थियां मंदिर में रखी हैं, उनका डीएनए टेस्ट कराया जाए, ताकि सच्चाई सामने आए और नेताजी की आत्मा को शांति प्रदान की जा सके


गंगा में अस्थियां प्रवाहित करने की इच्छा
अनीता ने पिछले कुछ सालों में लगातार ये दो बातें भी कही हैं. पहली बात ये है कि उनके पिता हमेशा भारत को आजाद देखना चाहते थे, लिहाजा जैसे उनकी अस्थियां भारत की मिट्टी पर आएंगी, वो उनके पिता की उस सपने को पूरा करेगी, जिसे उन्होंने देखा था. दूसरी बात के लिए उन्होंने पिछले साल एक रिपोर्टर से कहा-मेरे पिता हिंदू थे. वो हिंदू धर्म मानते थे. हिंदू धर्म कहता है कि अस्थियां जब तक गंगा में प्रवाहित नहीं की जातीं तब तक आत्मा को शांति नहीं मिलती, लिहाजा अब उनके पिता की आत्मा को शांति के लिए ये किया जाना चाहिए.

डीएनए जांच से सच्चाई आएगी सामने
पिछले कई सालों से तोक्यो के मंदिर में रखी सुभाष की अस्थियों की डीएनए जांच की मांग होती रही है लेकिन भारत सरकार ने खुद को इससे परे रखा है. इसके चलते सुभाष को लेकर रहस्य लगातार बढ़ा ही है. अगर डीएनए जांच में ये साबित हो गया कि ये अस्थियां नेताजी की थीं तो 74 सालों से चल रही इन अटकलों पर भी खुद ब खुद फुलस्टॉप लग जाएगा कि नेताजी की मृत्यु कैसे हुई थी.
अगर डीएनए जांच में ये साबित नहीं होता तो नेताजी से जुड़ी फाइलों को खोलने में सही दिशा में बढ़ा जा सकता है. लिहाजा मौजूदा समय का उत्तर यही है कि ऐसा होना चाहिए.

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सुभाष चंद्र के एक पोते सुगाता बोस और उनकी मां दोनों ने ये माना कि उनका निधन एयरक्रैश में हुआ. हालांकि सुभाष के बड़े भाई शरतचंद्र को लगता था कि उनका भाई जिंदा है और वो जरूर वापस आएगा. शरत का निधन 50 के दशक में हो गया था. सुभाष के एक पड़पोते और बंगाल में भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष चंद्र कुमार बोस ने भी दो दिन पहले ट्विट किया कि सुभाष की अस्थियां तोक्यो के मंदिर से भारत लाई जाएं लेकिन पहले उनका डीएनए टेस्ट होना चाहिए.

ये तोक्यो के रैंकोजी मंदिर की तस्वीर है, जहां नेताजी की अस्थियां रखी हैं. हालांकि लोगों में इसे बात पर मतभेद है कि वास्तव इन अस्थियों का संबंध नेताजी से है या नहीं


तीन जांच आयोग बन चुके हैं 
सुभाष चंद्र बोस देश में एक रहस्यपूर्ण किवंदती बन चुके हैं. जिनके निधन या जिंदा रहने को लेकर ना जाने कितनी बातें कही जाती रही हैं. इसकी जांच को लेकर तीन जांच आयोगों का गठन हुआ. दो आयोग कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल में बने और एक जस्टिस मनोज मुखर्जी आयोग का गठन 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने किया था.
पहले दो आयोगों का मानना था कि बोस का निधन हवाई हादसे में हुआ. जबकि तीसरे आयोग ने इससे साफ इनकार कर दिया. मुखर्जी आयोग ने तो तोक्यो के मंदिर में रखी अस्थियों पर ही सवाल उठा दिया.

अस्थियों के तोक्यो तक पहुंचने की कहानी
बोस की अस्थियों के तायहोकू के हवाई दुर्घटना हादसा स्थल से तोक्यो पहुंचने की भी एक कहानी है. अगर शाहनवाज रिपोर्ट की बात करें तो इसके अनुसार, 20 अगस्त को तायहोकू के होंगाजी मंदिर के पीछे पूरे सैन्य सम्मान के बीच नेताजी का अंतिम संस्कार किया गया. ये काम मंदिर के बौद्ध पुजारी की देखरेख में हुआ. अगले दिन शवदाह गृह से अस्थियां एक लकड़ी के बॉक्स में इकट्ठी की गईं.
रिपोर्ट कहती है कि एक फुट क्यूबिक के इस लकड़ी के बॉक्स को सफेद कपड़े में लपेट कर एक हफ्ते तक वहीं मंदिर में रखा गया. फिर इसे विमान और रेल मार्ग के जरिए तोक्यो पहुंचाया गया. जब अस्थियां तोक्यो पहुंची तो एक जुलूस निकालकर और धार्मिक संस्कारों के बीच इसे रैंकोजी मंदिर में स्थापित कर दिया गया. तब ये अस्थियां उसी मंदिर में हैं.

सुभाष चंद्र बोस के निधन के रहस्य की जांच के लिए तीन आयोग बन चुके हैं, लेकिन उनमें से हर की रिपोर्ट विवादों में ज्यादा रही है


भारत सरकार ने अब तक नहीं माना है मृत
इन अस्थियों को कई बार भारत में लाने की मांग होती रही हैं. लेकिन वैधानिक दिक्कत ये भी है कि भारत सरकार ने अब तक नेताजी सुभाष को मृत नहीं माना है. नेताजी की बेटी को लगता है कि पिछली सरकारों को कुछ ऐसे लोग थे जो नेताजी को लेकर कभी हल तलाशना ही नहीं चाहते थे. वो चाहते थे कि ये रहस्य बना रहे. लिहाजा अब फिर नेताजी की अस्थियों की डीएनए जांच की मांग जोर पकड़ रही है. ये कहा जा रहा है कि ये जांच कराने के बाद ही नतीजे के आधार पर भारत सरकार नेताजी के बारे में आधिकारिक स्थिति स्पष्ट करे. इसके बाद अस्थियों को भारत लाया जाए.

वैसे एक बेटी की मार्मिक अपील की बात पर गौर किया जाए तो इसमें कोई शक नहीं कि कानूनी तौर पर अगर किसी को नेताजी का कानूनी वारिस माना जाना चाहिए तो ये वही हैं. नेताजी के मामले में भारत सरकार को उनकी अपील पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए, एक बेटी अगर पिता की आत्मा की शांति की बात कर रही है, तो ये लाजिमी ही है. डीएनए जांच भी दूध का दूध और पानी का पानी कर देगी.

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First published: August 26, 2019, 9:08 PM IST
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