सिविल सर्विसेज के प्रिलिम्स पेपर में क्या हो गई ट्रांसलेशन की गड़बड़ी, पहले भी उठे हैं सवाल

सिविल सर्विसेज में इस बार फिर हिंदी ट्रांसलेशन में एक सवाल में गड़बड़ी हुई है.
सिविल सर्विसेज में इस बार फिर हिंदी ट्रांसलेशन में एक सवाल में गड़बड़ी हुई है.

संघ लोक सेवा आय़ोग union public service commission की सिविल सर्विसेज परीक्षा (Civil Services Exams) के प्रिलिम्स के पेपर में इस बार हिंदी अनुवाद (Hindi Translation) में फिर गभीर चूक के बाद आयोग की परीक्षा की गंभीरता पर सवाल उठने लगे हैं. ये भी जानते हैं कि ये गड़बड़ी क्या थी, जिस पर शायद आप भी हैरान रह जाएं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 6, 2020, 11:41 AM IST
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तमाम असमंजस के बाद संघ लोकसेवा आयोग (UPSC) के प्रिलिम्स 2020 के पेपर्स हो गए. एकबारगी ऐसा लगने लगा था कि कोरोना के चलते इस बार आईएएस (IAS) के ये एग्जाम हो भी पाएंगे या नहीं लेकिन आखिरकार ये 04 अक्टूबर को हो गए. लेकिन इस बार भी इन पेपर्स में हिंदी ट्रांसलेशन में गड़बड़ी चर्चा में है. दरअसल इस बार फिर प्रिलिम्स के हिंदी के एक पेपर के सवाल में गड़बड़ी हुई, जिसने इस सर्वोच्च परीक्षा के तौरतरीकों पर भी सवाल खड़े कर दिए.

हालांकि पेपर के फार्मेट को भी लेकर लोगों की शिकायतें हैं, क्योंकि पिछले कुछ सालों से प्रिलिम्स के पेपर में हर विषय को संतुलित तौर पर देने की जगह कुछ विषयों के सवाल अधिकता में होते हैं तो कुछ गायब हो जाते हैं.

इस बार मेन्स और प्रिलिम्स के बीच बहुत ज्यादा फासला नहीं होने से भी अभ्यर्थियों को लग रहा है कि इस बार मेरिट नीचे जाएगी. बहरहाल बात करते हैं कि प्रिलिम्स के पेपर के एक ऐसे हिंदी अनुवाद की, जो किसी को भी हैरान कर सकती है कि क्या यूपीएसी में आईएएस (IAS) जैसी परीक्षा में ऐसी गड़बड़ियां हो सकती हैं. ये भी सवाल उठता है कि यूपीएससी इन पेपर्स के हिंदी अनुवाद किन लोगों से कराता है. वो इसे लेकर कितने गंभीर रहते हैं.



हालांकि ये बात सही है कि सिविल सर्विसेज एग्जाम के पेपर्स हर साल कुछ अलग तरीके से तैयार करने की कोशिश की जाती है, शायद इसलिए कि प्रतियोगियों की क्षमता का सही मूल्यांकन हो सके. किसी एक पैटर्न के आधार पर तैयारी करके आया प्रतियोगी वहीं रुक जाए.
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प्रिलिम्स में ट्रांसलेशन की गड़बड़ के साथ एक और चिंता
वैसे इस बार एग्जाम में चिंता दो बातों को लेकर है. पहली बात जिसका जिक्र ऊपर किया गया है, वो प्रिलिम्स के एग्जाम में आए पेपर्स में ट्रांसलेशन में हुई गंभीर गड़बड़ी, ये एक ऐसा अनुवाद है, जिसे देश में ज्यादातर हिंदी जानने वाले भी बता देंगे और उनसे भी ऐसी गड़बड़ी शायद ही हो. और उसके बदलते पैटर्न के कारण विषयों का संतुलित तौर पर पेपर में नहीं आना.

किस भाषा में मूल तौर पर सेट होता है पेपर
आपको ये भी बता दें कि आईएएस का पेपर हिन्दी और इंग्लिश दोनों भाषाओं में छपता है. लेकिन मूल तौर पर इसे इंग्लिश में ही सेट किया जाता है, फिर इसका अनुवाद हिंदी में कराकर दूसरी ओर छापा जाता है. पिछले साल भी ट्रांसलेशन में गड़बड़ी हुई थी. मीडिया में ये चर्चा का विषय बना था.

upsc
इस बार चूंकि आईएएस के मेन्स और प्रिलिम्स के बीच ज्यादा गैप नहीं रहा है तो प्रतियोगियों को इस पर इसकी मेरिट नीचे गिरने की आशंका है.


इस बार क्या हुई ट्रांसलेशन की चूक 
इस बार इस परीक्षा में एक सवाल Civil Disobedience Movement (सिविल डिसओबिडिएन्स मूवमेंट) के बारे में पूछा गया लेकिन इसका अनुवाद किया गया-असहयोग आंदोलन. जबकि Civil Disobedience Movement का हिन्दी में अनुवाद सविनय अवज्ञा आंदोलन के रूप में होगा. इसे हम सभी आमतौर पर जानते हैं. महात्मा गांधी ने देश में अलग अलग समय पर दो अलग आंदोलन चलाए थे. इसमें एक था असहयोग आंदोलन और दूसरा था सविनय अवज्ञा आंदोलन.

क्या है असहयोग आंदोलन (Non-cooperation movement)
गांधी जी की अगुआई में चलाया गया ये पहला जनांदोलन था. असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में 4 सितंबर 1920 को पारित हुआ. जो लोग भारत से उपनिवेशवाद को खत्म करना चाहते थे उनसे आग्रह किया गया कि वे स्कूल, कॉलेज और न्यायालय नहीं जाएं और कर भी नहीं चुकाएं. सभी को अंग्रेजी सरकार के साथ सभी ऐच्छिक संबंधों के परित्याग का पालन करने को कहा गया. गांघी जी ने कहा था कि असहयोग का ठीक ढंग से पालन किया जाए तो भारत एक साल के भीतर स्वराज हासिल कर लेगा.

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क्या है सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil disobedience movement)
सविनय अवज्ञा आंदोलन ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा चलाये गए जनांदोलनों में एक था. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने लाहौर अधिवेशन (1929.) में घोषणा कर दी कि उसका लक्ष्य भारत के लिए पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करना है. महात्मा गांधी ने अपनी इस मांग पर ज़ोर देने के लिए 06 अप्रैल, 1930 ई. को सविनय अविज्ञा आंदोलन छेड़ा, जिसका उद्देश्य कुछ विशिष्ट प्रकार के ग़ैर-क़ानूनी कार्य सामूहिक रूप से करके ब्रिटिश सरकार को झुका देना था.

इसमें नमक क़ानून को तोड़कर खुद नमक बनाना, सरकारी सेवाओं, शिक्षा केंद्रों एवं उपाधियों का बहिष्कार करना, महिलाओं द्वारा शराब, अफ़ीम और विदेशी कपड़े की दुकानों पर जाकर धरना देना और सभी तरह की विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर उन्हें जला देना था. साथ ही साथ कर की अदायगी रोकना भी. तो आप समझ सकते हैं कि दोनों आंदोलनों में फर्क था. ये दोनों अलग समय पर छेड़े गए थे.

ट्रांसलेशन को लेकर यूपीएससी के नियम क्या हैं
UPSC के सिविल सर्विस एग्ज़ाम के नोटिफ़िकेशन के तहत अगर ट्रांसलेशन को लेकर किसी तरह की कोई दिक्कत आती है तो इंग्लिश वाला सवाल ही सही माना जाएगा. उत्तर उसी के अनुसार देना होगा. ऐसा ही नियम SSC और दूसरे एग्ज़ाम में भी है. हालांकि अक्सर इसे लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठते रहे हैं कि हिंदी को लेकर यूपीएससी का ऐसा रुख क्यों है.

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प्रिलिम्स पेपर के पैटर्न में विषयों के संतुलन पर भी चिंता 
वैसे तो ये बात सही है कि सिविल का पेपर कभी एक जैसा नहीं आता. कभी प्रिलिम्स के पेपर में हिस्ट्री के सवाल ज्यादा होते हैं तो कभी राजनीति के. हालांकि होना ये चाहिए कि हर विषय के सवालों को संतुलित रखा जाए लेकिन ऐसा होता नहीं शायद इस वजह से कि हर संघ लोकसेवा आयोग हर साल आईएएस की परीक्षा में अपने पैटर्न को तोड़ता रहता है.

इस बार के पेपर में एग्रीकल्चर से जुड़े प्रश्वों की भरमार थी. साथ ही पर्यावरण और वाइल्ड लाइफ सेंचुरी पर सवाल पूछे गए थे. इस बार इस पेपर से मध्यकालीन इतिहास गायब नजर आया. करेंट अफेयर्स से महज तीन-चार सवाल ही पूछे गए.

आऱएसएस से जुड़ी समिति ने क्या संस्तुति की थी
पिछले साल राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (RSS) से जुड़ी एक समिति ने संस्तुति की थी कि संघ लोक सेवा आयोग सिविल सर्विसेज एग्जाम से जुड़े अपने प्रश्न पत्र को पहले हिंदी में तैयार करे और फिर इसका अनुवाद अंग्रेजी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में कराए. ये कमेटी आरएसएस से जुड़ी शिक्षा बॉडी शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास (Shiksha Sanskriti Utthan Nyas,SSUN) ने गठित की थी. जिसने यूपीएससी एग्जाम को लेकर तमाम सुझाव दिए थे.

इस कमेटी ने ये भी कहा था कि जिस तरह से इन परीक्षाओं में अंग्रेजी से सवालों का अनुवाद होता है, वो अपने सही अर्थ और भाव खो बैठते हैं. ऐसे में जो भी छात्र हिंदी और अन्य भाषाओं का चयन करते हैं, वो उनके साथ अन्याय की तरह हो जाता है.

जानें संघ लोक सेवा आयोग के बारे में
संघ लोक सेवा आयोग ( Union Public Service Commission, UPSC) भारत के संविधान द्वारा स्थापित एक संवैधानिक निकाय है, जो भारत सरकार के लोकसेवा के पदाधिकारियों की नियुक्ति के लिए परीक्षाओं का संचालन करता है. संविधान के भाग-14 के अंतर्गत अनुच्छेद 315-323 में एक संघीय लोक सेवा आयोग और राज्यों के लिए राज्य लोक सेवा आयोग के गठन का प्रावधान है.

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कब हुई संघ लोक सेवा आयोग की स्थापना
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रवादियों की प्रमुख मांग थी कि लोक सेवा आयोग में भर्ती भारत में हो, क्योंकि तब इसकी परीक्षा इंग्लैंड में हुआ करती थी. तब 1926 में पहली बार भारत में लोक सेवा आयोग की स्थापना हुई. इसे संवैधानिक दर्जा देने के साथ-साथ स्वायत्तता भी प्रदान की गयी ताकि ये बगैर किसी दबाव के योग्य अधिकारियों की नियुक्ति कर सके.

किस तरह नियुक्त किए जाते हैं यूपीएससी के सदस्य
संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होते हैं. कम से कम आधे सदस्य किसी लोक सेवा के सदस्य (कार्यरत या अवकाशप्राप्त) होते हैं जो न्यूनतम 10 वर्षों के अनुभवप्राप्त होते हैं. इनका कार्यकाल 6 वर्षों या 65 वर्ष की उम्र (जो भी पहले आए) तक का होता है. ये कभी भी अपना इस्तीफ़ा राष्ट्रपति को दे सकते हैं.

कौन कौन सी परीक्षाएं लेता है यूपीएससी
सिविल सेवा (प्रारंभिक) परीक्षा (मई में)
सिविल सेवा (प्रधान) परीक्षा (अक्टूबर/नवम्बर में)
भारतीय वन सेवा परीक्षा (जुलाई में)
भारतीय इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा (जुलाई में)
भू-विज्ञानी परीक्षा (दिसंबर में)
स्पेशल क्लास रेलवे अप्रेंटिसेज़ परीक्षा (अगस्त में)
राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और नौसेना अकादमी परीक्षा (अप्रैल और सितंबर में)
सम्मिलित रक्षा सेवा परीक्षा (मई और अक्टूबर में)
सम्मिलित चिकित्सा सेवा परीक्षा (फरवरी में)
भारतीय अर्थ सेवा/भारतीय सांख्यिकी सेवा परीक्षा (सितंबर में)
अनुभाग अधिकारी/आशुलिपिक (ग्रेड ख/ग्रेड 1) सीमित विभागीय प्रतियोगिता परीक्षा (दिसंबर में)
इसके अतिरिक्त राज्य लोक सेवा के अधिकारियों को संघ लोक सेवा से अधिकारी के रूप में भर्ती करना, भर्ती के नियम बनाना, विभागीय पदोन्नति समितियों का आयोजन करना, भारत के राष्ट्रपति द्वारा निर्दिष्ट कोई अन्य मामला सुलझाना इत्यादि इसके प्रमुख कार्य हैं.
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