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क्या मृत्यु से पहले चली जाती है बोलने की ताकत

News18Hindi
Updated: October 9, 2019, 6:33 PM IST
क्या मृत्यु से पहले चली जाती है बोलने की ताकत
मरने से पहले

आखिर मरते हुए शख्स के आखिरी लफ्ज क्या होते हैं. जब कोई अपने आखिरी दिनों की ओर पहुंचता है तो किस तरह की बातें करने लगता है

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  • Last Updated: October 9, 2019, 6:33 PM IST
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आमतौर पर माना जाता है कि मृत्यु से पहले ज्यादातर लोगों की बोलने की ताकत चली जाती है. अगर कोई बोलने की कोशिश भी करता है तो स्पष्ट तौर पर अपने शब्दों को नहीं बोल पाता. कई बार एक दो शब्दों के बाद चेतना जवाब दे देती है. इसे लेकर विदेश में कई प्रयोग हैं लेकिन हाल ही हुई एक स्टडी चर्चा में है.

कुछ समय पहले इस बारे में अमेरिकी पत्रिका "अटलांटिक" ने एक बड़ा लेख छापा. उसमें इस तरह के ना जाने कितने ही उदाहरण दिए गए और कई अध्ययन का हवाला दिया गया.

ज्य़ादातर यही कहा गया है कि आखिरी समय में चेतना खत्म हो जाती है, कुछ बोलने की ताकत नहीं रह जाती. शख्स अपने को लोगों से कटने लगता है. मरते हुए शख्स की भाषा क्या होती है, इस बारे में वाकई ज्यादा कुछ लिखा नहीं है.  मृत्यु के ठीक पहले की स्थितियों को लेकर 17वीं शताब्दी से ही कौतुहल रहता आया है.

जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज एच डब्ल्यू बुश की मृत्यु हुई तो मीडिया में बड़े पैमाने पर कहा गया कि उनके आखिरी शब्द "आई लव यू टू" थे.

लिजा स्मार्ट नाम की एक भाषा विज्ञानी ने पिता की मौत के बाद "वर्ड्स ऑन थ्रेसहोल्ड" नाम की एक किताब प्रकाशित की. इस किताब में 181 मरणासन्न लोगों की करीब 2000 बातों का जिक्र था, जिसमें उनके पिता भी थे.

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मरने वाले आखिरी समय में वाकई क्या बोलते हैं
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इस किताब की अपनी सीमाएं हैं लेकिन इसके बाद भी ये शानदार काम है, ये उन उत्सुकताओं को शांत करने वाला अकेला प्रकाशित काम है कि मरते हुए लोग वाकई क्या बोलते हैं. इससे पता लगा कि उनके आखिरी शब्द क्या होते हैं.

स्मार्ट पिता के बिस्तर के पास, जब वो अपने आखिरी दिनों में थे


पेशे और मरने से पहले चेतना का क्या कोई संबंध है
अमेरिकी एंथ्रोपॉलोजिस्ट आर्थर मैकडोनाल्ड ने भी मरने से पहले लोगों की मानसिक दशा को जांचने पर काम किया. उन्होंने ये देखा कि उनके आखिरी शब्द क्या रहे. उन्होंने पेशागत तौर पर लोगों को दस कैटेगरी में बांटा (सेल्समैन, फिलास्फर, कवि आदि).  उनके अंतिम शब्दों पर गौर किया. तब देखा गया कि मिलिट्री जुड़े रहे लोगों ने सबसे ज्यादा निर्देश या चेतावनी दी जबकि फिलास्फर्स (गणितज्ञ और शिक्षा विज्ञानी शामिल) के पास सबसे ज्यादा सवाल, जवाब और विस्मय थे.

धार्मिक और राजसी लोगों ने संतुष्टी या असंतुष्टी भरे शब्दों का ज्यादा उल्लेख किया जबकि कलाकार और वैज्ञानिक आमतौर पर सबसे कम बोले.

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सुनना जरूर जारी रहता है
"द अटलांटिक" में प्रकाशित रिपोर्ट इस मामले पर भरपूर प्रकाश डालती है. बकौल इसके, 1992 में नर्स का काम करने वाली मैगी कैलनन और पैट्रिशिया कैली की किताब "फाइनल गिफ्ट्स" प्रकाशित हुई. फिर वर्ष 2007 में मौरिन कीले की किताब "फाइनल कंवर्जन" आई. कैलनन अपनी किताब में कहती हैं, "जब कोई शख्स कमजोर हो जाता है. अंतिम समय में ज्यादा सोने लगा हो, तब उसका संवाद दूसरों के साथ कहीं ज्यादा गूढ़ होता है."

कैलनन और कैली ने लिखा, "यहां तक कि जब कोई बहुत कमजोर हो जाता है या अपनी चेतना खो बैठता है तब भी वो बोल या सुन सकता है. सुनना तो ऐसी इंद्रीय है, जो सबसे आखिर में काम करना बंद करती है.'

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ज्यादातर लोग नहीं बोल पाते

कीले कहती हैं, "जीवन के आखिर में ज्यादातर लोग नहीं बोल पाते. क्योंकि शरीर काम बंद कर रहा होता है. वो अपनी शारीरिक ताकत खो चुका होता है. कई बार फेफड़े भी काम करना बंद कर चुके होते हैं. तब वो फुसफुसा सकता है या बहुत कम बोल पाएगा. शायद एक या दो शब्द, क्योंकि उसके पास केवल इतनी ही ऊर्जा होती है. आमतौर पर मरणासन्न स्थिति में अगर परिवार के लोग उससे कुछ कहते हैं या पूछते हैं तो वो उसमें ना तो दखल दे पाता है और ना आपत्ति."

ज्यादातर लोग आखिरी सांस के साथ मॉम या मामा जैसे शब्द बोलते हैं


सबसे ज्यादा किसको बुलाते हैं
कुछ लोग शांति में ही मर जाते हैं, खासकर अगर वो देमेंशिया या अल्जाइमर जैसी बीमार के शिकार हों. क्योंकि कई साल पहले ही उनकी भाषा की ताकत खत्म हो चुकी होती है. जो लोग बोल पाते हैं, वो भी अटकने लगते हैं. एक डॉक्टर ने कहा, मरते समय बीवी, पति या बच्चों का नाम लेने की कोशिश करते हैं.

उलझी बातें करने लगते हैं मरने वाले
रेमंड मूडी जूनियर ने 1975 में प्रकाशित अपनी बेस्ट सेलिंग बुक "लाइफ आफ्टर लाइफ" में लिखा अक्सर मरने वाला शख्स कुछ समय पहले से उलझी बातें करने लगता है. मसलन-" मुझे वहां खत्म होना है", "मुझे खत्म हो जाना है", "जिंदगी खत्म हो जाएगी". "जिंदगी का दिया बुझने वाला है" और भी इसी तरह की बातें. इन सारी बातों और शब्दों का मतलब मृत्यु से संघर्ष करने जैसा होता है.

आखिरी शब्द पर रिसर्च अब भी चुनौती
हालांकि कहना चाहिए कि मरने के दौरान आमतौर पर जिस भाषा या शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है, उसे समझना आसान नहीं. हालांकि अस्पतालों में लंबी बीमारी से जो लोग मरते हैं, उनके आखिरी शब्दों और गतिविधियों को रिकार्ड कर पाना ज्यादा संभव हो रहा है. हालांकि अध्ययन के बाद भी आखिरी शब्द अब भी एक चुनौती बने हुए हैं, अब भी आखिरी समय में कोई नहीं चाहता कि मरणासन्न के बिस्तर के आसपास कोई वैज्ञानिक मौजूद रहे.

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First published: October 9, 2019, 6:32 PM IST
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