इंग्लैंड के 'बड़ा साहिब' का टॉप सीक्रेट, क्या था 'चर्चिल सिगार अस्सिटेंट' किस्सा?

सिगार पीते विंस्टन चर्चिल की तस्वीर विकिकॉमन्स से साभार.

सिगार पीते विंस्टन चर्चिल की तस्वीर विकिकॉमन्स से साभार.

नए कृषि कानूनों (New Farm Laws) पर चर्चा के दौरान पीएम मोदी (PM Narendra Modi) ने आज़ादी से पहले बने उस 'खुफिया पद' के बहाने कटाक्ष किए, जिसे आज़ादी के बाद भी सालों तक खत्म नहीं किया गया. क्या था CCA, कैसे, क्यों बना था और कितना बड़ा सीक्रेट था?

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 11, 2021, 8:27 AM IST
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'अंग्रेज़ चले गए, सिगार छोड़ गए.' दूसरे विश्वयुद्ध (Second World War) के समय विंस्टन चर्चिल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री (British Prime Minister) बने थे. चर्चिल की दो कमज़ोरियां मशहूर थीं, पहली फ्रेंच शराब और दूसरी हवाना का सिगार. हवाना सिगार (Hawana Cigar) का अच्छा खासा स्टॉक चर्चिल के लिए लंदन स्थित उनके आवास 10 डाउनिंग स्ट्रीट में रखा जाता था. लेकिन 1940 के दशक की शुरूआत में हिटलर (Adolf Hitler) की फौजों ने पूरे अटलांटिक सागर में व्यापारिक रूट्स (Trade Routes) पर खतरा पैदा कर दिया, तो बाकी हलचलों के साथ ही चर्चिल का शौक भी चपेट में आ गया.

अमेरिका के पूर्वी तटों से इंग्लैंड तक बमुश्किल 20 से 30 फीसदी ही जहाज़ पहुंच पाते थे. ऐसे में हवाना सिगार की शॉर्टेज स्वाभाविक थी. स्टॉक की ज़िम्मेदारी जिस हाउसकीपिंग अफसर के पास थी, उसने अपनी चिंता भारत में अपने एक साथी अफसर से की. तय यह हुआ कि हवाना सिगार के विकल्प के तौर पर त्रिची के मशहूर सिगार की व्यवस्था मद्रास से की जाएगी.

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कैसे बना सीसीए का पद?

सिगार जैसी मामूली चीज़ मीलों दूर भेजने के लिए पहले मद्रास से नई दिल्ली और फिर वहां से लंदन तक लेन देन होता था. बाद में, मद्रास गवर्नर ने इस सप्लाई के लिए ​पूरी ज़िम्मेदारी अपने सिर पर ली. जिसे आज हम तिरुचिरापल्ली के नाम से जानते हैं, उसे तब त्रिचिनापली कहते थे और वहां के दो बेहतरीन सिगार उत्पादकों को 'गोपनीयता' की कसमें खिलाकर इंग्लैंड में 'बड़ा साहिब' के सिगार के लिए व्यवस्था बनाई गई.

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चर्चिल के सिगार दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भी खबर बनते थे. (तस्वीर न्यूज़पेपर्स.कॉम से साभार)




जल्द ही गवर्नर को इस काम के लिए एक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी, जो अच्छी अंग्रेज़ी बोलने की क्षमता के साथ ही समझदार भी हो. यही नहीं, इस काम के लिए ​सिगार की क्वालिटी, उत्पादन और उसके ज़ायके की समझ भी उस व्यक्ति में होना ज़रूरी थी. इस पद को बनाने के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी दिए बगैर गवर्नर ने डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स में मिलीं अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए एक खास पद क्रिएट किया, सीसीए.

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कितना रहस्यमयी था यह पद?

सीसीए को मुख्य सचिव दफ्तर के सीक्रेट सेल में पदस्था किया गया था. इस पद के बारे में सिर्फ गवर्नर और मुख्य सचिव को ही जानकारी थी और इसे इस कदर गोपनीय रखा गया कि इस पद के इर्द गिर्द एक रहस्य का माहौल तैयार हो गया. उस दफ्तर और वहां से ताल्लुक रखने वाले लोगों को सीसीए का मतलब 'चीफ कॉन्फिडेंशियल असिस्टेंट' समझ आता था और लोग सोचते थे कि बेहद सीक्रेट मामलों के लिए यहां काम होता था.

चर्चिल और त्रिची के सिगार

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मद्रास के सेंट जॉर्ज से व्हाइटहॉल तक पूरी गोपनीयता के साथ बराबर चर्चिल को सिगार भेजे जाते रहे. लेकिन चर्चिल की कमज़ोरी तो हवाना का सिगार था? कहते हैं कि हवाना के सिगार में जो कड़वापन और कड़क गंध थी, उसके बजाय चर्चिल को त्रिची के हल्की सुगंध वाले सिगार जल्द ही पसंद आने लगे थे. ये भी कहते हैं कि इसी सिगार से चर्चिल का मिज़ाज भी संतुलित रहता था.

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त्रिची के सिगार काफी मशहूर रहे हैं.


फिर एक बड़ा बदलाव हुआ और 1945 में चुनाव हारने के बाद चर्चिल नेता प्रतिपक्ष बन गए. तब हाउसकीपिंग अफसर ने नए पीएम क्लीमेंट एटली को 'टॉप सीक्रेट' त्रिची सिगार के बारे में बताया. लेकिन एटली चूंकि डमी पीएम ही माने जाते थे इसलिए एटली ने कहा कि यह सप्लाई जारी रखी जाए बल्कि थोड़ी और बढ़ा दी जाए ताकि 'रियल पीएम' भी कभी कभी चर्चिल के साथ उस सिगार का मज़ा ले सकें.

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फिर क्या विश्व युद्ध खत्म हो गया, 1947 में भारत को अंग्रेज़ों से आज़ादी मिल गई, लेकिन तमिलनाडु के सेंट जॉर्ज फोर्ट स्थित मुख्य सचिव दफ्तर में यह 'टॉप सीक्रेट' पद बना रहा. ऐसे ही किस्सों से भारत में एक कहावत मशहूर होती चली गई, 'अंग्रेज़ों से तो आज़ादी मिल गई, लेकिन अंग्रेज़ियत से नहीं'.

कैसे खुली टॉप सीक्रेट की पोल?

1960 के दशक की बात है जब मद्रास सरकार ने राज्य के कर्मचारियों की सैलरी के हालात के लिए एक कमेटी बनाई थी. कमीशन के चेयरमैन को 'टॉप सीक्रेट' लिखी डबल सील वाली एक गुमनाम चिट्ठी मिली, जो मद्रास के सेंट जॉर्ज फोर्ड में स्थित मुख्य सचिव के दफ्तर से आई थी. इस चिट्ठी के भीतर एक विनम्र निवेदन था कि सीसीए पद पर 20 सालों से बेदाग सेवा के बावजूद सैलरी नहीं बढ़ी थी इसलिए सैलरी बढ़ाने पर गौर किया जाए. लेकिन चेयरमैन को हैरानी थी क्योंकि उन्हें इस पद के बारे में कोई जानकारी नहीं थी.

चेयरमैन ने आवेदक से इस पद के बारे में पूछा तो जवाब में उसने लिखा कि उसके पद की गोपनीयता की शर्तें इस तरह की हैं कि वो 30 सालों तक 'सीक्रेट मैटर्स' के बारे में खुलासा नहीं कर सकता इसलिए वह 1975 में ही इस बारे में बता सकेगा. इस जवाब से चेयरमैन को तसल्ली नहीं हुई तो उन्होंने लिखा कि फिर वह 1975 के बाद की पे कमेटी के सामने ही अपना प्रस्ताव रखे.

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लोकसभा में सीसीए से जुड़ा किस्सा पीएम मोदी ने सुनाया.


अब आवेदक अपने आवेदन की पहल से ही जाल में फंस गया तो उसने बताया कि उसके पद यानी सीसीए का मतलब 'चर्चिल सिगार असिस्टेंट' था. यहां से सीक्रेट पद के बारे में खुलासे होना शुरू हुए.

पीएम मोदी ने क्यों छेड़ा किस्सा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में नए कृषि कानूनों पर चर्चा करते हुए बदलाव की ज़रूरत को लेकर 1960 के दशक के 'चर्चिल सिगार असिस्टेंट' पद से जुड़ा यह किस्सा संक्षेप में सुनाया. मोदी ने कहा कि 'स्टेट्स को' बरकरार रहने से व्यवस्था नहीं बदली और यह पद बेवजह बना रहा. वास्तव में, मोदी उस तर्क का जवाब दे रहे थे कि जब ज़रूरत नहीं थी तो नए कृषि कानून क्यों लाए गए. पीएम ने कहा कि प्रगतिशील समाज 'जस की तस' स्थिति को बनाए नहीं रखता बल्कि बदलाव करता है.
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